"ख़्वाब" कभी मैं कह नहीं पाया कि तुझ सेे वास्ता क्या है तू मेरे दिल मेरी धड़कन मेरी साँसों का हिस्सा है तेरा होना भी है मुझ को मगर होने से डरता हूँ तुझे पाया नहीं फिर भी तुझे खोने से डरता हूँ मेरी जाँ तू मेरे ख़्वाबों ख़यालों में ही रहती है मैं इक पागल दिवाना हूँ हमेशा मुझ सेे कहती है मगर जो तू हक़ीक़त में कभी आए तो जानेगी मुझे कितनी मोहब्बत है जो देखेगी तो मानेगी अगर ये ख़्वाब सच होता तो हम तुम साथ में रहते सताती तू मुझे दिनभर तो सारा दिन मनाती भी बिना मतलब की बातों पर तू मुझ सेे रूठ जाती भी सुनो ना जाँ ज़रा सी बात पर रूठा नहीं करते मगर ये चाँद तारे भी तो अब टूटा नहीं करते भला कैसे मैं ये कह दूँ कि इनको तोड़ लाऊँगा हवाओं को घटाओं को फ़िज़ा को मोड़ लाऊँगा तेरी हर इक अदा पे हम ये दिल हारे हैं मेरी जाँ तो तेरे सामने क्या चाँद क्या तारे है मेरी जाँ मेरे बस में बस इतना हो कि तुझ को जीत पाऊँ मैं तेरे दिल की हर इक ख़्वाहिश को जाँ अपना बनाऊँ मैं मेरी पलकों के साए में तू अपने ख़्वाब रख देना परेशानी के भी अपने सभी अस्बाब रख देना मैं तेरे वास्ते फिर इक नई दुनिया बनाऊँगा तुझे ही याद रखूँगा जहाँ को भूल जाऊँगा फिर इक इक कर के सारे राज़ दिल के खोल दूँगा मैं यहाँ जो कह नहीं पाया वहाँ वो बोल दूँगा मैं
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"क़िस्मत" कभी सोचता हूँ मेरा हक़ है उस पर वही जो किसी और की हो चुकी है वो लड़की जो क़िस्मत में मेरे लिखी थी लकीरों से मेरी कहीं खो चुकी है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ मगर अब करूँँ तो करूँँ क्या भला मैं निगाहों में उस का ही चेहरा बसा है उसी को ये दिल मानता अब ख़ुदा है ये दिल अब धड़कता ही उस के लिए है ये पागल तड़पता ही उस के लिए है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ मैं कितना अभागा हूँ कह भी न पाया पनाहों में अपनी छिपा लो ना मुझ को मेरी बेख़ुदी से बचा लो ना मुझ को मुझे चैन पड़ता नहीं बिन तुम्हारे घड़ी भर गले से लगा लो ना मुझ को सुनो तुम सेे इक राज़ की बात कह दूँ ये चाहत बनी ही हमारे लिए थी मोहब्बत बनी ही हमारे लिए थी नहीं मैं ये हरगिज़ नहीं मान सकता कोई मुझ सेे ज़्यादा तुम्हें चाहता है ये वो सच है जिस का तुम्हें भी पता है मेरे जैसा कोई दिवाना नहीं है मगर तुम को दिल ही लगाना नहीं है कभी सोचता हूँ जो मेरी नहीं हो तो जिस की हो उस सेे चुरा लू मैं तुम को कभी सोचता हूँ कि ग़ज़लों में अपनी पिरो कर ज़रा गुनगुना लूँ मैं तुम को मगर जैसे क़िस्मत बदल सी गई है कि जैसे हर इक शख़्स ने बस हमें दूर करने की साज़िश रची है ग़लत हो रहा है अगर ये सही है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ
Rohit tewatia 'Ishq'
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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे
Rohit tewatia 'Ishq'
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"नादान परी" वो मेरी नादान परी सब सेे छिपकर रहती थी अक्सर मुझ सेे कहती थी छोड़ो प्यार व्यार की बातें हिस्से आती तन्हा रातें इस सेे क्या ही मिल पाएगा जो है वो भी ख़ो जाएगा मैं ने सोचा सच ही तो है प्यार किसे ही मिल पाया है इस को तो एहसास दिला दूँ दुनिया से भी मैं लड़ लूँगा क़िस्मत से कैसे जीतूँगा मैं तो ये ग़म पाल ही लूँगा टूटा दिल सँभाल ही लूँगा वो तो सचमुच मर जाएगी और फिर कुछ ना कर पाएगी उस को एक जीवन जीना है मुझ को हर आँसू पीना है वैसे भी क्या ही है मुझ में मेरे जैसे कितने होंगे मेरे होने से क्या होगा बस इक गिनती बढ़ जाएगी उस के आगे अड़ जाएगी मेरा जाना ही बेहतर है साँस ही लेनी है ले लूँगा जान ही देनी है दे दूँगा जान तो वैसे भी उस की है उस को कहाँ मालूम है इतना वो मेरी नादान परी
Rohit tewatia 'Ishq'
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“मेरा ये मन उदास है” किसी की याद आई है मेरा ये मन उदास है ख़लिश सी दिल पे छाई है मेरा ये मन उदास है ये ज़िंदगी की बात है ये इश्क़ ही की बात है कि भूल कर भी मैं जिसे कभी नहीं भुला सका कभी ख़ुशी से मैं जिसे गले नहीं लगा सका मैं उस सेे जितना दूर हूँ वो उतना मेरे पास है मेरा ये मन उदास है कोई जो जंग हो कभी किसी के संग हो कभी उसी को देखता हूँ मैं उसी को सोचता हूँ मैं ना हारने का ग़म है फिर ना जीतने की आस है मेरा ये मन उदास है
Rohit tewatia 'Ishq'
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‘’निगाह’’ किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी अक्स मेरा मिलेगा जिस जगह देखोगी जान मोहब्बत फ़िज़ूल नहीं बस थोड़ा सब्र करो नाग़वार गुज़रे इश्क़ की पनाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर मसअला कुछ इनकार का ज़रूर रहा होगा जिस सेे ख़ुद बे-ख़बर हूँ वो मेरा क़ुसूर रहा होगा फिर इल्ज़ाम सारे बेबुनियाद से आएँगे आगे मेरे ख़िलाफ़ ना एक मिलेगा जो गवाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर तेरा छोड़ के जाना मोहब्बत की तौहीन था मेरा क्या? मेरा दिल तो टूटने का शौक़ीन था अभी एक दुआ क़ुबूल होनी आम बात समझती हो फिर कोई मंदिर और सालो साल कोई दरग़ाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी
Rohit tewatia 'Ishq'
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