nazmKuch Alfaaz

हमारा राजा अंधा और बहरा राजा अपनी बनाई रतौंधी में मस्त है न देख सकता है न सुन सकता है जड़ पत्थर सा कि हमें क्या कष्ट है पर राजा न जानें कहाँ से पता करता महसूस कर लेता कि जनता की जेब में है पैसे महँगाई बढ़ा कर टेक्स लगा कर हज़ार करोर से बहाने बना कर निकलवा लेता है कैसे न कैसे राजा अहंकार से भरा राजा बना रहता है सब से खरा राजा हल्क़ से निवाले खींचता है राजा हमारी दुर्दशा से आँखें मीचता है राजा पाँच साल में एक बार आता है राजा पथराई आँखों को सपने दिखता है राजा फिर पाँच साल को महल में सो जाता है जनता को बताया जाता है यही कि राजा होता है हमेशा सही राजा जनता की सेवा में वयस़्त है जबकि जानते हैं सभी हमारा राजा अपनी बनाई रतौंधी में मस्त है उसे क्या मतलब हम से कि हमें क्या दुख है क्या कष्ट है

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ

Lal Chand Falak

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"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ

ZafarAli Memon

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मत शिकायत करो कि सरकार सो रही है ज़बाँ पे लगाम रखो कि सरकार सो रही है महँगाई ने बे-शक जीना मुहाल किया है दिल की दिल में रखो कि सरकार सो रही है मत लगाओ नारे न उतरो सड़क पर जेल जाओगे पिटोगे, डरो कि सरकार सो रही है रोज़ दाम बढ़ाती है शायद हुक्म मिला है कहीं से जल्दी जेब ढीली करो कि सरकार सो रही है ये शाह ख़र्च है कि हुकूमत है इन की आम आदमी हो सड़-सड़ मरो कि सरकार सो रही है क़त्ल-ओ-ग़ारत हो कि इस्मतें लुटें रोज़ाना अपनी जाँ की ख़ैर करो कि सरकार सो रही है

Madhav Awana

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ऊँची ऊँची इमारतों में मेरे हिस्से का आसमान लापता मसरूफ़ से इस शहर में जिस्म तो हैं इंसान लापता सुनते थे कभी मिला करते थे जहाँ दिल के बदले दिल तेरे इस शहर में अब इश्क़ की है वो दुकान लापता इस शहर में बुत-कदे भी हैं और मस्जिदें भी तमाम इंसान की फ़ितरत देख कर हुए हैं भगवान लापता वाह री जम्हूरियत हम जिन्हें सौंपते हैं मुल्क अपना उन में अक़्ल है होशियारी है ताक़त है बस ईमान लापता न जाने कौन सी बिजली गिरी कि उड़ना भूल गया मेरे दिल के अरमानों के पर तो हैं पर उड़ान लापता

Madhav Awana

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फिर वही माहौल वही शोर-शराबा वही कुछ नए पुराने चेहरों का बोल-बाला फिर से सज गई तब्दीलियों की मंडियाँ पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला फिर चीख़ते फिर रहे बद-हवा से चेहरे फिर रचे जानें लगें हैं षड्यंत्र गहरे फिर से गूँजने लगें हैं फ़ज़ाओं में नारे पिछलग्गू बन गए हैं कुछ भूक के मारे फिर से ये बताई जाने लगी बदलाव की बातें फिर से कुर्सी क़ब्ज़ाने को होने लगीं हैं घातें फिर से आ गया है चुनाव का मौसम पांच-साला पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला कुछ आ जाएँगे चेहरे नए पुराने बन के रहनुमा लग जाएँगे देश को खाने फिर शुरूअ' होगा आम आदमी की तक़दीर से खेल फिर भेजा जाएगा कुछ हारे हुओं को जेल फिर से न्याय का ढोंग रचाया जाएगा आदमी को रोटी के वा'दे से बहलाया जाएगा फिर से होगा लूट-खसूट का नंगा नाच फिर झूठ को बताया जाएगा साँच मुझे जलाएगी मेरे अंदर की आँच और टूटते सपने चुभेंगे बन के काँच फिर से ज़िंदगी बुनने लगेगी मकड़-जाला मैं जानता हूँ कि कुछ नहीं बदलने वाला

Madhav Awana

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नाम बे-शक आम आदमी हो पर मैं तो मसीहा हूँ काँधे पर अपने करमों की सलीब दूर से तमाशाई मेरे हबीब मेरे रिश्ते मेरे फ़र्ज़ मेरा बीते वक़्त की परछाइयाँ सब मुझ पर कोड़े बरसाते ले जा रहें हैं अजनबी से मक़ाम पर लानतें बरसाते मेरे नाम पर मुझे रोज़ धक्कियाते और इस पर मजबूरी कि मुझे ख़ामोश रहना है सब चुप-चाप सहना है कोई न माने की मैं क्या हूँ पर मैं भी मसीहा हूँ

Madhav Awana

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देख कर किसी का देश के लिए उपवास, हम नेताओं का उड़ाते हैं उपहास और देते हैं गालियाँ बस हमारा फ़र्ज़ पूरा जब भी होता है कोई आन्दोलन हम यार दोस्तों का कर के सम्मलेन निगाह सरकार पे डालते हैं सवालिया बस हमारा फ़र्ज़ पूरा देश जाता है जहाँ जाए नेता चाहे जैसे भी देश को चलाएँ हम ड्यूटी कर देते हैं पाँच साल बस हमारा फ़र्ज़ पूरा पानी हो चला है हमारा ख़ून अब कहाँ देश-भक्ति का जुनून रोज़ कहते हैं अच्छा नहीं हमारा क़ानून बस हमारा फ़र्ज़ पूरा हम डर से मानते हैं क़ानून-क़ाएदा ऐसी आज़ादी का क्या फ़ाएदा सच मानते हैं पाँच साल वाला वअ'दा बस हमारा फ़र्ज़ पूरा जल्दी भुला देते हैं ऊपर पड़ी लात को फिर क्यूँँ भुनते हैं हम बिना बात को जब इतना ही बहाना बनाना है हम आप को कि बस हमारा फ़र्ज़ पूरा

Madhav Awana

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