kab yaad men tera saath nahin kab haat men tera haat nahin sad-shukr ki apni raton men ab hijr ki koi raat nahin mushkil hain agar halat vahan dil bech aaen jaan de aaen dil vaalo kucha-e-janan men kya aise bhi halat nahin jis dhaj se koi maqtal men gaya vo shaan salamat rahti hai ye jaan to aani jaani hai is jaan ki to koi baat nahin maidan-e-vafa darbar nahin yaan nam-o-nasab ki puchh kahan ashiq to kisi ka naam nahin kuchh ishq kisi ki zaat nahin gar baazi ishq ki baazi hai jo chaho laga do dar kaisa gar jiit gae to kya kahna haare bhi to baazi maat nahin kab yaad mein tera sath nahin kab hat mein tera hat nahin sad-shukr ki apni raaton mein ab hijr ki koi raat nahin mushkil hain agar haalat wahan dil bech aaen jaan de aaen dil walo kucha-e-jaanan mein kya aise bhi haalat nahin jis dhaj se koi maqtal mein gaya wo shan salamat rahti hai ye jaan to aani jaani hai is jaan ki to koi baat nahin maidan-e-wafa darbar nahin yan nam-o-nasab ki puchh kahan aashiq to kisi ka nam nahin kuchh ishq kisi ki zat nahin gar bazi ishq ki bazi hai jo chaho laga do dar kaisa gar jit gae to kya kahna haare bhi to bazi mat nahin
Related Ghazal
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
More from Faiz Ahmad Faiz
वो बुतों ने डाले हैं वसवसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया वो पड़ी हैं रोज़ क़यामतें कि ख़याल-ए-रोज़-ए-जज़ा गया जो नफ़स था ख़ार-ए-गुलू बना जो उठे थे हाथ लहू हुए वो नशात-ए-आह-ए-सहर गई वो वक़ार-ए-दस्त-ए-दुआ गया न वो रंग फ़स्ल-ए-बहार का न रविश वो अब्र-ए-बहार की जिस अदास यार थे आश्ना वो मिज़ाज-ए-बाद-ए-सबा गया जो तलब पे अहद-ए-वफ़ा किया तो वो आबरू-ए-वफ़ा गई सर-ए-आम जब हुए मुद्दई' तो सवाब-ए-सिदक़-ओ-सफ़ा गया अभी बादबान को तह रखो अभी मुज़्तरिब है रुख़-ए-हवा किसी रास्ते में है मुंतज़िर वो सुकूँ जो आ के चला गया
Faiz Ahmad Faiz
1 likes
गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो ऐसे नादाँ भी न थे जाँ से गुज़रने वाले नासेहो पंद-गरो राह-गुज़र तो देखो वो तो वो है तुम्हें हो जाएगी उल्फ़त मुझ से इक नज़र तुम मिरा महबूब-ए-नज़र तो देखो वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैं देखने वालो कभी उन का जिगर तो देखो दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो सुब्ह की तरह झमकता है शब-ए-ग़म का उफ़ुक़ 'फ़ैज़' ताबिंदगी-ए-दीदा-ए-तर तो देखो
Faiz Ahmad Faiz
1 likes
सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें चलो आओ तुम को दिखाएँ हम जो बचा है मक़्तल-ए-शहर में ये मज़ार अहल-ए-सफ़ा के हैं ये हैं अहल-ए-सिद्क़ की तुर्बतें मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें
Faiz Ahmad Faiz
4 likes
इश्क़ मिन्नत-कश-ए-क़रार नहीं हुस्न मजबूर-ए-इंतिज़ार नहीं तेरी रंजिश की इंतिहा मालूम हसरतों का मिरी शुमार नहीं अपनी नज़रें बिखेर दे साक़ी मय ब-अंदाज़ा-ए-ख़ुमार नहीं ज़ेर-ए-लब है अभी तबस्सुम-ए-दोस्त मुंतशिर जल्वा-ए-बहार नहीं अपनी तकमील कर रहा हूँ मैं वर्ना तुझ से तो मुझ को प्यार नहीं चारा-ए-इंतिज़ार कौन करे तेरी नफ़रत भी उस्तुवार नहीं 'फ़ैज़' ज़िंदा रहें वो हैं तो सही क्या हुआ गर वफ़ा-शिआर नहीं
Faiz Ahmad Faiz
1 likes
न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया मिरे चारा-गर को नवेद हो सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चुका दिया करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन पस-ए-मर्ग हम ने भुला दिया उधर एक हर्फ़ कि कुश्तनी यहाँ लाख उज़्र था गुफ़्तनी जो कहा तो सुन के उड़ा दिया जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया जो रुके तो कोह-ए-गिराँ थे हम जो चले तो जाँ से गुज़र गए रह-ए-यार हम ने क़दम क़दम तुझे यादगार बना दिया
Faiz Ahmad Faiz
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Faiz Ahmad Faiz.
Similar Moods
More moods that pair well with Faiz Ahmad Faiz's ghazal.







