ghazalKuch Alfaaz

kis naaz kis andaz se tum haae chalo ho roz ek ghhazal ham se kahlvae chalo ho rakhna hai kahin paanv to rakkho ho kahin paanv chalna zara aaya hai to itrae chalo ho mai men koi khami hai na saghhar men koi khot piina nahin aae hai to chhalkae chalo ho ham kuchh nahin kahte hain koi kuchh nahin kahta tum kya ho tumhin sab se kahlvae chalo ho kis naz kis andaz se tum hae chalo ho roz ek ghazal hum se kahlwae chalo ho rakhna hai kahin panw to rakkho ho kahin panw chalna zara aaya hai to itrae chalo ho mai mein koi khami hai na saghar mein koi khot pina nahin aae hai to chhalkae chalo ho hum kuchh nahin kahte hain koi kuchh nahin kahta tum kya ho tumhin sab se kahlwae chalo ho

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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मिरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुँचे मुझे डर ये है बुराई तिरे नाम तक न पहुँचे मिरे पास क्या वो आते मिरा दर्द क्या मिटाते मिरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुँचे हो किसी का मुझ पे एहसाँ ये नहीं पसंद मुझ को तिरी सुब्ह की तजल्ली मिरी शाम तक न पहुँचे तिरी बे-रुख़ी पे ज़ालिम मिरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुँचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मो'तरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुँचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मिरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुँचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियाँ से कभी दाम तक न पहुँचे उन्हें मेहरबाँ समझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुँचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुँचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मिरा ज़िक्र तक न आए मिरा नाम तक न पहुँचे तुम्हें याद ही न आऊँ ये है और बात वर्ना मैं नहीं हूँ दूर इतना कि सलाम तक न पहुँचे

Kaleem Aajiz

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शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है प्यारे चेहरा तिरा उस रोज़ निखर जाए है प्यारे इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे रहने दे जफ़ाओं की कड़ी धूप में मुझ को साए में तो हर शख़्स ठहर जाए है प्यारे वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे हर-चंद कोई नाम नहीं मेरी ग़ज़ल में तेरी ही तरफ़ सब की नज़र जाए प्यारे

Kaleem Aajiz

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मैं रोऊँ हूँ रोना मुझे भाए है किसी का भला इस में क्या जाए है दिल आए है फिर दिल में दर्द आए है यूँँ ही बात में बात बढ़ जाए है कोई देर से हाथ फैलाए है वो ना-मेहरबाँ आए है जाए है मोहब्बत में दिल जाए गर जाए है जो खोए नहीं है वो क्या पाए है जुनूँ सब इशारे में कह जाए है मगर अक़्ल को कब समझ आए है पुकारूँ हूँ लेकिन न बाज़ आए है ये दुनिया कहाँ डूबने जाए है ख़मोशी में हर बात बन जाए है जो बोले है दीवाना कहलाए है क़यामत जहाँ आएगी आएगी यहाँ सुब्ह आए है शाम आए है जुनूँ ख़त्म दार-ओ-रसन पर नहीं ये रस्ता बहुत दूर तक जाए है

Kaleem Aajiz

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मुँह फ़क़ीरों से न फेरा चाहिए ये तो पूछा चाहिए क्या चाहिए चाह का मेआ'र ऊँचा चाहिए जो न चाहें उन को चाहा चाहिए कौन चाहे है किसी को बे-ग़रज़ चाहने वालों से भागा चाहिए हम तो कुछ चाहे हैं तुम चाहो हो कुछ वक़्त क्या चाहे है देखा चाहिए चाहते हैं तेरे ही दामन की ख़ैर हम हैं दीवाने हमें क्या चाहिए बे-रुख़ी भी नाज़ भी अंदाज़ भी चाहिए लेकिन न इतना चाहिए हम जो कहना चाहते हैं क्या कहें आप कह लीजे जो कहना चाहिए बात चाहे बे-सलीक़ा हो 'कलीम' बात कहने का सलीक़ा चाहिए

Kaleem Aajiz

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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे

Kaleem Aajiz

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