jiita hai sirf tere liye kaun mar ke dekh ik roz meri jaan ye harkat bhi kar ke dekh manzil yahin hai aam ke pedon ki chhanv men ai shahsavar ghode se niche utar ke dekh tuute pade hain kitne ujalon ke ustukhvan saya-numa andhere ke andar utar ke dekh phulon ki tang-damani ka tazkira na kar khushbu ki tarah mauj-e-saba men bikhar ke dekh tujh par khulenge maut ki sarhad ke raste himmat agar hai us ki gali se guzar ke dekh dariya ki vusaton se use napte nahin tanhai kitni gahri hai ik jaam bhar ke dekh jita hai sirf tere liye kaun mar ke dekh ek roz meri jaan ye harkat bhi kar ke dekh manzil yahin hai aam ke pedon ki chhanw mein ai shahsawar ghode se niche utar ke dekh tute pade hain kitne ujalon ke ustukhwan saya-numa andhere ke andar utar ke dekh phulon ki tang-damani ka tazkira na kar khushbu ki tarah mauj-e-saba mein bikhar ke dekh tujh par khulenge maut ki sarhad ke raste himmat agar hai us ki gali se guzar ke dekh dariya ki wusaton se use napte nahin tanhai kitni gahri hai ek jam bhar ke dekh
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को और उस के साथ हुक्म कि अब ज़िंदगी करो बाहर गली में शोर है बरसात का सुनो कुंडी लगा के आज तो घर में पड़े रहो छोड़ आए किस की छत पे जवाँ-साल चाँद को ख़ामोश किस लिए हो सितारो जवाब दो क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो जिस ने भी मुड़ के देखा वो पत्थर का हो गया नज़रें झुकाए दोस्तो चुप चुप चले चलो अल्लाह रक्खे तेरी सहर जैसी कम-सिनी दिल काँपता है जब भी तू आती है शाम को वीराँ चमन पे रोई है शबनम तमाम रात ऐसे में कोई नन्ही कली मुस्कुराए तो 'आदिल' हवाएँ कब से भी देती हैं दस्तकें जल्दी से उठ के कमरे का दरवाज़ा खोल दो
Adil Mansuri
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ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा अँधेरों के अंदर उतर जाऊँगा मिरी पत्तियाँ सारी सूखी हुईं नए मौसमों में बिखर जाऊँगा अगर आ गया आइना सामने तो अपने ही चेहरे से डर जाऊँगा वो इक आँख जो मेरी अपनी भी है न आई नज़र तो किधर जाऊँगा वो इक शख़्स आवाज़ देगा अगर मैं ख़ाली सड़क पर ठहर जाऊँगा पलट कर न पाया किसी को अगर तो अपनी ही आहट से डर जाऊँगा तिरी ज़ात में साँस ली है सदा तुझे छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा
Adil Mansuri
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चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई सूरज को ढलता देख के फिर शाम डर गई मबहूत से खड़े रहे सब बस की लाइन में कूल्हे उछालती हुई बिजली गुज़र गई सूरज वही था धूप वही शहर भी वही क्या चीज़ थी जो जिस्म के अंदर ठिठर गई ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई तहलील हो गई है हवा में उदासियाँ ख़ाली जगह जो रह गई तन्हाई भर गई चेहरे बग़ैर निकला था उस के मकान से रुस्वाइयों की हद से भी आगे ख़बर गई रंगों की सुर्ख़ नाफ़ दाखिल्या गुल-आफ़ताब अंधी हवाएँ ख़ार खटक कान भर गई
Adil Mansuri
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बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था मैं हाथ में तलवार लिए झूम रहा था घूँघट में मिरे ख़्वाब की ता'बीर छुपी थी मेहंदी से हथेली में मिरा नाम लिखा था लब थे कि किसी प्याली के होंटों पे झुके थे और हाथ कहीं गर्दन-ए-मीना में पड़ा था हम्माम के आईने में शब डूब रही थी सिगरेट से नए दिन का धुआँ फैल रहा था दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी और पानी की तह में वो मुझे ढूँढ़ रहा था मालूम नहीं फिर वो कहाँ छुप गया 'आदिल' साया सा कोई लम्स की सरहद पे मिला था
Adil Mansuri
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जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख इक रोज़ मेरी जान ये हरकत भी कर के देख मंज़िल यहीं है आम के पेड़ों की छाँव में ऐ शहसवार घोड़े से नीचे उतर के देख टूटे पड़े हैं कितने उजालों के उस्तुख़्वाँ साया-नुमा अँधेरे के अंदर उतर के देख फूलों की तंग-दामनी का तज़्किरा न कर ख़ुशबू की तरह मौज-ए-सबा में बिखर के देख तुझ पर खुलेंगे मौत की सरहद के रास्ते हिम्मत अगर है उस की गली से गुज़र के देख दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख
Adil Mansuri
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