ग़म की छा जाएगी दुनिया में घटा मेरे बा'द और बरसेंगे बहुत तीर-ए-बला मेरे बा'द देखना हश्र क्या होता है कि जब आएगी दर-ओ-दीवार से रोने की सदा मेरे बा'द बिजलियाँ चमकेंगी आलाम-ओ-मसाइब की अगर ग़म की चल जाएगी हर सम्त हवा मेरे बा'द अपनी ठोकर से मिरी क़ब्र को ढाया आ कर ज़ुल्म ये और भी ज़ालिम ने किया मेरे बा'द आज दिल खोल के तुम ज़ुल्म-ओ-सितम कर डालो फिर चलाओगे कहाँ तेग़-ए-जफ़ा मेरे बा'द मेरी सूरत से भी चिढ़ हो गई पैदा जिन को ख़ूँ रुलाएगी उन्हें मेरी वफ़ा मेरे बा'द हाथ से अपने मिटाने पे तुले हो लेकिन कौन भुगतेगा मोहब्बत की सज़ा मेरे बा'द ख़ुद ही पछताओगे दुनिया से मिटा कर मुझ को तुम को बेदाद का आएगा मज़ा मेरे बा'द अपने बीमार-ए-मोहब्बत को न तड़पाओ तुम फिर दिखा लेना उन्हें नाज़-ओ-अदा मेरे बा'द वो बहाने लगे आँखों से लहू के आँसू रंग ले आई है ये मेरी वफ़ा मेरे बा'द 'आफ़्ताब' आज मोहब्बत ने असर दिखलाया उन के सीने में भी अब दर्द उठा मेरे बा'द
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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मिट जाएँ मुल्क से बुग़्ज़-ओ-हसद और दिल में वतन की इज़्ज़त हो दामन में फ़ज़ाओं के हर जा इक अम्न-ओ-सुकूँ की सर्वत हो सीने हों पाक कुदूरत से हर लब पर नग़्मा-ए-उल्फ़त हो फ़िरदौस-ए-बरीं का नमूना फिर दुनिया में प्यारा भारत हो उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है ऐ भारत माता लाल तिरे इस दौर-ए-ख़िज़ाँ में सँभल जाएँ साँचे में प्रेम और उन्स के अब सब हिन्दू मुस्लिम ढल जाएँ नग़्मों से सच्ची मोहब्बत के दुनिया की फ़ज़ाएँ बदल जाएँ ये मंज़र देख के उल्फ़त के आँसू आँखों से निकल जाएँ उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है वो मुल्क है दुनिया से अच्छा जो रश्क-ए-जिनाँ कहलाता है आराम-ओ-राहत की चीज़ें सब जिस में इंसाँ पाता है ऐ मुरलीधर की जन्म-भूमि तू सारे सुखों की दाता है हम तेरी आन पे मरते हैं तो प्यारी भारत-माता है उल्फ़त का सैर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है भर भर के जाम-ए-मोहब्बत के मय-ख़ाना-ए-दहर में ख़ूब पिएँ गोकुल में नंद का लाला हो मुरली की प्यारी टेर सुनें वो नग़्में हवाओं में गूँजीं सोते हुए जज़्बे जाग उठें उजड़ी हुई बस्ती को दिल की यूँँ अहल-ए-वतन आबाद करें उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है हर शख़्स हो वज्द के आलम में इक दिलकश राग लबों पर हो रूहानी नग़्में सुन सुन कर बेदार बशर का मुक़द्दर हो आँखों के सामने दुनिया में इक सच्चे प्रेम का मंज़र हो इक उन्स-ओ-मोहब्बत का आलम आलम में आज सरासर हो उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है जल्वों से हुस्न-ए-अज़ल के अब सब ख़ुर्द-ओ-कलाँ पुर-नूर रहें मय पी के इश्क़-ए-हक़ीक़ी की उल्फ़त के नशे में चूर रहें दुनिया में रह कर दुनिया के झगड़ों से कोसों दूर रहें हम प्यारे कृष्ण की भगती में सरशार रहें मसरूर रहें उल्फ़त का सैर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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आह में ऐ दिल-ए-मज़लूम असर पैदा कर जिस में सौदा-ए-मोहब्बत हो वो सर पैदा कर ग़म का तूफ़ाँ भी अगर आए तो कुछ फ़िक्र न कर क़ौम का दर्द हर इक दिल में मगर पैदा कर ज़ुल्मत-ए-ग़म का निशाँ तक न नज़र आए कहीं वो ख़यालात की दुनिया में सहर पैदा कर सरफ़रोशों की तरह पहले मिटा दे ख़ुद को हिन्द की ख़ाक से फिर लाल-ओ-गुहर पैदा कर आग बे-फ़ैज़ की दौलत को लगा दे यारब काम आए जो ग़रीबों के वो ज़र पैदा कर आज भी क़ौम के शे'रों का लहू है तुझ में हौसला राम का भीषम का जिगर पैदा कर हों हनूमान और 'अंगद' से हज़ारों योद्धा सैंकड़ों भीम और अर्जुन से बशर पैदा कर आसमाँ काँपता है नाम से जिन के अब तक आज फिर क़ौम में वो लख़्त-ए-जिगर पैदा कर फिर ज़रूरत है जवाँ मर्दों की ऐ मादर-ए-हिन्द राणा-प्रताप से ख़ुद्दार बशर पैदा कर अहद-ए-रफ़्ता में जनम तू ने दिया था जिन को मादर-ए-हिन्द वही नूर-ए-नज़र पैदा कर चैन राहत से अगर उम्र बसर करनी है दिल में अग़्यार के भी उन्स से घर पैदा कर गर तमन्ना है कि हो सारा ज़माना अपना जज़्बा-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत की नज़र पैदा कर 'आफ़्ताब' अब तिरी तक़दीर का चमकेगा ज़रूर मर्द बन कर कोई दुनिया में हुनर पैदा कर
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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लर्ज़ा था जिस के बच्चों का नाम सुन के आलम होता था जिन के आगे शे'रों का ख़त्म दम-ख़म जिन का उड़ा हमेशा अर्श-ए-बरीं पे परचम अज़्मत का जिन की डंका बजता रहेगा दाइम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में करोड़ों बे-मिस्ल थे दिलावर लाखों थे भीम अर्जुन बलराम श्याम 'रघुबर' थे तीर जिन के ज़ेवर बिस्तर थे जिन के ख़ंजर रू-ए-ज़मीं पे जिन का पैदा हुआ न हम-सर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क पर था नाज़ाँ अकबर सा शाह-ए-आज़म उड़ता था आसमाँ पर शोहरत का जिस की परचम था अद्ल का ज़माना इंसाफ़ का था आलम हिंदू मुसलमाँ दोनों रहते थे मिल के बाहम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा थे कालीदास जैसे जिस देश में सुख़न-वर क्या चीज़ उन के आगे यूरोप का शेक्सपियर पामाल हो चुका है वो गुलिस्ताँ सरासर इस ग़ैर-हाल में भी है कुल जहाँ से बेहतर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा 'गौतम' से इल्म-दाँ को जिस ने जनम दिया था 'मीराँ ने जिस ज़मीं पर ख़ुश हो के सम पिया था 'पातनजली' को पैदा जिस मुल्क ने किया था आलम ने फ़लसफ़े का जिन से सबक़ लिया था हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा गोदी में जिस की अब तक गामा सा पहलवाँ है नज़रों में कल जहाँ की जो रुस्तम-ए-ज़माँ है ताक़त का जिस की क़ाइल हर पीर और जवाँ है वो सैंकड़ों जवानों पे आज तक गराँ है हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा वो कोह-ए-नूर हीरा जिस ने किया था पैदा जिस की चमक से अक्सर शाहों का ताज चमका हीरों में कुल जहाँ के माना गया है यकता मुमकिन नहीं अबद तक जिस का जवाब मिलना हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा टैगोर से जहाँ हूँ शाइ'र भी और हुनर-वर जिस की ज़मीं पे अब तक 'गाँधी' है और जवाहर 'अबुल-कलाम' जैसे जिस मुल्क में हों लीडर अज़्मत का जिन की सिक्का है कुल जहाँ के दिल पर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा राणा ने जिस ज़मीं पर की तेग़ आज़माई जिस मुल्क पर हज़ारों वीरों ने जाँ गँवाई सहरा में जिस के मोहन ने बाँसुरी बजाई मुर्दा दिलों में उल्फ़त की आग सी लगाई हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में थीं लाखों सीता सी पाक-दामन तेग़ों के साए में जो करती थी धर्म-पालन शादाब हो रहा था इस्मत का जिन से गुलशन क़ाइल हैं जिन की इस्मत के दोस्त और दुश्मन हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा ज़रख़ेज़ मुल्क कोई जिस के नहीं बराबर रोज़-ए-अज़ल से अब तक सरसब्ज़ है सरासर कानों में आज तक भी जिस के हैं सीम और ज़र जिस की ज़मीं उगलती है ला'ल और जवाहर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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जल्वा-ए-हुस्न-ए-अज़ल आए तसव्वुर में अगर गोशा-ए-दिल में मचलते हुए अरमाँ होंगे इक हसीं गोर-ए-ग़रीबाँ पे हुआ यूँँ गोया ये भी कम्बख़्त कभी हज़रत-ए-इंसाँ होंगे पाँव रखते भी नज़ाकत से अगर होंगे कहीं बे-बदल हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ पे नाज़ाँ होंगे फूल बिस्तर पे बिछाने को अगर हासिल थे सैर के वास्ते बाग़ और गुलिस्ताँ होंगे इत्र मलने के लिए कपड़े बदलने के लिए महल-ओ-ऐवाँ में बहुत दस्त-ए-हसीनाँ होंगे नित-नई रोज़ मुयस्सर थी उन्हें बज़्म-ए-सुरूद दिल बहलने के लिए सैंकड़ों सामाँ होंगे एक लम्हा भी गुज़रता था जो तन्हाई में मुज़्तरिब और परेशान ये ज़ीशाँ होंगे गोर-ओ-मर्क़द पे यूँँही सैर को आते होंगे और सीनों में लिए हसरत-ओ-अरमाँ होंगे क्या ख़बर थी कि उजड़ जाएगा गुलज़ार-ए-हयात एक झोंके से हवा के न ये सामाँ होंगे क्या यूँँही मौत मिटाएगी जहाँ से हम को क्या यूँँही अपने लिए दश्त-ओ-बयाबाँ होंगे ज़िंदगी में न करेंगे जो बशर कार-ए-सवाब वक़्त-ए-रुख़्सत वो परेशान-ओ-पशेमाँ होंगे 'आफ़्ताब' उन की समझता हूँ हयात-ए-अबदी जो बशर धर्म पे सौ-जान से क़ुर्बां होंगे
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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मैं अपने क़ल्ब में जब नूर-ए-इरफ़ाँ देख लेता हूँ तो हर ज़र्रा में इक ख़ुर्शीद-ए-ताबाँ देख लेता हूँ मिटा कर अपनी हस्ती राह-ए-हक़ में खुल गईं आँखें कि मर कर ज़िंदगी का राज़-ए-पिन्हाँ देख लेता हूँ हक़ीक़ी इश्क़ का जज़्बा है दिल में जिस की बरकत से हयात और मौत के असरार-ए-उर्यां देख लेता हूँ किए हैं इश्क़ और उल्फ़त के सारे मरहले जब तय तो दुनिया भर की हर मुश्किल को आसाँ देख लेता हूँ छुपा सकता नहीं तू ख़ुद को मुझ से लाख पर्दों में तिरी सूरत हर इक शय में नुमायाँ देख लेता हूँ कहानी क्या सुनाऊँ दिल-जलों की ग़म के मारों की कि उठता चार-सू इक ग़म का तूफ़ाँ देख लेता हूँ तड़प है दर्द है रंज-ओ-अलम है बे-क़रारी है ये मुल्क और क़ौम का हाल-ए-परेशाँ देख लेता हूँ इसी प्यारे वतन हिन्दोस्ताँ की ग़ैर हालत है कि जिस पर ग़ैर को भी आज नाज़ाँ देख लेता हूँ निकलती है अगर इक आह भी मज़लूम के दिल से ज़मीं से अर्श तक हर शय को लर्ज़ां देख लेता हूँ घटाएँ ग़म की सर पर छा गईं जो हिन्द वालों के दर-ओ-दीवार को भारत के गिर्यां देख लेता हूँ अभी हिन्दोस्ताँ के दिन भले आए नहीं शायद कि मैं लड़ते हुए हिन्दू मुसलमाँ देख लेता हूँ न क्यूँँ ऐ 'आफ़्ताब' आए नज़र उम्मीद की सूरत कि जब तकलीफ़ में राहत के सामाँ देख लेता हूँ
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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