शाइ'र तो ज़िंदा होता है अक्सर मर जाने के बा'द
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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जा तुझे जाने दिया जानाँ मेरी जानाँ जान अब तू हो गई अनजान हो जैसे
nakul kumar
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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ज़िन्दगी ले रही मज़े मेरी मैं मज़े ज़िन्दगी के ले रहा हूँ
Saarthi Baidyanath
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ये दिल कमबख़्त भी आया उसी पर मैं जिस को मुँह लगाता भी नहीं था
Saarthi Baidyanath
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ज़ख़्म भरने से एक डर भी है इश्क़ की लज़्ज़तें न खो दूँ मैं
Saarthi Baidyanath
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यूँंँ तो है दिन में अलग सबका वजूद रात में परछाइयाँ मिल जाती हैं
Saarthi Baidyanath
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ये सूझ- बूझ नहीं आती सिर्फ़ पैसों से बग़ैर पैसों के भी सूझ- बूझ आती है
Saarthi Baidyanath
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