''यक़ीन है मुझे'' यक़ीन है मुझे ख़ुद पर तुझ पर और उस ख़ुदा पर तू मिलेगा फिर वहीं छोड़ गया था जहाँ पर मैं एकतरफ़ा प्यार शिद्दत से निभाऊँगा तू नहीं चाहती तो मेरे मरने की दुआ कर सब तो मिट्टी होंगे चाहे दफ़नाकर या जलाकर तू भी मिलेगा फिर वहीं छोड़ गया था जहाँ पर यक़ीन है मुझे ख़ुद पर तुझ पर और उस ख़ुदा पर मैं और याद आऊँगा ये मेरा वा'दा है तुझ सेे तू एक बार भूलने की कोशिश तो कर भुलाकर मर जाऊँगा तो ये जिस्म तो सो जाएगा क़ब्र में मगर मुहब्बत रूह को ले कर आएगी शायद जगाकर इस लिए भी मैं ने तुझे जाने दिया था उस के पास मज़ा ही क्या किसी को पाना वो भी रुला कर तू याद भी कर ले तो बस मुझे इश्क़ मुकम्मल है चल याद कर ले मुझ को तू इतनी सी दया कर मेरा इश्क़ देख कर ख़ुदा अगले जनम ये करेगा तेरा मेरा नाम साथ लिख देगा उस का मिटाकर यक़ीन है मुझे ख़ुद पर तुझ पर और उस ख़ुदा पर तू मिलेगा फिर वहीं छोड़ गया था जहाँ पर
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"तुम फिर चली जाना" कुछ दिन बाक़ी है जीने को काफ़ी है थोड़ा और सताना तुम फिर चली जाना बस अब यही है पाना साथ तस्वीर खींचवाना ज़िंदा रहूँ इस के लिए इक बार गले लग जाना इतना बस रिश्ता निभाना तुम फिर चली जाना महफ़िल में शे'र पढूँगा शे'र में तेरा नाम कहूँगा नहीं तेरी बदनामी होगी ये पाँच साल बा'द करूँँगा महफ़िल बनकर मुस्कुराना तुम फिर चली जाना ख़ुश रहूँगा चैन से सोना याद आए तो थोड़ा रोना इस जनम तू उस की हो जा किसी जनम बस मेरी होना कहीं मिलना तो चेहरा छुपाना तुम फिर चली जाना
100rav
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“कृष्ण है” प्यार भाव का दर्पण कृष्ण है भक्ति रस का समर्पण कृष्ण है तुम प्रेम से बस पुकारो तो सुख करता अर्पण कृष्ण है वो परमेश्वर अंत भी अनंत भी नयन मूँद कर दर्शन कृष्ण है परिस्थिति से हार मत मानो किस का चाहिए समर्थन कृष्ण है ढूँढो तो कहीं नहीं समझो तो गौ गोपी और गोवर्धन कृष्ण है महाभारत हो या जीवन संघर्ष बनो अर्जुन तो हर रण कृष्ण है
100rav
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"तुम दिखोगी" सारी दुनिया को छोड़कर मेरी आँखों में देखोगी तो एक दुनिया दिखेगी जहाँ सिर्फ़ तुम दिखोगी वो पैसे वाला होगा मगर मेरी जेब में अगर देखोगी तो एक बटवा मिलेगा बटवे में भी तुम दिखोगी चुपके से मेरे ख़्वाब में आना वहाँ इक लड़की दिखेगी जिस की बाँहों में मेरा सर होगा ग़ौर से उस का चेहरा देखोगी तो चेहरे में तुम दिखोगी तुम दोनों की तस्वीर तो है किसी रोज़ मैं मर जाऊँ पोस्टमार्टम होने के बा'द निकलेगी दिल से तस्वीर ख़ून साफ़ कर के अगर देखोगी तो तुम दिखोगी
100rav
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"वो मैं हूँ" फूलों के बाग़ों से चले तो जो सहरा कर देता है वो मैं हूँ ज़ख़्म पे दवाई लगाकर ज़ख़्म गहरा कर देता है वो मैं हूँ अच्छे लोग भागते हैं मुझ सेे और कभी शरीक नहीं होने देते बारात त्योहार या अच्छे ख़ासे जलसे का जो बुरा कर देता है वो मैं हूँ तुम मेरा नाम लेना और देखना क़िस्मत तुम्हारी भी फूट जाएगी नए जन्में बच्चे को गोद में ले के बूढ़ा या अधमरा कर देता है वो मैं हूँ मेरे घर वालों ने भी मुझे इस लिए ही कच्ची उम्र में फेंक दिया था नासूर बीमारी से जो घर बिकवाकर क़र्ज़ा कर देता है वो मैं हूँ शैतान भी आधी रात में मेरा नाम लेने से घबराता है अब तो जो अपनी इक आँख बंद कर दज्जाल सा चेहरा कर देता है वो मैं हूँ ख़ुदा ने इस लिए मुझे बद सेूरत बनाया कि कोई पसंद न करे वो मनहूस परछाई जो दिन में अँधेरा कर देता है वो मैं हूँ मैं वो इंसान हूँ जो सजदे नहीं करता बस नशे करता है जो हवस को मुहब्बत बना कर मिट्टी को ख़ुदा कर देता है वो मैं हूँ
100rav
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"मुहब्बत का दुख" प्यार, न जता पाने का दुख उस को पता लग जाए तो उस की नाराज़गी फिर उस सेे नज़र अंदाज़ होना सब सेे पाक चीज़ मुहब्बत करने के लिए मुआ'फ़ी फिर उस की नफ़रत का दुख हाए रे ये मुहब्बत का दुख सोचना कम से कम उस का दोस्त बन के जी लूँ ता-'उम्र ऐसा फिर न होगा ये समझाना वो नहीं मेरी ख़ुद को समझाना कभी रोते हुए रात काटना कभी रोते हुए रात का मुझे काटना मैसेज करो तो घंटो रिप्लाई नहीं गिरती हुई अपनी 'इज़्ज़त का दुख हाए रे ये मुहब्बत का दुख तू उस की बन मुझे ग़म नहीं मुझे मुहब्बत करने से न रोक मैं तुझे मुहब्बत बिना देखे बिना छुए बिना तकलीफ़ दिए भी कर सकता हूँ वो करने दे ये हक़ है मेरा दिक़्क़त है तो बता इस सेे भी मैं दूर कर लूँगा ख़ुद को लेकिन तुझे कभी तकलीफ़ नहीं दूँगा झेल लूँगा मैं हिजरत का दुख नहीं होने दूँगा तुझे मुहब्बत का दुख
100rav
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