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मुझे मंज़ूर है हर बात पर इक शर्त है मेरी मुझे बोसा तिरा होना है अव्वल इस जुदाई में

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मुझे अच्छा नहीं लगता ये कहना हमनवाई में हुआ पर है बहुत नुक़सान तुझ सेे आशनाई में दिया है वक़्त जितना इक तिरी इस चाह को मैं ने ख़ुदा मिल जाता है इतने दिनों की पारसाई में

Shan Sharma

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मना करते उसे थे जो वही वो कर दिखाती थी मैं सूरज को उगाता था वो रातें खींच लाती थी अभी भी तुम में ज़िंदा है वही बेबाक़ सी लड़की ज़माने के उसूलों पे जो खुल के मुस्कुराती थी

Shan Sharma

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निभाओगी जो तुम वा'दा करोगी वफ़ा का या कहीं सौदा करोगी जिसे तुम ढूँढती रहती हो मुझ में मिला वो ग़ैर में तो क्या करोगी

Shan Sharma

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ज़ख़्म तुझ को नवाज़ दूँ भी गर पर न धोखा मैं दिलरुबा दूँगा

Shan Sharma

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लिखी थी जो तुम्हें बेनाम सी वो चिट्ठियाँ हैं कहीं थोड़ी शिकायत है कहीं कुछ अर्ज़ियाँ हैं तुम्हारे बा'द दिल में याद ठहरी और घर में जले फ़िल्टर रखे हैं और थोड़ी तीलियाँ हैं

Shan Sharma

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