उस गुल से अपना घर महकाना है चाहे दुनिया से बग़ावत हो जाए
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वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है
Deepti Mishra
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मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़ वरना ऐसी रौशनी करते कि दुनिया देखती
Kashif Sayyed
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
Meer Taqi Meer
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सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा
Allama Iqbal
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हम ने अब तक गाल बचा के रक्खे हैं क्या तुम ने भी गुलाल बचा के रक्खे हैं
Anand Raj Singh
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ये क़ल्ब कहाँ रह पाता है तब काबू में जब बैठा करती है वो मेरे बाज़ू में
Sandeep dabral 'sendy'
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उतर रहे हैं कुछ किरदार मिरे दिल से धीरे धीरे बदल रहे हैं कुछ जाहिल में काबिल से धीरे धीरे
Sandeep dabral 'sendy'
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यार मुकम्मल हो न सका अफ़साना जिन का भी उन को बात मुहब्बत की बे-मतलब लगती है
Sandeep dabral 'sendy'
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सिर्फ़ तुम सेे ही नहीं वो ऐसा सब से बोलते हैं मेरे घर के लोग सब के सब अदब से बोलते हैं
Sandeep dabral 'sendy'
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शे'र ग़ज़ल गढ़ना है काम मियाँ पानी लिखना पानी पर रात उला खाए तो दिन गुज़रे मतला, मक़ता, सानी पर
Sandeep dabral 'sendy'
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