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पिता बचपन में मिट्टी के खिलौने ला के देते थे उन्हें मालूम था आगे सबक़ ये काम आएगा

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नहीं कोई अगर तो हम मिलेंगे ज़रूरत में तुम्हें हरदम मिलेंगे मिलेंगे सैकड़ों ही लोग लेकिन मगर मेरी तरह के कम मिलेंगे

Prashant Arahat

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सितम ये है हमें वो आज आवारा समझते हैं जिन्हें हम आज भी सच में बहुत प्यारा समझते हैं हमारे दिल के सागर में कभी तुम डूबकर देखो इसे तो बे–वजह ही लोग बस ख़ारा समझते हैं

Prashant Arahat

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सलीक़ा ही नहीं तुम को कोई रिश्ता निभाने का जो जाना हो चले जाओ मगर ये बे-वफ़ाई क्यूँ

Prashant Arahat

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उस ने मेरी आँखों पर चुपके से आ कर हाथ रखे इक चुम्बन होंठों पर ले कर यूँँ सारे जज़्बात रखे देख तुम्हें बस मेरे मन से एक दुआ ये उठती है मालिक इस जीवन भर मुझ को यार तुम्हारे साथ रखे

Prashant Arahat

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ज़मीं से आसमाँ तक नूर तेरा ही नज़र आया तुझे जब चाँद ने देखा ज़मीं पर वो उतर आया खिले हैं फूल के जैसे दर-ओ-दीवार सब घर के ख़ुशी है रौनक़ें हैं आज मेरा यार घर आया

Prashant Arahat

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