जो भी रौशन थे बुझा कर सब उमीदों के चराग़ सो गए आज भी हम ओढ़ के तन्हाई को
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रौशनी बढ़ने लगी है शहर की चाँद छत पर आ गया है देखिए
Divy Kamaldhwaj
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मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़ वरना ऐसी रौशनी करते कि दुनिया देखती
Kashif Sayyed
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मेरा हाथ पकड़ ले पागल, जंगल है जितना भी रौशन हो जंगल, जंगल है
Umair Najmi
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मुझे अँधेरे से बात करनी है सो करा दो, दिया बुझा दो कुछ एक लम्हों को रौशनी का गला दबा दो, दिया बुझा दो रिवाज़-ए-महफ़िल निभा रहा हूँ बता रहा हूँ मैं जा रहा हूँ मुझे विदा दो, जो रोना चाहे उन्हें बुला दो, दिया बुझा दो
Vikram Gaur Vairagi
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प्यास अगर मेरी बुझा दे तो मैं जानू वरना तू समुंदर है तो होगा मेरे किस काम का है
Rahat Indori
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फिर से अरमान कोई क़त्ल हुआ है मेरा अश्क आए हैं मेरे ग़ुस्ल-ए-जनाज़ा करने
Anis shah anis
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जब मेरे ऐब नज़र ही नहीं आते है मुझे ख़ूबियाँ तेरी मुझे ख़ाक नज़र आएँगी?
Anis shah anis
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गला ही घोंट देता है वो अपनी तिश्नगी का मैं उस को ज़हर लगता हूँ सो पीता ही नहीं है
Anis shah anis
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अना का बोझ लिए सर पे घूमता हूँ मैं इसे उतारना आसान क्यूँ नहीं होता
Anis shah anis
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मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में
Anis shah anis
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