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क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़ हक़-शनासों के हाँ ख़ुदा है इश्क़ दिल लगा हो तो जी जहाँ से उठा मौत का नाम प्यार का है इश्क़ और तदबीर को नहीं कुछ दख़्ल इश्क़ के दर्द की दवा है इश्क़ क्या डुबाया मुहीत में ग़म के हम ने जाना था आश्ना है इश्क़ इश्क़ से जा नहीं कोई ख़ाली दिल से ले अर्श तक भरा है इश्क़ कोहकन क्या पहाड़ काटेगा पर्दे में ज़ोर-आज़मा है इश्क़ इश्क़ है इश्क़ करने वालों को कैसा कैसा बहम किया है इश्क़ कौन मक़्सद को इश्क़ बिन पहुँचा आरज़ू इश्क़ मुद्दआ' है इश्क़ 'मीर' मरना पड़े है ख़ूबाँ पर इश्क़ मत कर कि बद बला है इश्क़

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

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ग़म्ज़े ने उस के चोरी में दिल की हुनर किया उस ख़ानुमाँ-ख़राब ने आँखों में घर किया रंग उड़ चला चमन में गुलों का तो क्या नसीम हम को तो रोज़गार ने बे-बाल-ओ-पर किया नाफ़े जो थीं मिज़ाज को अव्वल सो इश्क़ में आख़िर उन्हीं दवाओं ने हम को ज़रर किया मरता हूँ जान दें हैं वतन-दारीयों पे लोग और सुनते जाते हैं कि हर इक ने सफ़र किया क्या जानूँ बज़्म-ए-ऐश कि साक़ी की चश्म देख मैं सोहबत-ए-शराब से आगे सफ़र किया जिस दम कि तेग़-ए-इश्क़ खिंची बुल-हवस कहाँ सुन लीजियो कि हम ही ने सीना-सिपर किया दिल ज़ख़्मी हो के तुझ तईं पहुँचा तो कम नहीं इस नीम-कुश्ता ने भी क़यामत जिगर किया है कौन आप में जो मिले तुझ से मस्त नाज़ ज़ौक़-ए-ख़बर ही ने तो हमें बे-ख़बर क्या वो दश्त-ए-ख़ौफ़-नाक रहा है मिरा वतन सुन कर जिसे ख़िज़्र ने सफ़र से हज़र किया कुछ कम नहीं हैं शोबदा-बाज़ों से मय-गुसार दारू पिला के शैख़ को आदम से ख़र किया हैं चारों तरफ़ खे़ में खड़े गर्द-बाद के क्या जानिए जुनूँ ने इरादा किधर किया लुक्नत तिरी ज़बान की है सहर जिस से शोख़ यक हर्फ़-ए-नीम-गुफ़्ता ने दिल पर असर किया बे-शर्म महज़ है वो गुनहगार जिन ने 'मीर' अब्र-ए-करम के सामने दामाँ तर किया

Meer Taqi Meer

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पाए ख़िताब क्या क्या देखे इ'ताब क्या क्या दिल को लगा के हम ने खींचे अज़ाब क्या क्या काटे हैं ख़ाक उड़ा कर जों गर्द-बाद बरसों गलियों में हम हुए हैं उस बिन ख़राब क्या क्या कुछ गुल से हैं शगुफ़्ता कुछ सर्व से हैं क़द-कश उस के ख़याल में हम देखे हैं ख़्वाब क्या क्या अन्वा-ए-जुर्म मेरे फिर बे-शुमार-ओ-बे-हद रोज़-ए-हिसाब लेंगे मुझ से हिसाब क्या क्या इक आग लग रही है सीनों में कुछ न पूछो जल जल के हम हुए हैं उस बिन कबाब क्या क्या इफ़रात-ए-शौक़ में तो रूयत रही न मुतलक़ कहते हैं मेरे मुँह पर अब शैख़-ओ-शाब क्या क्या फिर फिर गया है आ कर मुँह तक जिगर हमारे गुज़रे हैं जान-ओ-दिल पर याँ इज़्तिराब क्या क्या आशुफ़्ता उस के गेसू जब से हुए हैं मुँह पर तब से हमारे दिल को है पेच-ओ-ताब क्या क्या कुछ सूझता नहीं है मस्ती में 'मीर'-जी को करते हैं पोच-गोई पी कर शराब क्या क्या

Meer Taqi Meer

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कोई हुआ न रू-कश टक मेरी चश्म-ए-तर से क्या क्या न अब्र आ कर याँ ज़ोर ज़ोर बरसे वहशत से मेरी यारो ख़ातिर न जम्अ'' रखियो फिर आवे या न आवे नौ पुर उठा जो घर से अब जूँ सरिश्क उन से फिरने की चश्म मत रख जो ख़ाक में मिले हैं गिर कर तिरी नज़र से दीदार ख़्वाह उस के कम हों तो शोर कम हो हर सुब्ह इक क़यामत उठती है उस के दर से दाग़ एक हो जिला भी ख़ूँ एक हो बहा भी अब बहस क्या है दिल से क्या गुफ़्तुगू जिगर से दिल किस तरह न खींचें अश'आर रेख़्ते के बेहतर क्या है मैं ने उस ऐब को हुनर से अंजाम-ए-कार बुलबुल देखा हम अपनी आँखों आवारा थे चमन में दो चार टूटे पर से बे-ताक़ती ने दिल की आख़िर को मार रखा आफ़त हमारे जी की आई हमारे घर से दिलकश ये मंज़िल आख़िर देखा तो आह निकली सब यार जा चुके थे आए जो हम सफ़र से आवारा 'मीर' शायद वाँ ख़ाक हो गया है यक गर्द उठ चले है गाह उस की रहगुज़र से

Meer Taqi Meer

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