ghazalKuch Alfaaz

apna dil pesh karun apni vafa pesh karun kuchh samajh men nahin aata tujhe kya pesh karun tere milne ki khushi men koi naghhma chhedun ya tire dard-e-judai ka gila pesh karun mere khvabon men bhi tu mere khayalon men bhi tu kaun si chiiz tujhe tujh se juda pesh karun jo tire dil ko lubhae vo ada mujh men nahin kyuun na tujh ko koi teri hi ada pesh karun apna dil pesh karun apni wafa pesh karun kuchh samajh mein nahin aata tujhe kya pesh karun tere milne ki khushi mein koi naghma chhedun ya tere dard-e-judai ka gila pesh karun mere khwabon mein bhi tu mere khayalon mein bhi tu kaun si chiz tujhe tujh se juda pesh karun jo tere dil ko lubhae wo ada mujh mein nahin kyun na tujh ko koi teri hi ada pesh karun

Related Ghazal

अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

66 likes

सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

77 likes

मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

73 likes

ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

102 likes

उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

220 likes

More from Sahir Ludhianvi

फ़न जो नादार तक नहीं पहुँचा अभी मेआ'र तक नहीं पहुँचा उस ने बर-वक़्त बे-रुख़ी बरती शौक़ आज़ार तक नहीं पहुँचा अक्स-ए-मय हो कि जल्वा-ए-गुल हो रंग-ए-रुख़्सार तक नहीं पहुँचा हर्फ़-ए-इंकार सर बुलंद रहा ज़ोफ़-ए-इक़रार तक नहीं पहुँचा हुक्म-ए-सरकार की पहुँच मत पूछ अहल-ए-सरकार तक नहीं पहुँचा अद्ल-गाहें तो दूर की शय हैं क़त्ल अख़बार तक नहीं पहुँचा इन्क़िलाबात-ए-दहर की बुनियाद हक़ जो हक़दार तक नहीं पहुँचा वो मसीहा-नफ़स नहीं जिस का सिलसिला-दार तक नहीं पहुँचा

Sahir Ludhianvi

2 likes

सदियों से इंसान ये सुनता आया है दुख की धूप के आगे सुख का साया है हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है झूट तो क़ातिल ठहरा इस का क्या रोना सच ने भी इंसाँ का ख़ूँ बहाएा है पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं इस मक़्तल में कौन हमें ले आया है अव्वल अव्वल जिस दिल ने बर्बाद किया आख़िर आख़िर वो दिल ही काम आया है इतने दिन एहसान किया दीवानों पर जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है

Sahir Ludhianvi

14 likes

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से ऐ रूह-ए-अस्र जाग कहाँ सो रही है तू आवाज़ दे रहे हैं पयम्बर सलीब से इस रेंगती हयात का कब तक उठाएँ बार बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से हर गाम पर है मजमा-ए-उश्शाक़ मुंतज़िर मक़्तल की राह मिलती है कू-ए-हबीब से इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से

Sahir Ludhianvi

3 likes

जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं कैसे नादान हैं शोलों को हवा देते हैं हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं जान जाए कि रहे बात निभा देते हैं आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या हैं इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं हम ने दिल दे भी दिया अहद-ए-वफ़ा ले भी लिया आप अब शौक़ से दे लें जो सज़ा देते हैं

Sahir Ludhianvi

3 likes

बर्बाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा टूटा हुआ इक़रार-ए-वफ़ा साथ लिए जा इक दिल था जो पहले ही तुझे सौंप दिया था ये जान भी ऐ जान-ए-अदा साथ लिए जा तपती हुई राहों से तुझे आँच न पहुँचे दीवानों के अश्कों की घटा साथ लिए जा शामिल है मिरा ख़ून-ए-जिगर तेरी हिना में ये कम हो तो अब ख़ून-ए-वफ़ा साथ लिए जा हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँगे तन्हा जो तुझ से हुई हो वो ख़ता साथ लिए जा

Sahir Ludhianvi

4 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Sahir Ludhianvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Sahir Ludhianvi's ghazal.