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मेरे हुजरे में नहीं और कहीं पर रख दो आसमाँ लाए हो ले आओ ज़मीं पर रख दो अब कहाँ ढूँढ़ने जाओगे हमारे क़ातिल आप तो क़त्ल का इल्ज़ाम हमीं पर रख दो मैं ने जिस ताक पे कुछ टूटे दिए रक्खे हैं चाँद तारों को भी ले जा के वहीं पर रख दो

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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शजर हैं अब समर-आसार मेरे चले आते हैं दावेदार मेरे मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं समुंदर हैं समुंदर पार मेरे अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें अगर चाहें तो ये बीमार मेरे हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन गए बेकार सारे वार मेरे मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे हँसी में टाल देना था मुझे भी ख़ता क्यूँँ हो गए सरकार मेरे तसव्वुर में न जाने कौन आया महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे तुम्हारा नाम दुनिया जानती है बहुत रुस्वा हैं अब अश'आर मेरे भँवर में रुक गई है नाव मेरी किनारे रह गए इस पार मेरे मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे

Rahat Indori

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मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की दाद लोगों की गला अपना ग़ज़ल उस्ताद की अपनी साँसें बेच कर मैं ने जिसे आबाद की वो गली जन्नत तो अब भी है मगर शद्दाद की उम्र भर चलते रहे आँखों पे पट्टी बाँध कर ज़िंदगी को ढूँडने में ज़िंदगी बर्बाद की दास्तानों के सभी किरदार कम होने लगे आज काग़ज़ चुनती फिरती है परी बग़दाद की इक सुलगता चीख़ता माहौल है और कुछ नहीं बात करते हो 'यगाना' किस अमीनाबाद की

Rahat Indori

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बैठे बैठे कोई ख़याल आया ज़िंदा रहने का फिर सवाल आया कौन दरियाओं का हिसाब रखे नेकियाँ नेकियों में डाल आया ज़िंदगी किस तरह गुज़ारते हैं ज़िंदगी भर न ये कमाल आया झूट बोला है कोई आईना वर्ना पत्थर में कैसे बाल आया वो जो दो-गज़ ज़मीं थी मेरे नाम आसमाँ की तरफ़ उछाल आया क्यूँँ ये सैलाब सा है आँखों में मुस्कुराए थे हम-ख़याल आया

Rahat Indori

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सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा मैं इस बहार में सब का हिसाब कर दूँगा मैं इंतिज़ार में हूँ तू कोई सवाल तो कर यक़ीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूँगा हज़ार पर्दों में ख़ुद को छुपा के बैठ मगर तुझे कभी न कभी बे-नक़ाब कर दूँगा मुझे भरोसा है अपने लहू के क़तरों पर मैं नेज़े नेज़े को शाख़-ए-गुलाब कर दूँगा मुझे यक़ीन कि महफ़िल की रौशनी हूँ मैं उसे ये ख़ौफ़ कि महफ़िल ख़राब कर दूँगा मुझे गिलास के अंदर ही क़ैद रख वर्ना मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूँगा महाजनों से कहो थोड़ा इंतिज़ार करें शराब-ख़ाने से आ कर हिसाब कर दूँगा

Rahat Indori

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वो इक इक बात पे रोने लगा था समुंदर आबरू खोने लगा था लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी मैं आँखें खोल कर सोने लगा था चुराता हूँ अब आँखें आइनों से ख़ुदा का सामना होने लगा था वो अब आईने धोता फिर रहा है उसे चेहरे पे शक होने लगा था मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया मैं सब के सामने रोने लगा था

Rahat Indori

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