ख़ुदा का शुक्र मेरा ठेकेदार अच्छा है वगरना कौन ज़हीफों से काम लेता है मिशाल खान तेरी उँगलियाँ नहीं टूटी हमारी माँओं के होंटों का लम्स टूटा है मैं उस हथेली पे रौशन हुआ , उस के बा'द वही हुआ जो चिराग़ों के साथ होता है
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है
Tehzeeb Hafi
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मफ़रूर परिंदों को ये ऐलान गया है सय्याद नशेमन का पता जान गया है या'नी जिसे दीमक लगी जाती थी वो मैं था अब जा के मेरा मेरी तरफ़ ध्यान गया है शीशे में भले उस ने मेरी नक़्ल उतारी ख़ुश हूँ कि मुझे कोई तो पहचान गया है अब बात तेरी कुन पे है कुछ कर मेरे मौला इक शख़्स तेरे दर से परेशान गया है ये नाम-ओ-नसब जा के ज़माने को बताओ दरवेश तो दस्तक से ही पहचान गया है
Ahmad Abdullah
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फ़ोन तो दूर वहाँ ख़त भी नहीं पहुँचेंगे अब के ये लोग तुम्हें ऐसी जगह भेजेंगे ज़िंदगी देख चुके तुझ को बड़े पर्दे पर आज के बअ'द कोई फ़िल्म नहीं देखेंगे मसअला ये है मैं दुश्मन के क़रीं पहुँचूँगा और कबूतर मिरी तलवार पे आ बैठेंगे हम को इक बार किनारों से निकल जाने दो फिर तो सैलाब के पानी की तरह फैलेंगे तू वो दरिया है अगर जल्दी नहीं की तू ने ख़ुद समुंदर तुझे मिलने के लिए आएँगे सग़ा-ए-राज़ में रक्खेंगे नहीं इश्क़ तिरा हम तिरे नाम से ख़ुशबू की दुकाँ खोलेंगे
Zia Mazkoor
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हमारे साथ कोई मसअला फुरात का है वगरना इल्म उसे अपनी मुश्किलात का है मेरे हिसाब से माज़ुरी हुस्न है मेरा अगर ये ऐब है तो भी ख़ुदा के हाथ का है इक आधे काम के ह़क़ में तो ख़ैर मैं भी हूँ तुम्हारे पास तो दफ़्तर शिफारिशात का है हमारी बात का जितना वसीअ पहलू है ज़बाँ पे लाने में नुक़सान काइनात का है हम उस के होने ना होने पे कितना लड़ रहे हैं किसी के वास्ते ये खेल नफ्सियात का है
Zia Mazkoor
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शाह से छुपके क़ैदी ने शहज़ादी को पैगाम लिखा जंग से भागने वालों में शहज़ादे का भी नाम लिखा दूरदराज़ से आने वाले ख़त मेरी हम सेाही के थे इक दिन उस ने हिम्मत कर के अपना असली नाम लिखा हम दोनों ने अपने अपने दीन पे क़ाएम रहना था घर की इक दीवार पे अल्लाह इक दीवार पे राम लिखा एक मोहब्बत ख़त्म हुई तो दूसरी की तैयारी की नई कहानी के आगाज में पहली का अंजाम लिखा
Zia Mazkoor
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इस सेे आप का दुख भी हो जाएगा अच्छा ख़ासा कम मुझ पर गुज़रे लम्हों में से कर दो बस एक लम्हा कम बड़े-बड़े शहरों में कोई कैसे किसी से प्यार करे जितने आमने सामने घर है उतना आना जाना कम उस के पिस्टल से एक गोली कम होने का मतलब है अपने शहर में उड़ने वाले गोल से एक परिंदा कम कल तो वो और उस की कश्ती बस जलने ही वाले थे दरिया उस पर काफी गरम था लेकिन आग से थोड़ा कम सदके जाऊँ उन चीज़ों पर जिन को उस के हाथ लगे अजब मैकेनिक था वो जिस ने तोड़ा ज़्यादा जोड़ा कम
Zia Mazkoor
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न चलती है न रुकती है फ़क़ीरा तिरी दुनिया भी अच्छी है फ़क़ीरा तुम्हें हटना पड़ेगा रास्ते से ये शाहों की सवारी है फ़क़ीरा हमारे ना-तवाँ कंधों पे मत रख तसव्वुफ़ भारी गठरी है फ़क़ीरा तिरी गद्दी को ले कर इतने झगड़े अभी तो पहली पीढ़ी है फ़क़ीरा फ़क़त ये सोच कर ख़ामोश हूँ मैं तुम्हारी रोज़ी-रोटी है फ़क़ीरा हम उस के आस्तां तक कैसे पहुँचे बड़ी लंबी कहानी है फ़क़ीरा हमारे मानने वालों में हो जा हमारा फ़ैज़ जारी है फ़क़ीरा
Zia Mazkoor
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