मैं अपने क़ल्ब में जब नूर-ए-इरफ़ाँ देख लेता हूँ तो हर ज़र्रा में इक ख़ुर्शीद-ए-ताबाँ देख लेता हूँ मिटा कर अपनी हस्ती राह-ए-हक़ में खुल गईं आँखें कि मर कर ज़िंदगी का राज़-ए-पिन्हाँ देख लेता हूँ हक़ीक़ी इश्क़ का जज़्बा है दिल में जिस की बरकत से हयात और मौत के असरार-ए-उर्यां देख लेता हूँ किए हैं इश्क़ और उल्फ़त के सारे मरहले जब तय तो दुनिया भर की हर मुश्किल को आसाँ देख लेता हूँ छुपा सकता नहीं तू ख़ुद को मुझ से लाख पर्दों में तिरी सूरत हर इक शय में नुमायाँ देख लेता हूँ कहानी क्या सुनाऊँ दिल-जलों की ग़म के मारों की कि उठता चार-सू इक ग़म का तूफ़ाँ देख लेता हूँ तड़प है दर्द है रंज-ओ-अलम है बे-क़रारी है ये मुल्क और क़ौम का हाल-ए-परेशाँ देख लेता हूँ इसी प्यारे वतन हिन्दोस्ताँ की ग़ैर हालत है कि जिस पर ग़ैर को भी आज नाज़ाँ देख लेता हूँ निकलती है अगर इक आह भी मज़लूम के दिल से ज़मीं से अर्श तक हर शय को लर्ज़ां देख लेता हूँ घटाएँ ग़म की सर पर छा गईं जो हिन्द वालों के दर-ओ-दीवार को भारत के गिर्यां देख लेता हूँ अभी हिन्दोस्ताँ के दिन भले आए नहीं शायद कि मैं लड़ते हुए हिन्दू मुसलमाँ देख लेता हूँ न क्यूँँ ऐ 'आफ़्ताब' आए नज़र उम्मीद की सूरत कि जब तकलीफ़ में राहत के सामाँ देख लेता हूँ
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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याद है एक दिन? मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पर तुम ने एक स्केच बनाया था आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.
Gulzar
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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मिट जाएँ मुल्क से बुग़्ज़-ओ-हसद और दिल में वतन की इज़्ज़त हो दामन में फ़ज़ाओं के हर जा इक अम्न-ओ-सुकूँ की सर्वत हो सीने हों पाक कुदूरत से हर लब पर नग़्मा-ए-उल्फ़त हो फ़िरदौस-ए-बरीं का नमूना फिर दुनिया में प्यारा भारत हो उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है ऐ भारत माता लाल तिरे इस दौर-ए-ख़िज़ाँ में सँभल जाएँ साँचे में प्रेम और उन्स के अब सब हिन्दू मुस्लिम ढल जाएँ नग़्मों से सच्ची मोहब्बत के दुनिया की फ़ज़ाएँ बदल जाएँ ये मंज़र देख के उल्फ़त के आँसू आँखों से निकल जाएँ उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है वो मुल्क है दुनिया से अच्छा जो रश्क-ए-जिनाँ कहलाता है आराम-ओ-राहत की चीज़ें सब जिस में इंसाँ पाता है ऐ मुरलीधर की जन्म-भूमि तू सारे सुखों की दाता है हम तेरी आन पे मरते हैं तो प्यारी भारत-माता है उल्फ़त का सैर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है भर भर के जाम-ए-मोहब्बत के मय-ख़ाना-ए-दहर में ख़ूब पिएँ गोकुल में नंद का लाला हो मुरली की प्यारी टेर सुनें वो नग़्में हवाओं में गूँजीं सोते हुए जज़्बे जाग उठें उजड़ी हुई बस्ती को दिल की यूँँ अहल-ए-वतन आबाद करें उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है हर शख़्स हो वज्द के आलम में इक दिलकश राग लबों पर हो रूहानी नग़्में सुन सुन कर बेदार बशर का मुक़द्दर हो आँखों के सामने दुनिया में इक सच्चे प्रेम का मंज़र हो इक उन्स-ओ-मोहब्बत का आलम आलम में आज सरासर हो उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है जल्वों से हुस्न-ए-अज़ल के अब सब ख़ुर्द-ओ-कलाँ पुर-नूर रहें मय पी के इश्क़-ए-हक़ीक़ी की उल्फ़त के नशे में चूर रहें दुनिया में रह कर दुनिया के झगड़ों से कोसों दूर रहें हम प्यारे कृष्ण की भगती में सरशार रहें मसरूर रहें उल्फ़त का सैर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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आह में ऐ दिल-ए-मज़लूम असर पैदा कर जिस में सौदा-ए-मोहब्बत हो वो सर पैदा कर ग़म का तूफ़ाँ भी अगर आए तो कुछ फ़िक्र न कर क़ौम का दर्द हर इक दिल में मगर पैदा कर ज़ुल्मत-ए-ग़म का निशाँ तक न नज़र आए कहीं वो ख़यालात की दुनिया में सहर पैदा कर सरफ़रोशों की तरह पहले मिटा दे ख़ुद को हिन्द की ख़ाक से फिर लाल-ओ-गुहर पैदा कर आग बे-फ़ैज़ की दौलत को लगा दे यारब काम आए जो ग़रीबों के वो ज़र पैदा कर आज भी क़ौम के शे'रों का लहू है तुझ में हौसला राम का भीषम का जिगर पैदा कर हों हनूमान और 'अंगद' से हज़ारों योद्धा सैंकड़ों भीम और अर्जुन से बशर पैदा कर आसमाँ काँपता है नाम से जिन के अब तक आज फिर क़ौम में वो लख़्त-ए-जिगर पैदा कर फिर ज़रूरत है जवाँ मर्दों की ऐ मादर-ए-हिन्द राणा-प्रताप से ख़ुद्दार बशर पैदा कर अहद-ए-रफ़्ता में जनम तू ने दिया था जिन को मादर-ए-हिन्द वही नूर-ए-नज़र पैदा कर चैन राहत से अगर उम्र बसर करनी है दिल में अग़्यार के भी उन्स से घर पैदा कर गर तमन्ना है कि हो सारा ज़माना अपना जज़्बा-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत की नज़र पैदा कर 'आफ़्ताब' अब तिरी तक़दीर का चमकेगा ज़रूर मर्द बन कर कोई दुनिया में हुनर पैदा कर
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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ग़म की छा जाएगी दुनिया में घटा मेरे बा'द और बरसेंगे बहुत तीर-ए-बला मेरे बा'द देखना हश्र क्या होता है कि जब आएगी दर-ओ-दीवार से रोने की सदा मेरे बा'द बिजलियाँ चमकेंगी आलाम-ओ-मसाइब की अगर ग़म की चल जाएगी हर सम्त हवा मेरे बा'द अपनी ठोकर से मिरी क़ब्र को ढाया आ कर ज़ुल्म ये और भी ज़ालिम ने किया मेरे बा'द आज दिल खोल के तुम ज़ुल्म-ओ-सितम कर डालो फिर चलाओगे कहाँ तेग़-ए-जफ़ा मेरे बा'द मेरी सूरत से भी चिढ़ हो गई पैदा जिन को ख़ूँ रुलाएगी उन्हें मेरी वफ़ा मेरे बा'द हाथ से अपने मिटाने पे तुले हो लेकिन कौन भुगतेगा मोहब्बत की सज़ा मेरे बा'द ख़ुद ही पछताओगे दुनिया से मिटा कर मुझ को तुम को बेदाद का आएगा मज़ा मेरे बा'द अपने बीमार-ए-मोहब्बत को न तड़पाओ तुम फिर दिखा लेना उन्हें नाज़-ओ-अदा मेरे बा'द वो बहाने लगे आँखों से लहू के आँसू रंग ले आई है ये मेरी वफ़ा मेरे बा'द 'आफ़्ताब' आज मोहब्बत ने असर दिखलाया उन के सीने में भी अब दर्द उठा मेरे बा'द
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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लर्ज़ा था जिस के बच्चों का नाम सुन के आलम होता था जिन के आगे शे'रों का ख़त्म दम-ख़म जिन का उड़ा हमेशा अर्श-ए-बरीं पे परचम अज़्मत का जिन की डंका बजता रहेगा दाइम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में करोड़ों बे-मिस्ल थे दिलावर लाखों थे भीम अर्जुन बलराम श्याम 'रघुबर' थे तीर जिन के ज़ेवर बिस्तर थे जिन के ख़ंजर रू-ए-ज़मीं पे जिन का पैदा हुआ न हम-सर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क पर था नाज़ाँ अकबर सा शाह-ए-आज़म उड़ता था आसमाँ पर शोहरत का जिस की परचम था अद्ल का ज़माना इंसाफ़ का था आलम हिंदू मुसलमाँ दोनों रहते थे मिल के बाहम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा थे कालीदास जैसे जिस देश में सुख़न-वर क्या चीज़ उन के आगे यूरोप का शेक्सपियर पामाल हो चुका है वो गुलिस्ताँ सरासर इस ग़ैर-हाल में भी है कुल जहाँ से बेहतर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा 'गौतम' से इल्म-दाँ को जिस ने जनम दिया था 'मीराँ ने जिस ज़मीं पर ख़ुश हो के सम पिया था 'पातनजली' को पैदा जिस मुल्क ने किया था आलम ने फ़लसफ़े का जिन से सबक़ लिया था हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा गोदी में जिस की अब तक गामा सा पहलवाँ है नज़रों में कल जहाँ की जो रुस्तम-ए-ज़माँ है ताक़त का जिस की क़ाइल हर पीर और जवाँ है वो सैंकड़ों जवानों पे आज तक गराँ है हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा वो कोह-ए-नूर हीरा जिस ने किया था पैदा जिस की चमक से अक्सर शाहों का ताज चमका हीरों में कुल जहाँ के माना गया है यकता मुमकिन नहीं अबद तक जिस का जवाब मिलना हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा टैगोर से जहाँ हूँ शाइ'र भी और हुनर-वर जिस की ज़मीं पे अब तक 'गाँधी' है और जवाहर 'अबुल-कलाम' जैसे जिस मुल्क में हों लीडर अज़्मत का जिन की सिक्का है कुल जहाँ के दिल पर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा राणा ने जिस ज़मीं पर की तेग़ आज़माई जिस मुल्क पर हज़ारों वीरों ने जाँ गँवाई सहरा में जिस के मोहन ने बाँसुरी बजाई मुर्दा दिलों में उल्फ़त की आग सी लगाई हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में थीं लाखों सीता सी पाक-दामन तेग़ों के साए में जो करती थी धर्म-पालन शादाब हो रहा था इस्मत का जिन से गुलशन क़ाइल हैं जिन की इस्मत के दोस्त और दुश्मन हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा ज़रख़ेज़ मुल्क कोई जिस के नहीं बराबर रोज़-ए-अज़ल से अब तक सरसब्ज़ है सरासर कानों में आज तक भी जिस के हैं सीम और ज़र जिस की ज़मीं उगलती है ला'ल और जवाहर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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जल्वा-ए-हुस्न-ए-अज़ल आए तसव्वुर में अगर गोशा-ए-दिल में मचलते हुए अरमाँ होंगे इक हसीं गोर-ए-ग़रीबाँ पे हुआ यूँँ गोया ये भी कम्बख़्त कभी हज़रत-ए-इंसाँ होंगे पाँव रखते भी नज़ाकत से अगर होंगे कहीं बे-बदल हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ पे नाज़ाँ होंगे फूल बिस्तर पे बिछाने को अगर हासिल थे सैर के वास्ते बाग़ और गुलिस्ताँ होंगे इत्र मलने के लिए कपड़े बदलने के लिए महल-ओ-ऐवाँ में बहुत दस्त-ए-हसीनाँ होंगे नित-नई रोज़ मुयस्सर थी उन्हें बज़्म-ए-सुरूद दिल बहलने के लिए सैंकड़ों सामाँ होंगे एक लम्हा भी गुज़रता था जो तन्हाई में मुज़्तरिब और परेशान ये ज़ीशाँ होंगे गोर-ओ-मर्क़द पे यूँँही सैर को आते होंगे और सीनों में लिए हसरत-ओ-अरमाँ होंगे क्या ख़बर थी कि उजड़ जाएगा गुलज़ार-ए-हयात एक झोंके से हवा के न ये सामाँ होंगे क्या यूँँही मौत मिटाएगी जहाँ से हम को क्या यूँँही अपने लिए दश्त-ओ-बयाबाँ होंगे ज़िंदगी में न करेंगे जो बशर कार-ए-सवाब वक़्त-ए-रुख़्सत वो परेशान-ओ-पशेमाँ होंगे 'आफ़्ताब' उन की समझता हूँ हयात-ए-अबदी जो बशर धर्म पे सौ-जान से क़ुर्बां होंगे
Lala Anoop Chand Aaftab Panipati
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