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ग़ुलामी की अगर जो बात आ जाए क़सम है यार मर या मार जाएँगे

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ज़मीं भी सूख जाती है हमारे ही दिलों की यूँँ हमें देखे तरस तो फिर तरस को भी तरस आए

Raunak Karn

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ज़माना देख लेगा कौन हैं हम वक़्त आने पर अभी ख़ुद को जलाऍंगे अभी ख़ुद को तपाऍंगे अभी तो जा रहे हैं डूब कर के मात खाने को मगर इक रोज़ रौनक़ बनके हम भी लौट आऍंगे

Raunak Karn

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रहे हैं ग़म सही में यार अपने बेघरी से अब हमारा दिल अभी बच्चा, इसे क्या फ़रवरी से अब

Raunak Karn

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जो तेरी मर्ज़ी पड़े कर दे अता क्या दुआ तू बद-दुआ देना मुझे शा'इरी अच्छी रहे इस के लिए तू ख़ुदा इक बे-वफ़ा देना मुझे

Raunak Karn

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कभी दिल भी कभी घर भी कभी ख़ंजर बदलता है वही तो यार मेरा था वही मंज़र बदलता है हमें सिखला रहा है वो अरे अब प्यार की बातें वही जो दो दिनों में ही सभी दिलबर बदलता है

Raunak Karn

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