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तुम्हें देखे ज़माना हो गया है नज़र महके ज़माना हो गया है बिछड़के तुम सेे आँखें बुझ गई हैं ये दिल धड़के ज़माना हो गया है

Subhan Asad32 Likes

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तू ने सोचा भी है जानाँ कि तेरे वादे ने कितनी सदियों से नहीं पहना अमल का पैकर

Subhan Asad

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ये मेरी ज़िद ही ग़लत थी कि तुझ सेा बन जाऊँ मैं अब न अपनी तरह हूँ न तेरे जैसा हूँ हमारे बीच ज़माने की बद-गुमानी है मैं ज़िंदगी से ज़रा कम ही बात करता हूँ

Subhan Asad

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कभी न लौट के आया वो शख़्स, कहता था ज़रा सा हिज्र है बस सरसरी बिछड़ना है

Subhan Asad

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जब भी उस कूचे में जाना पड़ता है ज़ख़्मों पर तेज़ाब लगाना पड़ता है उस के घर से दूर नहीं है मेरा घर रस्ते में पर एक ज़माना पड़ता है

Subhan Asad

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जब बुलंदी का गुमाँ था तो नहीं याद आई अपनी परवाज़ से टूटे तो ज़मीं याद आई वही आँखें कि जो ईमान-शिकन आँखें हैं उन्हीं आँखों की हमें दावत-ए-दीं याद आई

Subhan Asad

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