कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िन्दगी जैसे तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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कुछ न रह सका जहाँ विरानियाँ तो रह गईं तुम चले गए तो क्या कहानियाँ तो रह गईं
Khalil Ur Rehman Qamar
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हाल न पूछो मोहन का सब कुछ राधे राधे है
Zubair Ali Tabish
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दौलत शोहरत बीवी बच्चे अच्छा घर और अच्छे दोस्त कुछ तो है जो इन के बा'द भी हासिल करना बाक़ी है कभी-कभी तो दिल करता है चलती रेल से कूद पड़ूॅं फिर कहता हूँ पागल अब तो थोड़ा रस्ता बाक़ी है
Zia Mazkoor
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तरीक़े और भी हैं इस तरह परखा नहीं जाता चराग़ों को हवा के सामने रक्खा नहीं जाता मोहब्बत फ़ैसला करती है पहले चंद लम्हों में जहाँ पर इश्क़ होता है वहाँ सोचा नहीं जाता
Abrar Kashif
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हम दोहरी अज़िय्यत के गिरफ़्तार मुसाफ़िर पाँव भी हैं शल शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता
Ahmad Faraz
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लो फिर तिरे लबों पे उसी बे-वफ़ा का ज़िक्र अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा ना बहुत हुआ
Ahmad Faraz
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ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि 'फ़राज़' रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़
Ahmad Faraz
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हम तेरे शौक़ में यूँँ ख़ुद को गँवा बैठे हैं जैसे बच्चे किसी त्यौहार में गुम हो जाएँ
Ahmad Faraz
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सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है जैसे कई अश'आर मुकम्मल नहीं होते
Ahmad Faraz
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