sherKuch Alfaaz

तेरे तेशे से गुज़र के है बनी ये मूरत चोट खा खा के बनी है ये चमकती सूरत

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ये किस तरह की मय-कशी है कौन सा इलाज है तुम्हें दवा भी चाहिए तो ज़हर के लिबास में

Sanjay Bhat

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पिघलती है ये क़तरा क़तरा रंग अपना बदलती है तिरी गर्मी की जुंबिश से तमन्ना भी फिसलती है जवानी ख़त्म हो जाती है नादानी में जल जल के दिल-ए-नादाँ को बिल-आख़िर ये मिट्टी ही निगलती है

Sanjay Bhat

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न पूछो कैफ़ियत अब तो हमारी तुम हमारी हम सँवारेंगे तुम्हारी तुम चले हैं अपने अपने रास्तों पर जब ये झूठे सिलसिले रखना न जारी तुम

Sanjay Bhat

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नहीं लफ़्ज़ का इस क़दर ज़ोर है ज़िंदगी पर कि मुमकिन नहीं एक भी हाँ मिरी ज़िंदगी में

Sanjay Bhat

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न मंदिर में न मस्जिद के चमन में न धरती पर न उस चौड़े गगन में जो रब को ढूँढ़ना है आप को तो मिलेगा तिफ़्ल के नन्हे से मन में

Sanjay Bhat

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