देख कर किसी का देश के लिए उपवास, हम नेताओं का उड़ाते हैं उपहास और देते हैं गालियाँ बस हमारा फ़र्ज़ पूरा जब भी होता है कोई आन्दोलन हम यार दोस्तों का कर के सम्मलेन निगाह सरकार पे डालते हैं सवालिया बस हमारा फ़र्ज़ पूरा देश जाता है जहाँ जाए नेता चाहे जैसे भी देश को चलाएँ हम ड्यूटी कर देते हैं पाँच साल बस हमारा फ़र्ज़ पूरा पानी हो चला है हमारा ख़ून अब कहाँ देश-भक्ति का जुनून रोज़ कहते हैं अच्छा नहीं हमारा क़ानून बस हमारा फ़र्ज़ पूरा हम डर से मानते हैं क़ानून-क़ाएदा ऐसी आज़ादी का क्या फ़ाएदा सच मानते हैं पाँच साल वाला वअ'दा बस हमारा फ़र्ज़ पूरा जल्दी भुला देते हैं ऊपर पड़ी लात को फिर क्यूँँ भुनते हैं हम बिना बात को जब इतना ही बहाना बनाना है हम आप को कि बस हमारा फ़र्ज़ पूरा
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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं
Divya 'Kumar Sahab'
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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फिर वही माहौल वही शोर-शराबा वही कुछ नए पुराने चेहरों का बोल-बाला फिर से सज गई तब्दीलियों की मंडियाँ पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला फिर चीख़ते फिर रहे बद-हवा से चेहरे फिर रचे जानें लगें हैं षड्यंत्र गहरे फिर से गूँजने लगें हैं फ़ज़ाओं में नारे पिछलग्गू बन गए हैं कुछ भूक के मारे फिर से ये बताई जाने लगी बदलाव की बातें फिर से कुर्सी क़ब्ज़ाने को होने लगीं हैं घातें फिर से आ गया है चुनाव का मौसम पांच-साला पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला कुछ आ जाएँगे चेहरे नए पुराने बन के रहनुमा लग जाएँगे देश को खाने फिर शुरूअ' होगा आम आदमी की तक़दीर से खेल फिर भेजा जाएगा कुछ हारे हुओं को जेल फिर से न्याय का ढोंग रचाया जाएगा आदमी को रोटी के वा'दे से बहलाया जाएगा फिर से होगा लूट-खसूट का नंगा नाच फिर झूठ को बताया जाएगा साँच मुझे जलाएगी मेरे अंदर की आँच और टूटते सपने चुभेंगे बन के काँच फिर से ज़िंदगी बुनने लगेगी मकड़-जाला मैं जानता हूँ कि कुछ नहीं बदलने वाला
Madhav Awana
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ऊँची ऊँची इमारतों में मेरे हिस्से का आसमान लापता मसरूफ़ से इस शहर में जिस्म तो हैं इंसान लापता सुनते थे कभी मिला करते थे जहाँ दिल के बदले दिल तेरे इस शहर में अब इश्क़ की है वो दुकान लापता इस शहर में बुत-कदे भी हैं और मस्जिदें भी तमाम इंसान की फ़ितरत देख कर हुए हैं भगवान लापता वाह री जम्हूरियत हम जिन्हें सौंपते हैं मुल्क अपना उन में अक़्ल है होशियारी है ताक़त है बस ईमान लापता न जाने कौन सी बिजली गिरी कि उड़ना भूल गया मेरे दिल के अरमानों के पर तो हैं पर उड़ान लापता
Madhav Awana
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मत शिकायत करो कि सरकार सो रही है ज़बाँ पे लगाम रखो कि सरकार सो रही है महँगाई ने बे-शक जीना मुहाल किया है दिल की दिल में रखो कि सरकार सो रही है मत लगाओ नारे न उतरो सड़क पर जेल जाओगे पिटोगे, डरो कि सरकार सो रही है रोज़ दाम बढ़ाती है शायद हुक्म मिला है कहीं से जल्दी जेब ढीली करो कि सरकार सो रही है ये शाह ख़र्च है कि हुकूमत है इन की आम आदमी हो सड़-सड़ मरो कि सरकार सो रही है क़त्ल-ओ-ग़ारत हो कि इस्मतें लुटें रोज़ाना अपनी जाँ की ख़ैर करो कि सरकार सो रही है
Madhav Awana
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मैं ने कहा ये मुल्क एक है तो सब के लिए एक सा हो क़ानून तो उन्होंने कहा कि मैं फिरका-परस्त की तरह बोलता हूँ मैं ने कहा कि मंदिर मस्जिद से ज़ियादा ज़रूरी है ता'लीम हर इंसान को और हर पेट को रोटी तो उन्होंने कहा कि मैं नास्तिक सा ईश्वर को ज़रूरत में तोलता हूँ मैं ने कहा कि तुम हम ने चुने हो तो हमारा विकास करो न सिर्फ़ अपनी तिजोरियाँ भरो तो उन्होंने कहा कि मैं बे-वज्ह राज़ खोलता हूँ मैं ने कहा सारा मुल्क एक है बस कुछ दिन में बदल देंगे मिल कर हम सारा निज़ाम वो कुछ नहीं बोले अब बस हँसते रहे मेरी बात और मेरे ख़यालात पर अब वो सब ज़ोर से हँस रहे है और मेरे पाँव जैसे धरती में धँस रहे हैं मैं जानता हूँ कि वो सारे मुल्क पर हँस रहे हैं
Madhav Awana
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हमारा राजा अंधा और बहरा राजा अपनी बनाई रतौंधी में मस्त है न देख सकता है न सुन सकता है जड़ पत्थर सा कि हमें क्या कष्ट है पर राजा न जानें कहाँ से पता करता महसूस कर लेता कि जनता की जेब में है पैसे महँगाई बढ़ा कर टेक्स लगा कर हज़ार करोर से बहाने बना कर निकलवा लेता है कैसे न कैसे राजा अहंकार से भरा राजा बना रहता है सब से खरा राजा हल्क़ से निवाले खींचता है राजा हमारी दुर्दशा से आँखें मीचता है राजा पाँच साल में एक बार आता है राजा पथराई आँखों को सपने दिखता है राजा फिर पाँच साल को महल में सो जाता है जनता को बताया जाता है यही कि राजा होता है हमेशा सही राजा जनता की सेवा में वयस़्त है जबकि जानते हैं सभी हमारा राजा अपनी बनाई रतौंधी में मस्त है उसे क्या मतलब हम से कि हमें क्या दुख है क्या कष्ट है
Madhav Awana
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