इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन पतली बांहें पतली गर्दन भोर भए मंदिर आई है आई नहीं है माँ लाई है वक़्त से पहले जाग उठी है नींद अभी आँखों में भरी है ठोड़ी तक लट आई हुई है यूँँही सी लहराई हुई है आँखों में तारों की चमक है मुखड़े पे चाँदी की झलक है कैसी सुंदर है क्या कहिए नन्ही सी इक सीता कहिए धूप चढ़े तारा चमका है पत्थर पर इक फूल खिला है चाँद का टुकड़ा फूल की डाली कम-सिन सीधी भोली भाली हाथ में पीतल की थाली है कान में चाँदी की बाली है दिल में लेकिन ध्यान नहीं है पूजा का कुछ ज्ञान नहीं है कैसी भोली छत देख रही है माँ बढ़ कर चुटकी लेती है चुपके चुपके हँस देती है हँसना रोना उस का मज़हब उस को पूजा से क्या मतलब ख़ुद तो आई है मंदिर में मन उस का है गुड़िया-घर में
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"शर्म कर लो" ज़िंदा हो हाँ तुम कोई शक नहीं साँस लेते हुए देखा मैं ने भी है हाथ औ’ पैरों और जिस्म को हरकतें ख़ूब देते हुए देखा मैं ने भी है अब भले हो ये करते हुए होंठ तुम दर्द सहते हुए सख़्त सी लेते हो अब है इतना भी कम क्या तुम्हारे लिए ख़ूब अपनी समझ में तो जी लेते हो गहराती रातों में उठती कराहट को अंदर ही अंदर दबाते तो होगे अगली सुब्ह फिर बरसने को बेताब कोड़ों को दिल में सजाते तो होगे ज़माने की ठोकर को सह के सड़क पे यूँँ चीख़ों को दिल में सजाते तो होगे ज़माने की ठोकर को सह के सड़क पे यूँँ चीख़ों की ज़हमत उठाते तो होगे रोते से चेहरे पे लटकी-सी गर्दन का थोड़ा इज़ाफ़ा बढ़ाते तो होगे सोचा कभी है कि ज़िंदा यूँँ रहने के मतलब के माने हैं कैसे कहीं ज़िंदा यूँँ रहने के माने पे थूकें जो ज़िंदा यूँँ रहने का मतलब यही बदबू को बलग़म को ख़ुशबू की मरहम बता के भरम में हो मल-मल रहे कीड़ा है वो संग कीड़ों की दुनिया में कीड़ा ही बन के जो हर पल रहे
Piyush Mishra
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"दुपट्टा" चले जा रहे हैं वो गुम हैं ख़यालों में धरती पे लटका हुआ है दुपट्टा ख़बर होगी तब तक सरक जाएगा सब यूँँ काँटों में अटका हुआ है दुपट्टा ज़ियादा हिलो मत इधर से उधर तुम कहीं फट न जाए बहुत क़ीमती है कराया गया है फ़रिश्तों से तैयार काँटों में अटका हुआ है दुपट्टा इधर से उधर तुम न हिलना न डुलना बस ऐसे ही रहना अभी आ रहा हूँ कहीं हो न जाए तुम्हें कुछ मिरी जान गर्दन में अटका हुआ है दुपट्टा बहुत सावधानी बरतनी पड़ेगी इसे मैं निकालूँगा ऐसे ही रहना मैं पहुँचा हुआ आदमी हूँ बहुत ही निगाहों में खटका हुआ है दुपट्टा कि तितली के पंखों से ज़्यादा हो नाज़ुक कहीं चुभ न जाए तुम्हें कोई काँटा तुम्हें मैं निकालूँगा इन वादियों से कि काँटों में अटका हुआ है दुपट्टा कभी दब रहा है मिरे पाँव से तो कभी दब रहा है तुम्हारे क़दम से इधर दाएँ कुछ भी नहीं है तुम्हारे उधर पूरा लटका हुआ है दुपट्टा यहाँ से वहाँ तक इधर से उधर तक बता ऐसी काँटों भरी वादियों में कहाँ तक निकालूँगा ऐसे मैं काँटा कि पूरे में अटका हुआ है दुपट्टा
Prashant Kumar
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"सिगरेट की राख" धुएँ का बादल जो हर पल उठता है जैसे जीवन की हर साँस जलती है सुलगती सिगरेट जैसे एक उम्मीद जो धीरे-धीरे राख बनकर बिख़रती है हर कश में कुछ खो जाता है जैसे सपने किसी कोने में दब जाते हैं हाथों में थमी ये पतली सी चीज़ जैसे ज़िन्दगी की एक छोटी सी ख़्वाहिश जलते हैं होंठ जलते हैं ख़्वाब हर धुएँ में दिखता है दिल का अज़ाब मगर क्या मिला इस आग में सिर्फ़ राख और कुछ सूनी यादें सिगरेट बुझती है पर जलना जारी है जैसे दिल के कोने में कोई दर्द भारी है मगर कौन समझे इस धुएँ की सच्चाई जो दिखता है वो सिर्फ़ पल भर की रिहाई ये सिगरेट बस एक आदत नहीं जैसे ज़िन्दगी की कोई छुपी हुई बेबसी है हर सुलगता कश एक चीख सुनाता है जो शायद किसी ने कभी समझा ही नहीं
Shivang Tiwari
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"मैं और मेरी दुनिया" एक ऐसी दुनिया जिस में सिर्फ़ मैं हूँ और सब कुछ मेरे इर्द-गिर्द बुना हुआ जहाँ ख़यालों का आसमाँ है और दिल की ज़मीं है ख़्वाबों के कुछ शजर हैं नीचे अश्कों की नमी है ख़ुशियों की हवा है जो हौले से मुझे छू कर मुस्कुराते हुए गुज़र जाती है ग़मो की बारिश भी है जो दिल की ज़मीं सोख लेती है और तन्हाइयों के मौसम में अक्सर उगने लगते है अहसास के नन्हे पौधे खिलने लगती है उन में अल्फ़ाज़ की नन्ही कलियाँ और फिर बिखर जाती हैं सफ़्हों की फ़िज़ा में कोई ग़ज़ल या नज़्म बनकर
Priya omar
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मुझे मालूम था ये दिन भी दुख की कोख से फूटा है मेरी मातमी चादर नहीं तब्दील होगी आज के दिन भी जो राख उड़ती थी ख़्वाबों की बदन में यूँँही आशुफ़्ता रहेगी और उदासी की यही सूरत रहेगी मैं अपने सोग में मातम-कुनाँ यूँँ सर-ब-ज़ानू रात तक बैठी रहूँगी और मिरे ख़्वाबों का पुर्सा आज भी कोई नहीं देगा मगर ये कौन है जो यूँँ मुझे बाहर बुलाता है बड़ी नर्मी से कहता है कि अपने हुजरा-ए-ग़म से निकल कर बाग़ में आओ ज़रा बाहर तो देखो दूर तक सब्ज़ा बिछा है और हरी शाख़ों पे नारंजी शगूफ़े मुस्कुराते हैं मुलाएम सब्ज़ पत्तों पर पड़ी शबनम सुनहरी धूप में हीरे की सूरत जगमगाती है दरख़्तों में छुपी नद्दी बहुत धी में सुरों में गुनगुनाती है चमकते ज़र्द फूलों से लदी नन्ही पहाड़ी के अक़ब में नुक़रई चश्मा ख़ुशी से खिलखिलाता है परिंद-ए-ख़ुश-गुलू शाख़-ए-शगुफ़्ता पर चहकता है घने जंगल में बारिश का ग़ुबार-ए-सब्ज़ सत्ह-ए-शीशा-ए-दिल पर मुलाएम उँगलियों से मर्हबा के लफ़्ज़ लिखता है कोई आता है आ कर चादर-ए-ग़म को बड़ी आहिस्तगी से मेरे शानों से हटा कर सात रंगों का दुपट्टा खोल कर मुझ को उड़ाता है मैं खुल कर साँस लेती हूँ मिरे अंदर कोई पैरों में घुँघरू बाँधता है रक़्स का आग़ाज़ करता है मिरे कानों के आवेज़ों को ये किस ने छुआ जिस से लवें फिर से गुलाबी हो गई हैं कोई सरगोशियों में फिर से मेरा नाम लेता है फ़ज़ा की नग़्मगी आवाज़ देती है हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है
Parveen Shakir
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