nazmKuch Alfaaz

जल्वा-ए-हुस्न-ए-अज़ल आए तसव्वुर में अगर गोशा-ए-दिल में मचलते हुए अरमाँ होंगे इक हसीं गोर-ए-ग़रीबाँ पे हुआ यूँँ गोया ये भी कम्बख़्त कभी हज़रत-ए-इंसाँ होंगे पाँव रखते भी नज़ाकत से अगर होंगे कहीं बे-बदल हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ पे नाज़ाँ होंगे फूल बिस्तर पे बिछाने को अगर हासिल थे सैर के वास्ते बाग़ और गुलिस्ताँ होंगे इत्र मलने के लिए कपड़े बदलने के लिए महल-ओ-ऐवाँ में बहुत दस्त-ए-हसीनाँ होंगे नित-नई रोज़ मुयस्सर थी उन्हें बज़्म-ए-सुरूद दिल बहलने के लिए सैंकड़ों सामाँ होंगे एक लम्हा भी गुज़रता था जो तन्हाई में मुज़्तरिब और परेशान ये ज़ीशाँ होंगे गोर-ओ-मर्क़द पे यूँँही सैर को आते होंगे और सीनों में लिए हसरत-ओ-अरमाँ होंगे क्या ख़बर थी कि उजड़ जाएगा गुलज़ार-ए-हयात एक झोंके से हवा के न ये सामाँ होंगे क्या यूँँही मौत मिटाएगी जहाँ से हम को क्या यूँँही अपने लिए दश्त-ओ-बयाबाँ होंगे ज़िंदगी में न करेंगे जो बशर कार-ए-सवाब वक़्त-ए-रुख़्सत वो परेशान-ओ-पशेमाँ होंगे 'आफ़्ताब' उन की समझता हूँ हयात-ए-अबदी जो बशर धर्म पे सौ-जान से क़ुर्बां होंगे

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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मिट जाएँ मुल्क से बुग़्ज़-ओ-हसद और दिल में वतन की इज़्ज़त हो दामन में फ़ज़ाओं के हर जा इक अम्न-ओ-सुकूँ की सर्वत हो सीने हों पाक कुदूरत से हर लब पर नग़्मा-ए-उल्फ़त हो फ़िरदौस-ए-बरीं का नमूना फिर दुनिया में प्यारा भारत हो उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है ऐ भारत माता लाल तिरे इस दौर-ए-ख़िज़ाँ में सँभल जाएँ साँचे में प्रेम और उन्स के अब सब हिन्दू मुस्लिम ढल जाएँ नग़्मों से सच्ची मोहब्बत के दुनिया की फ़ज़ाएँ बदल जाएँ ये मंज़र देख के उल्फ़त के आँसू आँखों से निकल जाएँ उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है वो मुल्क है दुनिया से अच्छा जो रश्क-ए-जिनाँ कहलाता है आराम-ओ-राहत की चीज़ें सब जिस में इंसाँ पाता है ऐ मुरलीधर की जन्म-भूमि तू सारे सुखों की दाता है हम तेरी आन पे मरते हैं तो प्यारी भारत-माता है उल्फ़त का सैर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है भर भर के जाम-ए-मोहब्बत के मय-ख़ाना-ए-दहर में ख़ूब पिएँ गोकुल में नंद का लाला हो मुरली की प्यारी टेर सुनें वो नग़्में हवाओं में गूँजीं सोते हुए जज़्बे जाग उठें उजड़ी हुई बस्ती को दिल की यूँँ अहल-ए-वतन आबाद करें उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है हर शख़्स हो वज्द के आलम में इक दिलकश राग लबों पर हो रूहानी नग़्में सुन सुन कर बेदार बशर का मुक़द्दर हो आँखों के सामने दुनिया में इक सच्चे प्रेम का मंज़र हो इक उन्स-ओ-मोहब्बत का आलम आलम में आज सरासर हो उल्फ़त का सर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है जल्वों से हुस्न-ए-अज़ल के अब सब ख़ुर्द-ओ-कलाँ पुर-नूर रहें मय पी के इश्क़-ए-हक़ीक़ी की उल्फ़त के नशे में चूर रहें दुनिया में रह कर दुनिया के झगड़ों से कोसों दूर रहें हम प्यारे कृष्ण की भगती में सरशार रहें मसरूर रहें उल्फ़त का सैर में सौदा है जज़्बात का तूफ़ाँ बरपा है घर घर में प्रेम की गंगा हो शाइ'र के दिल की तमन्ना है

Lala Anoop Chand Aaftab Panipati

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आह में ऐ दिल-ए-मज़लूम असर पैदा कर जिस में सौदा-ए-मोहब्बत हो वो सर पैदा कर ग़म का तूफ़ाँ भी अगर आए तो कुछ फ़िक्र न कर क़ौम का दर्द हर इक दिल में मगर पैदा कर ज़ुल्मत-ए-ग़म का निशाँ तक न नज़र आए कहीं वो ख़यालात की दुनिया में सहर पैदा कर सरफ़रोशों की तरह पहले मिटा दे ख़ुद को हिन्द की ख़ाक से फिर लाल-ओ-गुहर पैदा कर आग बे-फ़ैज़ की दौलत को लगा दे यारब काम आए जो ग़रीबों के वो ज़र पैदा कर आज भी क़ौम के शे'रों का लहू है तुझ में हौसला राम का भीषम का जिगर पैदा कर हों हनूमान और 'अंगद' से हज़ारों योद्धा सैंकड़ों भीम और अर्जुन से बशर पैदा कर आसमाँ काँपता है नाम से जिन के अब तक आज फिर क़ौम में वो लख़्त-ए-जिगर पैदा कर फिर ज़रूरत है जवाँ मर्दों की ऐ मादर-ए-हिन्द राणा-प्रताप से ख़ुद्दार बशर पैदा कर अहद-ए-रफ़्ता में जनम तू ने दिया था जिन को मादर-ए-हिन्द वही नूर-ए-नज़र पैदा कर चैन राहत से अगर उम्र बसर करनी है दिल में अग़्यार के भी उन्स से घर पैदा कर गर तमन्ना है कि हो सारा ज़माना अपना जज़्बा-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत की नज़र पैदा कर 'आफ़्ताब' अब तिरी तक़दीर का चमकेगा ज़रूर मर्द बन कर कोई दुनिया में हुनर पैदा कर

Lala Anoop Chand Aaftab Panipati

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ग़म की छा जाएगी दुनिया में घटा मेरे बा'द और बरसेंगे बहुत तीर-ए-बला मेरे बा'द देखना हश्र क्या होता है कि जब आएगी दर-ओ-दीवार से रोने की सदा मेरे बा'द बिजलियाँ चमकेंगी आलाम-ओ-मसाइब की अगर ग़म की चल जाएगी हर सम्त हवा मेरे बा'द अपनी ठोकर से मिरी क़ब्र को ढाया आ कर ज़ुल्म ये और भी ज़ालिम ने किया मेरे बा'द आज दिल खोल के तुम ज़ुल्म-ओ-सितम कर डालो फिर चलाओगे कहाँ तेग़-ए-जफ़ा मेरे बा'द मेरी सूरत से भी चिढ़ हो गई पैदा जिन को ख़ूँ रुलाएगी उन्हें मेरी वफ़ा मेरे बा'द हाथ से अपने मिटाने पे तुले हो लेकिन कौन भुगतेगा मोहब्बत की सज़ा मेरे बा'द ख़ुद ही पछताओगे दुनिया से मिटा कर मुझ को तुम को बेदाद का आएगा मज़ा मेरे बा'द अपने बीमार-ए-मोहब्बत को न तड़पाओ तुम फिर दिखा लेना उन्हें नाज़-ओ-अदा मेरे बा'द वो बहाने लगे आँखों से लहू के आँसू रंग ले आई है ये मेरी वफ़ा मेरे बा'द 'आफ़्ताब' आज मोहब्बत ने असर दिखलाया उन के सीने में भी अब दर्द उठा मेरे बा'द

Lala Anoop Chand Aaftab Panipati

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लर्ज़ा था जिस के बच्चों का नाम सुन के आलम होता था जिन के आगे शे'रों का ख़त्म दम-ख़म जिन का उड़ा हमेशा अर्श-ए-बरीं पे परचम अज़्मत का जिन की डंका बजता रहेगा दाइम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में करोड़ों बे-मिस्ल थे दिलावर लाखों थे भीम अर्जुन बलराम श्याम 'रघुबर' थे तीर जिन के ज़ेवर बिस्तर थे जिन के ख़ंजर रू-ए-ज़मीं पे जिन का पैदा हुआ न हम-सर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क पर था नाज़ाँ अकबर सा शाह-ए-आज़म उड़ता था आसमाँ पर शोहरत का जिस की परचम था अद्ल का ज़माना इंसाफ़ का था आलम हिंदू मुसलमाँ दोनों रहते थे मिल के बाहम हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा थे कालीदास जैसे जिस देश में सुख़न-वर क्या चीज़ उन के आगे यूरोप का शेक्सपियर पामाल हो चुका है वो गुलिस्ताँ सरासर इस ग़ैर-हाल में भी है कुल जहाँ से बेहतर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा 'गौतम' से इल्म-दाँ को जिस ने जनम दिया था 'मीराँ ने जिस ज़मीं पर ख़ुश हो के सम पिया था 'पातनजली' को पैदा जिस मुल्क ने किया था आलम ने फ़लसफ़े का जिन से सबक़ लिया था हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा गोदी में जिस की अब तक गामा सा पहलवाँ है नज़रों में कल जहाँ की जो रुस्तम-ए-ज़माँ है ताक़त का जिस की क़ाइल हर पीर और जवाँ है वो सैंकड़ों जवानों पे आज तक गराँ है हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा वो कोह-ए-नूर हीरा जिस ने किया था पैदा जिस की चमक से अक्सर शाहों का ताज चमका हीरों में कुल जहाँ के माना गया है यकता मुमकिन नहीं अबद तक जिस का जवाब मिलना हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा टैगोर से जहाँ हूँ शाइ'र भी और हुनर-वर जिस की ज़मीं पे अब तक 'गाँधी' है और जवाहर 'अबुल-कलाम' जैसे जिस मुल्क में हों लीडर अज़्मत का जिन की सिक्का है कुल जहाँ के दिल पर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा राणा ने जिस ज़मीं पर की तेग़ आज़माई जिस मुल्क पर हज़ारों वीरों ने जाँ गँवाई सहरा में जिस के मोहन ने बाँसुरी बजाई मुर्दा दिलों में उल्फ़त की आग सी लगाई हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा जिस मुल्क में थीं लाखों सीता सी पाक-दामन तेग़ों के साए में जो करती थी धर्म-पालन शादाब हो रहा था इस्मत का जिन से गुलशन क़ाइल हैं जिन की इस्मत के दोस्त और दुश्मन हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा ज़रख़ेज़ मुल्क कोई जिस के नहीं बराबर रोज़-ए-अज़ल से अब तक सरसब्ज़ है सरासर कानों में आज तक भी जिस के हैं सीम और ज़र जिस की ज़मीं उगलती है ला'ल और जवाहर हिन्दोस्ताँ वही है प्यारा वतन हमारा

Lala Anoop Chand Aaftab Panipati

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मैं अपने क़ल्ब में जब नूर-ए-इरफ़ाँ देख लेता हूँ तो हर ज़र्रा में इक ख़ुर्शीद-ए-ताबाँ देख लेता हूँ मिटा कर अपनी हस्ती राह-ए-हक़ में खुल गईं आँखें कि मर कर ज़िंदगी का राज़-ए-पिन्हाँ देख लेता हूँ हक़ीक़ी इश्क़ का जज़्बा है दिल में जिस की बरकत से हयात और मौत के असरार-ए-उर्यां देख लेता हूँ किए हैं इश्क़ और उल्फ़त के सारे मरहले जब तय तो दुनिया भर की हर मुश्किल को आसाँ देख लेता हूँ छुपा सकता नहीं तू ख़ुद को मुझ से लाख पर्दों में तिरी सूरत हर इक शय में नुमायाँ देख लेता हूँ कहानी क्या सुनाऊँ दिल-जलों की ग़म के मारों की कि उठता चार-सू इक ग़म का तूफ़ाँ देख लेता हूँ तड़प है दर्द है रंज-ओ-अलम है बे-क़रारी है ये मुल्क और क़ौम का हाल-ए-परेशाँ देख लेता हूँ इसी प्यारे वतन हिन्दोस्ताँ की ग़ैर हालत है कि जिस पर ग़ैर को भी आज नाज़ाँ देख लेता हूँ निकलती है अगर इक आह भी मज़लूम के दिल से ज़मीं से अर्श तक हर शय को लर्ज़ां देख लेता हूँ घटाएँ ग़म की सर पर छा गईं जो हिन्द वालों के दर-ओ-दीवार को भारत के गिर्यां देख लेता हूँ अभी हिन्दोस्ताँ के दिन भले आए नहीं शायद कि मैं लड़ते हुए हिन्दू मुसलमाँ देख लेता हूँ न क्यूँँ ऐ 'आफ़्ताब' आए नज़र उम्मीद की सूरत कि जब तकलीफ़ में राहत के सामाँ देख लेता हूँ

Lala Anoop Chand Aaftab Panipati

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