ghazalKuch Alfaaz

कोई मिलता नहीं ख़ुदा की तरह फिरता रहता हूँ मैं दुआ की तरह ग़म तआक़ुब में हैं सज़ा की तरह तू छुपा ले मुझे ख़ता की तरह है मरीज़ों में तज़्किरा मेरा आज़माई हुई दवा की तरह हो रहीं हैं शहादतें मुझ में और मैं चुप हूँ कर्बला की तरह जिस की ख़ातिर चराग़ बनता हूँ घूरता है वही हवा की तरह वक़्त के गुम्बदों में रहता हूँ एक गूँजी हुई सदा की तरह

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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चारासाज़ों के बस की बात नहीं मैं दवाओं के बस की बात नहीं चाहता हूँ मैं दीमकों से नजात जो किताबों के बस की बात नहीं तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना इत्रदानों के बस की बात नहीं ख़त्म कर दे अज़ाब क़ब्रों का ताज-महलों के बस की बात नहीं आँसुओं में जो झिलमिलाहट है वो सितारों के बस की बात नहीं ऐसा लगता है अब तेरा दीदार सिर्फ़ आँखों के बस की बात नहीं

Fahmi Badayuni

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परिंदे सह में सह में उड़ रहे हैं बराबर में फ़रिश्ते उड़ रहे हैं ख़ुशी से कब ये तिनके उड़ रहे हैं हवा के डर के मारे उड़ रहे हैं कहीं कोई कमाँ ता'ने हुए है कबूतर आड़े-तिरछे उड़ रहे हैं तुम्हारा ख़त हवा में उड़ रहा है तआ'क़ुब में लिफ़ाफ़े उड़ रहे हैं बहुत कहती रही आँधी से चिड़िया कि पहली बार बच्चे उड़ रहे हैं शजर के सब्ज़ पत्तों की हवा से फ़ज़ा में ख़ुश्क पत्ते उड़ रहे हैं

Fahmi Badayuni

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नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं हमारे ज़ख़्म वर्ज़िश कर रहे हैं सुनो लोगों को ये शक हो गया है कि हम जीने की साज़िश कर रहे हैं हमारी प्यास को रानी बना लें कई दरिया ये कोशिश कर रहे हैं मिरे सहरा से जो बादल उठे थे किसी दरिया पे बारिश कर रहे हैं ये सब पानी की ख़ाली बोतलें हैं जिन्हें हम नज़्र-ए-आतिश कर रहे हैं अभी चमके नहीं 'ग़ालिब' के जूते अभी नक़्क़ाद पॉलिश कर रहे हैं तिरी तस्वीर, पंखा, मेज़, मफ़लर मिरे कमरे में गर्दिश कर रहे हैं

Fahmi Badayuni

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सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी

Fahmi Badayuni

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मौत की सम्त जान चलती रही ज़िंदगी की दुकान चलती रही सारे किरदार सो गए थक कर बस तिरी दास्तान चलती रही मैं लरज़ता रहा हदफ़ बन कर मश्क़-ए-तीर-ओ-कमान चलती रही उल्टी सीधी चराग़ सुनते रहे और हवा की ज़बान चलती रही दो ही मौसम थे धूप या बारिश छतरियों की दुकान चलती रही जिस्म लम्बे थे चादरें छोटी रात भर खींच-तान चलती रही पर निकलते रहे बिखरते रहे ऊँची नीची उड़ान चलती रही

Fahmi Badayuni

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