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हवा के ये नक़्श नीले सागर की उठती मौजें लहकते पेड़ों की नर्म शाख़ें गुलों के खिलते महकते लब कोहसार की चोटियों पे ये बर्फ़ के दिए आबशार का नग़मा-ए-दिल-नशीं आसमाँ के दामन में बादलों के रवाँ-दवाँ नर्म नर्म गाले वो कूक कोयल की वो पपीहे की पी ये सब नक़्श हैं हवा के ये जिस्म भी नक़्श है हवा का मगर कहाँ है हवा जो फिर मुझ को नक़्श से नक़्श-गर बना दे

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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ

Lal Chand Falak

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"ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा" प्यार से बहुत दिल से बनाया होगा यार बड़ी मुश्किल से बनाया होगा चाँद को इंसान में तब्दील किया कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा इक मुद्दत लगी होगी तेरी आँखें बनाने में कई अरसों में जाके तेरा चेहरा बना होगा ख़ूबसूरती समेटी होगी सारे जहाँ से उस ने तब कहीं जाके तेरा लहजा बना होगा तेरी ज़ुल्फ़ बनाने में कितनी रातें लगी होंगी तेरा जिस्म कितने ही गुलाबों से बनाया होगा सँवारा होगा जन्नत की परियों ने तुझे तेरा नक़्श कितने ही हिसाबों से बनाया होगा कितने मैख़ाने ख़ाली किए होंगे आँखों में तेरी तेरा दिल कितने ही हीरों से बनाया होगा शब-ओ-रोज़ अब यही सोचते गुज़रते हैं मेरे के यार ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा ज़रूर तारों से सलाह ली होगी बादलों की निगरानी में रखा होगा तुझे तो ज़मीन पे भेजा ख़ुदा ने पर तेरा बाल तेरी निशानी में रखा होगा ख़ुद रहगुज़र भी राह देखती है तेरी फूल तेरे छूने पे महकते हैं तेरे इशारे पे सहर होती है परिंदे तेरी आहट पे चहकते हैं आईना तेरे अक्स पे इतराता है जुगनू देखते हैं तेरे ख़्वाब रात भर तेरी ख़ुशबू की दस्तरस में क्या आया के 'आकर्ष' अब कोसता है गुलाब रात भार बेशुमार शिद्दत से तेरी रूह बनाई होगी तेरा हुस्न सादगी से ख़फ़ा हो के बनाया होगा इक बदन में काइ‌नात क़ैद करी कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा

Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को हवाओं में लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझ को क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे कि आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझ को मगर उस ने रोका न मुझ को मनाया न दामन ही पकड़ा न मुझ को बिठाया न आवाज़ ही दी न मुझ को बुलाया मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया यहाँ तक कि उस से जुदा हो गया मैं

Kaifi Azmi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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ये काएनात एक आइना है ये साफ़ पानी की झील जिस में मैं डूब कर हैरत-ओ-तहय्युर बना सरापा जो लौटता हूँ तो ज़िंदगी है न मौत है इक सुरूर हूँ बे-ख़ुदी हूँ सच्चाई हूँ मुजस्सम

Ejaz Farooqi

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वो एक पत्थर वो सख़्त काला सियाह पत्थर लहू से तर जिस की तीरगी नाग बन के डसती थी जिस की सख़्ती से कोहसारों के दिल दहलते थे जिस की ख़ूँ-तिश्नगी से कोमल शजर फ़क़त टहनियों की हसरत के ज़ाविए थे वो एक पत्थर जो तू ने फेंका मिरे समुंदर में हरकत-ए-ला-ज़वाल का एक ताज़ियाना बना वो लहरें उट्ठीं कि ख़ामोश चाँदनी की रुपहली चादर भी थरथराई वो झाग का नूर तीरगी के सियाह पर्दों को चाक करने लगा वो शीशे की एक दीवार जिस को तू ये समझ रहा था कि एक ठोकर से चूर होगी वो एक सोने का थाल बन कर दमक रही है

Ejaz Farooqi

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क्यूँ मिरे ख़्वाब को धुँदलाते हो ख़्वाब अँगड़ाई है थरथराते हुए पाँव बीती आवाज़ों की लहरें और बल खाता हुआ सीमीं बदन जिस के इक इक अंग में मेरे लहू की धड़कन आसमानों की तरफ़ उठते हुए वो मरमरीं बाज़ू किसी शाहीन की परवाज़ और हाथों की पोरों से शुआ'ओं की फुवार ख़्वाब को अंगड़ाइयों की एक बल खाती हुई परवाज़ बनने दो जो मेरे ख़्वाब को धुँदलाओगे तो टुकड़े टुकड़े हो के तुम ख़ुद मुंजमिद हो जाओगे या बीती आवाज़ों में डूबोगे या अपने ख़ून के इस तेज़ धारे ही में बह जाओगे या जलती शुआ'ओं की तमाज़त में भस्म हो जाओगे

Ejaz Farooqi

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असा-ए-मूसा अँधेरी रातों की एक तज्सीम मुंजमिद जिस में हाल इक नुक़्ता-ए-सुकूनी न कोई हरकत न कोई रफ़्तार जब आसमानों से आग बरसी तो बर्फ़ पिघली धुआँ सा निकला असा में हरकत हुई तो महबूस नाग निकला वो एक सय्याल लम्हा जो मुंजमिद पड़ा था बढ़ा झपट कर ख़िज़ाँ-रसीदा शजर की सब ख़ुश्क टहनियों को निगल गया

Ejaz Farooqi

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उजाड़ सड़कों की दोनों जानिब घने दरख़्तों के लम्बे साए तले ज़माने की धूप से तपते दिन गुज़ारे घनेरी ज़ुल्फ़ों की ठंडी छाँव तले जवानी की गर्म जलती दो-पहरें काटीं घने दरख़्तों का साया क़ाएम घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव दाइम मगर मिरे सर से ढल चुकी है

Ejaz Farooqi

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