nazmKuch Alfaaz

हम बंजारे दिल वाले हैं और पैंठ में डेरे डाले हैं तुम धोका देने वाली हो? हम धोका खाने वाले हैं इस में तो नहीं शर्माओगी? क्या धोका देने आओगी? सब माल निकालो, ले आओ ऐ बस्ती वालो ले आओ ये तन का झूटा जादू भी ये मन की झूटी ख़ुश्बू भी ये ताल बनाते आँसू भी ये जाल बिछाते गेसू भी ये लर्ज़िश डोलते सीने की पर सच नहीं बोलते सीने की ये होंट भी, हम से क्या चोरी क्या सच-मुच झूटे हैं गोरी? इन रम्ज़ों में इन घातों में इन वादों में इन बातों में कुछ खोट हक़ीक़त का तो नहीं? कुछ मैल सदाक़त का तो नहीं? ये सारे धोके ले आओ ये प्यारे धोके ले आओ क्यूँँ रक्खो ख़ुद से दूर हमें जो दाम कहो मंज़ूर हमें इन काँच के मनकों के बदले हाँ बोलो गोरी क्या लोगी? तुम एक जहान की अशरफ़ियाँ? या दिल और जान की अशरफ़ियाँ?

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं दाँत थे मैं ने दूध पिला कर सात बरस में पाले आ कर उन को ले गए चूहे लंबी मोंछों वाले गुड़ का उन को माट मिला था मीठा और मज़ेदार लाख ख़ुशामद कर के मुझ से ले लिए दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बिल्ली थी इक मामी मौसी चुपके चुपके आई पंजों पर थी देग की खुरचन होंटों पर बालाई बोली गुड़ के माट पे मैं ने चूहे देखे चार हिस्सा आधों-आध रहेगा दे दो दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बा'द में बूढ़ा मोती आया रोनी शक्ल बनाए बोला बीबी इस बिल्ली का कुछ तो करें उपाए दूध न छोड़े गोश्त न छोड़े हैं बुढ्ढा लाचार इस को करूँँ शिकार जो मुझ को दे दो दाँत उधार अच्छी मुन्नी तुम ने अपने इतने दाँत गँवाए कुछ चूहों ने कुछ बिल्ली ने कुछ मोती ने पाए बाक़ी जो दो-चार रहे हैं वो हम को दिलवाओ इक दावत में आज मिलेंगे तिक्के और पोलाव मुर्ग़ी के पाए का सालन बैगन का आचार दोगी या किसी और से माँगूँ हाँ दिए उधार बाबा हाँ हाँ दिए उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं

Ibn E Insha

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ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता

Ibn E Insha

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इंशा'-जी ये कौन आया किस देस का बासी है होंटों पे तबस्सुम है आँखों में उदासी है ख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा है या सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा है तरसी हुई नज़रों को अब और न तरसा रे ऐ हुस्न के सौदागर ऐ रूप के बंजारे रमना दिल-ए-'इंशा' का अब तेरा ठिकाना हो अब कोई भी सूरत हो अब कोई बहाना हो ख़ाकिस्तर-ए-दिल को है फिर शोला-ब-जाँ होना हैरत का जहाँ होना हसरत का निशाँ होना ऐ शख़्स जो तू आ कर यूँँ दिल में समाया है तू दर्द कि दरमाँ है तो धूप कि साया है? नैनाँ तिरे जादू हैं गेसू तिरे ख़ुश्बू हैं बातें किसी जंगल में भटका हुआ आहू हैं मक़्सूद-ए-वफ़ा सुन ले क्या साफ़ है सादा है जीने की तमन्ना है मरने का इरादा है

Ibn E Insha

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तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए वक़्त की बे-उनवान कहानी कब तक बे-उनवान रहे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी ऐ मिरे ख़ुल्द-ए-ख़याल की हूर इतने दिनों जो मैं घुलता रहा हूँ तेरे बिना यूँँही दूर ही दूर सोच तो क्या फल मुझ को मिला मैं मन से गया फिर तन से गया शहर-ए-वतन में अजनबी ठहरा आख़िर शहर-ए-वतन से गया रूह की प्यास बुझानी थी पर यहाँ होंटों की प्यास भी बुझ न सकी बचते सँभलते भी एक सुलगता रोग बनी मिरे जी की लगी दूर की बात न सोच अभी मिरे हात में तू ज़रा हात तो दे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए बाग़ में है इक बेले का तख़्ता भीनी है इस बेले की सुगंध ऐ कलियो क्यूँँ इतने दिनों तुम रक्खे रहीं इसे गोद में बंद कितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिए तुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सके सहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगे फिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी वक़्त की बातें रंग और बू हर कोई साथ किसी का ढूँडे गुल हों कि बेले मैं हूँ कि तू जो कुछ कहना है अभी कह ले जो कुछ सुनना है सुन ले तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन जूड़े के इन्हीं फूलों को देखो कल की सी इन में बास कहाँ एक इक तारा कर के डूबी माथे की तन्नाज़ अफ़्शाँ सहने का दुख सह न सके हम कहने की बातें कह न सके पास तिरे कभी आ न सके हम दूर भी तुझ से रह न सके किस से कहे अब रूह की बिपता किस को सुनाए मन की बात दूर की राह भटकता राही जीवन-रात घनेरी रात होंटों की प्यास बुझानी है अब तिरे जी को ये बात लगे न लगे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे? लिए नहीं अपने लिए

Ibn E Insha

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ये बच्चा काला काला सा ये काला सा, मटियाला सा ये बच्चा भूखा भूखा सा ये बच्चा सूखा सूखा सा ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पर तन्हा बैठा है ना इस के पेट में रोटी है ना इस के तन पर कपड़ा है ना इस के सर पर टोपी है ना इस के पैर में जूता है ना इस के पास खिलौना में कोई भालू है कोई घोड़ा है ना इस का जी बहलाने को कोई लोरी है कोई झूला है ना इस की जेब में धेला है ना इस के हाथ में पैसा है ना इस के अम्मी-अब्बू हैं ना इस की आपा ख़ाला है ये सारे जग में तन्हा है ये बच्चा कैसा बच्चा है ये सहरा कैसा सहरा है ना इस सहरा में बादल है ना इस सहरा में बरखा है ना इस सहरा में बाली है ना इस सहरा में ख़ोशा है ना इस सहरा में सब्ज़ा है ना इस सहरा में साया है ये सहरा भूख का सहरा है ये सहरा मौत का सहरा है ये बच्चा कैसे बैठा है ये बच्चा कब से बैठा है ये बच्चा क्या कुछ पूछता है ये बच्चा क्या कुछ कहता है ये दुनिया कैसी दुनिया है ये दुनिया किस की दुनिया है इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है कहीं बादल घिर-घिर आते हैं कहीं चश्मा है कहीं दरिया है कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं कहीं महफ़िल है, कहीं मेला है कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे ये रेशम है, ये दीबा है कहीं ग़ल्ले के अम्बार लगे सब गेहूँ धान मुहय्या है कहीं दौलत के संदूक़ भरे हाँ ताँबा, सोना, रूपा है तुम जो माँगो सो हाज़िर है तुम जो चाहो सो मिलता है इस भूख के दुख की दुनिया में ये कैसा सुख का सपना है वो किस धरती के टुकड़े हैं ये किस दुनिया का हिस्सा है हम जिस आदम के बेटे हैं ये उस आदम का बेटा है ये आदम एक ही आदम है वो गोरा है या काला है ये धरती एक ही धरती है ये दुनिया एक ही दुनिया है सब इक दाता के बन्दे हैं सब बंदों का इक दाता है कुछ पूरब-पच्छिम फ़र्क़ नहीं इस धरती पर हक़ सबका है ये तन्हा बच्चा बेचारा ये बच्चा जो यहाँ बैठा है इस बच्चे की कहीं भूख मिटे (क्या मुश्किल है, हो सकता है इस बच्चे को कहीं दूध मिले (हाँ दूध यहाँ बहुतेरा है) इस बच्चे का कोई तन ढाँके (क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है) इस बच्चे को कोई गोद में ले (इंसान जो अब तक ज़िन्दा है) फिर देखिए कैसा बच्चा है ये कितना प्यारा बच्चा है इस जग में सब कुछ रब का है जो रब का है, वो सबका है सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं हर चीज़ में सबका साझा है जो बढ़ता है, जो उगता है वो दाना है, या मेवा है जो कपड़ा है, जो कंबल है जो चाँदी है, जो सोना है वो सारा है इस बच्चे का जो तेरा है, जो मेरा है ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा सबका बच्चा है

Ibn E Insha

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