यहाँ न कोई दरख़्त होगा न फूल पत्ते न घास शबनम न चाँद रातों को अपना चेहरा दिखा सकेगा न दिन को सूरज हवा सलाख़ों से सर पटख़ कर गले में फंदा लिए यूँँही दर-ब-दर फिरेगी ये मेरी धरती यूँँही रहेगी ख़िज़ाँ हवाओं ने उस की शादाबियों के मंज़र उजाड़ने को वो गुल खिलाए क़ज़ा भी क़िस्तों में आ रही है मिरा वतन एक बूढे बरगद की शाख़-ए-नाज़ुक बना हुआ है मिरी दुआ है कि मैं भी कर्ब-ओ-बला से गुज़रूँ कि ऐसे शादाब मंज़रों का उजाड़-पन मैं न देख पाऊँ
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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सर्दियों के मौसम में पिछली रात को छत पर हम जो एक दूजे से चाँदनी की बारिश में बे-ज़बान जज़्बों की ख़ुशबुओं से मिलते थे हुस्न-ए-दिलरुबा तेरा लफ़्ज़ की हक़ीक़त से कितना बे-तअल्लुक़ था अन-कहा सुना सब कुछ लम्हा-ए-मसर्रत था जब से लब-कुशाई के सिलसिले हुए जारी तेरी मेरी बहसों ने अन-कहा सुना सब कुछ मंतिक़ों दलीलों के वाहिमों से गदलाया और फिर मोहब्बत के सब गुलाब सँवलाए आज अज्नबिय्यत की बे-समर फ़ज़ाओं में हम कि एक दूजे से कितने बे-तअल्लुक़ हैं अव्वलीं रिफ़ाक़त की सारी ख़स्लतें खो कर इस बिसात-ए-हस्ती पर सिर्फ़ दो पयादे हैं
Yusuf Kamran
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कभी लड़कियों के तनोमंद जिस्मों में सूरज की ताबानियाँ देखने को मकानों की छत पर खड़े हो के यारो जो हम नंगे पाँव के तलवे जलाते तो अपने बदन की हरारत से सारी नसें फड़फड़ातीं मगर लड़कियों को ख़बर तक न होती अगर अब मकानों की ऊँची छतों पर खड़े हो के तुम ने तनोमंद जिस्मों में सूरज की ताबानियाँ देखनी हों तो तलवे जलाने से बेहतर यही है कि कुछ गुनगुनाओ तुम्हारे बदन की नसें सर्द करने को सब लड़कियाँ बा-ख़बर हो चुकी हैं
Yusuf Kamran
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तू कभी रातों की तन्हाई में मेरे पास आ मेरे कानों से मिरी ख़ामोशियों के साज़ सुन तू मिरी आवाज़ सुन मेरी आँखों में मचलते मोतियों के रंग देख तू कभी क़ल्ब-ओ-नज़र की जंग देख देख मैं किन एहतियातों के सुनहरी जाल को दर्द में डूबी हुई छाँव के इस जंजाल को आरज़ूओं के झरोकों में सुलगती हड्डियों के गिर्द चिमटाए हुए ख़्वाहिशों की आग को फिर ध्यान की चुनरी में कफ़्नाए हुए मुंतज़िर हूँ फिर उसी आवाज़ का ज़िंदगी के साज़ का तू कभी रातों की तन्हाई में मेरे पास आ
Yusuf Kamran
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आओ दूर चलें पीपल की हरी हरी छाँव में बैठ के दिल बहलाएँ शहर की इस गहमा-गहमी में अब तो जी घबराता है रानी देखो इस नगरी में न कोई कृष्न न राधा है ये तो शहर है प्यारी कारोबारी दुनिया है मन से ख़ाली तन वाले हैं धन ही उन का गहना है झूटी रस्में झूटे बंधन झूटा उन का प्यार कारोबारी ज़ेहनों वाले होते हैं खूँ-ख़्वार धन दौलत में तोल के देखें हर निर्धन का प्यार शहर में क्या रक्खा है आओ दूर चलें हरे भरे खेतों में चल के अपने ज़ख़्म सिएँ दूर कहीं मंदिर के पीछे बैठ के दिल बहलाएँ दूर कहीं पीपल के नीचे मन की जोत जगाएँ आओ ग़म को भूल भी जाएँ आओ शहर से दूर चलें
Yusuf Kamran
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ये आग पानी हवा ये मिट्टी ये वाहिमों की करिश्मा-साज़ी ये इल्म-ओ-फ़न के तमाम क़िस्से ये अक़्ल-ओ-दानिश की सारी बातें ये सब दिलासे बनावटी हैं मैं दोस्तों दुश्मनों की ज़द में हूँ हर कोई पेश-गोइयों के दराज़ क़िस्से सुना रहा है कि सब को अपने करंसी नोटों की फ़िक्र है हर कोई तलब और रसद के चक्कर में अपने भाव चढ़ा रहा है खुली फ़ज़ाओं में पर समेटे हुए परिंदे भी आने वाली सऊबतों के मुहीब मंज़र दिखा रहे हैं ये क्या है सब कुछ कि कुछ नहीं है हवा से की दस्तरस से बाला मिरे लिए सिर्फ़ वो सदाक़त है जो मिरे जिस्म-ओ-जाँ को छू कर गुज़र रही है कि मैं हक़ीक़ी मुशाहिदों तजरबों की भट्टी में जल रहा हूँ ये आग पानी हवा न मिट्टी है सिर्फ़ मैं हूँ ये सिर्फ़ मैं हूँ
Yusuf Kamran
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