मैं मरने के लिए पैदा नहीं हुआ मुझ पर किसी क़िस्म का हमला उस मुआहिदे की ख़िलाफ़-वरज़ी होगी जिस पर एक ग़ैबी हाथ और मैं ने दस्तख़त किए थे और जिस की रू से मौत मुझ पर बर-हक़ नहीं ठहरी थी ज़िंदा रहना अब मेरा दर्द-ए-सर नहीं मैं ये फ़रीज़ा तारीख़ को सौंप चुका हूँ तारीख़ जो मेरी रगों में ज़हर की सूरत दाख़िल हुई और अब अमृत बन कर मेरे मसामों से क़तरा क़तरा टपक रही है मौत से मेरी कोई शनासाई नहीं मैं उस से दरख़्वास्त करूँँगा वो मेरे ख़िलाफ़ किसी साज़िश में शरीक न हो कि मेरे पास मुआहिदे की जो नक़्ल महफ़ूज़ है उस पर उस के दस्तख़त बतौर-ए-गवाह मौजूद हैं
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बीवी मुझ से कहती है सारा दिन लेटे रहने और नज़्में लिखने से घर कैसे चलेगा नज़्में रोटियाँ तो नहीं कि बच्चों का पेट भर सकें तुम तो अपना पेट शाएरी की तलवार से काट कर मुस्तक़बिल की खूँटी से लटका चुके हो लेकिन हमारे पेट इतने शाइराना नहीं सोचता हूँ बीवी ठीक कहती है नज़्में तो ग़ैब से उतर आती हैं लेकिन रोटियाँ ग़ैब के तन्नूर में नहीं पकतीं वैसे भी शाएरी को ज़िंदा रखने के लिए पेट पर रोटी बाँधनी ज़रूरी है लेकिन मैं उसे दरख़्वास्त करूँँगा वो मुझे एक नज़्म और लिख लेने दे आख़िरी नज़्म जिस में आने वाली कल के लिए कोई ता'रीफ़ नहीं होगी जिस में गुज़र जाने वाली कल के लिए कोई पछतावा नहीं होगा जिस में आज के किसी दुख का मातम नहीं होगा हर लिहाज़ से मुकम्मल नज़्म
Javed Shaheen
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अगर सर्दियों की किसी रात को कोई भूका गदागर मिरे घर पे आवाज़ दे उस को रोटी का टुकड़ा न दूँगा झुलसती हुई सख़्त दोपहर में कोई बे-कस मुसाफ़िर कहीं प्यास से गिर पड़े उस को पानी का क़तरा न दूँगा मिरा कोई हम-साया मुल्क-ए-अदम को सिधारे तो उस के जनाज़े को कंधा न दूँगा किसी ने मिरी बे-हिसी का सबब मुझ से पूछा तो उस से कहूँगा मिरे शहर में जिस क़दर नेकियाँ थीं वो इक शख़्स की बे-वफ़ाई पे रो कर कहीं आसमानों में गुम हो गई हैं
Javed Shaheen
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बड़ी मुश्किलों से दर्द-ए-ज़ेह में मुब्तला चुप ने एक आवाज़ को जनम दिया मैं ने उसे गोद ले लिया पाल-पोस कर बड़ा किया और उस की ज़बान पर एक लफ़्ज़ रखा मगर वो गूँगी निकली मैं ने मायूसी में उसे क़त्ल कर दिया और पकड़ा गया लाश ठिकाने लगाते वक़्त मुझ पर मुक़द्दमा चला क़त्ल के इल्ज़ाम में मगर मुझे फाँसी की सज़ा हुई एक लफ़्ज़ किसी ज़बान पर रखने के जुर्म में
Javed Shaheen
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बाहर एक आवाज़ है तमाम आवाज़ों से मुख़्तलिफ़ फ़ज़ा की मुर्दा शिरयानों में एक ताज़ा सच्चाई भर देने वाली आवाज़ बे-हिस मकानों मंडलाती हुई मेरे दरवाज़े पर दस्तक देती हुई कभी मद्धम कभी तेज़ एक बेचैन दस्तक मुझ से कुछ कहना चाहती है मुझ तक पहुँचाना चाहती है थोड़े ही फ़ासले पर खड़े एक मौसम की बात शायद मेरी ही कोई बात लेकिन मैं दरवाज़े तक कैसे जाऊँ उसे कैसे खोलूँ बाहर खड़े मौसम को अंदर कैसे लाऊँ मैं तो अर्सा हुआ अपने हाथ पाँव ब-तौर-ए-ज़मानत रख चुका हूँ किस जुर्म में किस के पास रख चुका हूँ बिल्कुल भूल चुका हूँ
Javed Shaheen
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मैं ने रात से पूछा ''मेरे घर से चोरी हो जाने वाला ख़्वाब तुम्हारे पास तो नहीं मेरे हम-साए के बच्चों का ख़्वाब घरों में बैठी जवाँ लड़कियों के ख़्वाब शहर से हिजरत कर जाने वाले सारे ख़्वाब तुम्हारे पास तो नहीं''? रात मेरी आँखों में झाँक कर बोली ''इतने सारे ख़्वाबों का चोरी हो जाना और शोर न मचना इतने सारे ख़्वाबों का क़त्ल हो जाना और सुराग़ न चलना इतनी सारी लाशों का दरिया में बहा दिया जाना और पानी का रंग न बदलना कैसे मुमकिन है तुम्हारी मर्ज़ी के बग़ैर तुम्हारी शिरकत के बगै़र'' फिर वो गोद में उठाया हुआ चाँद मेरी तरफ़ बढ़ा कर बोली: ''इस के सर पर हाथ रखो और क़सम खाओ अपनी बे-गुनाही की अपनी मासूमियत की'' और मैं उस का मुँह तकता रह गया
Javed Shaheen
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