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कोई घर, घर भी नहीं होता है औरत के बग़ैर घर को जन्नत भी बना सकती है, चाहे वो अगर

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ज़मीं सर पे उठा लूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं गगन को भी कुचल दूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं भला औक़ात क्या इस चाँद की उस चाँद के आगे हज़ारों चाँद वारूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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साथ हँसने लगे वो हँसी चाहिए उम्र भर के लिए बस यही चाहिए बिन तेरे हो अगर चार दिन ज़िंदगी एक पल भी नहीं ज़िंदगी चाहिए

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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जिस तरह से निकाले गए आज हम दर्द अपना कहें तो किसे आज हम ज़िंदगी के सिखाए थे मतलब जिन्हें क़त्ल उन के ही हाथों हुए आज हम

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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अगर जो साथ है तेरा,मुझे किस बात की चिंता नसीबों से जो है मिलता,है भाई तू वही हीरा

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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ज़िंदगी के खाते से इक साल और कम हो गया है और बधाई दे रहे हैं लोग इक दूजे को इस की

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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