नेकिया और भलाईया मौला सब के सब ख़ुदनुमाईयाँ मौला अपनी कोई दुकानदारी नहीं अपनी कैसी कमाईयाँ मौला, सुभानल्लाह एक शरारत भरा सवाल करूँं औरतें क्यूँ बनाईयाँ मौला
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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चरागाहें नई आबाद होगी मगर जो बस्तियाँ बर्बाद होगी ख़ुदा मिट्टी को फिर से हुक्म देगा कई शक्लें नई ईजाद होगी अभी मुमकिन नहीं लेकिन ये होगा किताबें साहिब-ए-औलाद होगी मैं उन आँखों को पढ़ कर सोचता हूँ ये नज्में किस तरह से याद होगी ये परियाँ फिर नहीं आएगी मिलने ये ग़ज़लें फिर नहीं इरशाद होगी मैं डरता हूँ अली उन आदतों से के जो मुझ को तुम्हारे बा'द होगी
Ali Zaryoun
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इक हिजरत की आवाज़ों का कोई बैन सुने दरवाज़ों का ज़करिय्या पेड़ों की मत सुन ये जंगल है ख़मयाज़ों का तिरे सर में सोज़ नहीं प्यारे तू अहल नहीं मिरे साज़ों का औरों को सलाहें देता है कोई डसा हुआ अंदाज़ों का मिरा नख़रा करना बनता है मैं ग़ाज़ी हूँ तिरे गाज़ों का इक रेढ़ी वाला मुंकिर है तिरी तोपों और जहाज़ों का
Ali Zaryoun
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अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं ख़ुद अपने साथ हूँ या'नी ख़ुदा के साथ हूँ मैं मुजावरान-ए-हवस तंग हैं कि यूँँ कैसे बग़ैर शर्म-ओ-हया भी हया के साथ हूँ मैं सफ़र शुरूअ' तो होने दे अपने साथ मिरा तू ख़ुद कहेगा ये कैसी बला के साथ हूँ मैं मैं छू गया तो तिरा रंग काट डालूँगा सो अपने आप से तुझ को बचा के साथ हूँ मैं दुरूद-बर-दिल-ए-वहशी सलाम-बर-तप-ए-इश्क़ ख़ुद अपनी हम्द ख़ुद अपनी सना के साथ हूँ मैं यही तो फ़र्क़ है मेरे और उन के हल के बीच शिकायतें हैं उन्हें और रज़ा के साथ हूँ मैं मैं अव्वलीन की इज़्ज़त में आख़िरीन का नूर वो इंतिहा हूँ कि हर इब्तिदा के साथ हूँ मैं दिखाई दूँ भी तो कैसे सुनाई दूँ भी तो क्यूँँ वरा-ए-नक़्श-ओ-नवा हूँ फ़ना के साथ हूँ मैं ब-हुक्म-ए-यार लवें कब्ज़ करने आती है बुझा रही है? बुझाए हवा के साथ हूँ मैं ये साबिरीन-ए-मोहब्बत ये काशिफ़ीन-ए-जुनूँ इन्ही के संग इन्हीं औलिया के साथ हूँ मैं किसी के साथ नहीं हूँ मगर जमाल-ए-इलाहा तिरी क़िस्म तिरे हर मुब्तला के साथ हूँ मैं ज़माने भर को पता है मैं किस तरीक़ पे हूँ सभी को इल्म है किस दिल-रुबा के साथ हूँ मैं मुनाफ़िक़ीन-ए-तसव्वुफ़ की मौत हूँ मैं 'अली' हर इक असील हर इक बे-रिया के साथ हूँ मैं
Ali Zaryoun
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पहले-पहल लड़ेंगे तमस्ख़ुर उड़ाएँगे जब इश्क़ देख लेंगे तो सर पर बिठाएँगे तू तो फिर अपनी जान है तेरा तो ज़िक्र क्या हम तेरे दोस्तों के भी नख़रे उठाएँगे 'ग़ालिब' ने इश्क़ को जो दिमाग़ी ख़लल कहा छोड़ें ये रम्ज़ आप नहीं जान पाएँगे परखेंगे एक एक को ले कर तुम्हारा नाम दुश्मन है कौन दोस्त है पहचान जाएँगे क़िबला कभी तो ताज़ा-सुख़न भी करें अता ये चार-पाँच ग़ज़लें ही कब तक सुनाएँगे आगे तो आने दीजिए रस्ता तो छोड़िए हम कौन हैं ये सामने आ कर बताएँगे ये एहतिमाम और किसी के लिए नहीं ता'ने तुम्हारे नाम के हम पर ही आएँगे
Ali Zaryoun
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इसी लिए तो मुझे सुनके तैश आया है तुम्हारा हाल किसी और ने बताया है मुझे बता मेरा भाई शहीद कैसे हुआ तू उस के साथ था तू कैसे बच के आया है अभी ये ज़ख़्म किसी पर नहीं खुला मेरा अभी ये शे'र किसी को नहीं सुनाया है
Ali Zaryoun
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