unhen kyuun phuul dushman eid men pahnae jaate hain vo shakh-e-gul ki surat naaz se bal khaae jaate hain agar ham se khushi ke din bhi vo ghabrae jaate hain to kya ab eid milne ko farishte aae jaate hain vo hans kar kah rahe hain mujh se sun kar ghhair ke shikve ye kab kab ke fasane eid men dohrae jaate hain na chhed itna unhen ai vaada-e-shab ki pashemani ki ab to eid milne par bhi vo sharmae jaate hain 'qamar' afshan chuni hai rukh pe us ne is saliqe se sitare asman se dekhne ko aae jaate hain unhen kyun phul dushman eid mein pahnae jate hain wo shakh-e-gul ki surat naz se bal khae jate hain agar hum se khushi ke din bhi wo ghabrae jate hain to kya ab eid milne ko farishte aae jate hain wo hans kar kah rahe hain mujh se sun kar ghair ke shikwe ye kab kab ke fasane eid mein dohrae jate hain na chhed itna unhen ai wada-e-shab ki pashemani ki ab to eid milne par bhi wo sharmae jate hain 'qamar' afshan chuni hai rukh pe us ne is saliqe se sitare aasman se dekhne ko aae jate hain
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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सुर्ख़ियाँ क्यूँँ ढूँढ़ कर लाऊँ फ़साने के लिए बस तुम्हारा नाम काफ़ी है ज़माने के लिए मौजें साहिल से हटाती हैं हबाबों का हुजूम वो चले आए हैं साहिल पर नहाने के लिए सोचता हूँ अब कहीं बिजली गिरी तो क्यूँँ गिरी तिनके लाया था कहाँ से आशियाने के लिए छोड़ कर बस्ती ये दीवाने कहाँ से आ गए दश्त की बैठी-बिठाई ख़ाक उड़ाने के लिए हँस के कहते हो ज़माना भर मुझी पर जान दे रह गए हो क्या तुम्हीं सारे ज़माने के लिए शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए काएनात-ए-इश्क़ इक दिल के सिवा कुछ भी नहीं वो ही आने के लिए है वो ही जाने के लिए ऐ ज़माने भर को ख़ुशियाँ देने वाले ये बता क्या 'क़मर' ही रह गया है ग़म उठाने के लिए
Qamar Jalalvi
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कभी जो आँख पे गेसू-ए-यार होता है शराब-ख़ाने पे अब्र-ए-बहार होता है किसी का ग़म हो मिरे दिल पे बार होता है उसी का नाम ग़म-ए-रोज़गार होता है इलाही ख़ैर हो उन बे-ज़बाँ असीरों की क़फ़स के सामने ज़िक्र-ए-बहार होता है चमन में ऐसे भी दो चार हैं चमन वाले कि जिन को मौसम-ए-गुल नागवार होता है सवाल-ए-जाम तिरे मय-कदे में ऐ साक़ी जवाब-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है हमें वफ़ा पे वफ़ा आज तक न रास आई उन्हें सितम पे सितम साज़गार होता है लबों पे आ गया दम बंद हो चुकीं आँखें चले भी आओ कि ख़त्म इंतिज़ार होता है कहाँ वो वस्ल की रातें कहाँ ये हिज्र के दिन ख़याल-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है जुनूँ तो एक बड़ी चीज़ है मोहब्बत में ज़रा से अश्क से राज़ आश्कार होता है मिरे जनाज़े को देखा तो यास से बोले यहाँ पे आदमी बे-इख़्तियार होता है ख़ुदा रखे तुम्हें क्या कोई जौर भूल गए जो अब तलाश हमारा मज़ार होता है हमारा ज़ोर है क्या बाग़बाँ उठा लेंगे ये आशियाँ जो तुझे नागवार होता है अजीब कश्मकश-ए-बहर-ए-ग़म में दिल है 'क़मर' न डूबता है ये बेड़ा न पार होता है
Qamar Jalalvi
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किसी का नाम लो बे-नाम अफ़्साने बहुत से हैं न जाने किस को तुम कहते हो दीवाने बहुत से हैं जफ़ाओं के गले तुम से ख़ुदा जाने बहुत से हैं मगर महशर का दिन है अपने बेगाने बहुत से हैं बनाए दे रही हैं अजनबी नादारियाँ मुझ को तिरी महफ़िल में वर्ना जाने-पहचाने बहुत से हैं धरी रह जाएगी पाबंदी-ए-ज़िंदाँ जो अब छेड़ा ये दरबानों को समझा दो कि दीवाने बहुत से हैं बस अब सो जाओ नींद आँखों में है कल फिर सुनाएँगे ज़रा सी रह गई है रात अफ़्साने बहुत से हैं तुम्हें किस ने बुलाया मय-कशों से ये न कह साक़ी तबीअ'त मिल गई है वर्ना मयख़ाने बहुत से हैं बड़ी क़ुर्बानियों के बा'द रहना बाग़ में होगा अभी तो आशियाँ बिजली से जलवाने बहुत से हैं लिखी है ख़ाक उड़ानी ही अगर अपने मुक़द्दर में तिरे कूचे पे क्या मौक़ूफ़ वीराने बहुत से हैं न रो ऐ शम्अ'' मौजूदा पतंगों की मुसीबत पर अभी महफ़िल से बाहर तेरे परवाने बहुत से हैं मिरे कहने से होगी तर्क-ए-रस्म-ओ-राह ग़ैरों से बजा है आप ने कहने मिरे माने बहुत से हैं 'क़मर' अल्लाह साथ ईमान के मंज़िल पे पहुँचा दे हरम की राह में सुनते हैं बुत-ख़ाने बहुत से हैं
Qamar Jalalvi
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बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई तौबा मरी फिरेगी कहाँ भीगती हुई पेश आए लाख रंज अगर इक ख़ुशी हुई परवरदिगार ये भी कोई ज़िंदगी हुई अच्छा तो दोनों वक़्त मिले कोसिए हुज़ूर फिर भी मरीज़-ए-ग़म की अगर ज़िंदगी हुई ऐ अंदलीब अपने नशेमन की ख़ैर माँग बिजली गई है सू-ए-चमन देखती हुई देखो चराग़-ए-क़ब्र उसे क्या जवाब दे आएगी शाम-ए-हिज्र मुझे पूछती हुई क़ासिद उन्हीं को जा के दिया था हमारा ख़त वो मिल गए थे उन से कोई बात भी हुई? जब तक कि तेरी बज़्म में चलता रहेगा जाम साक़ी रहेगी गर्दिश-ए-दौराँ रुकी हुई माना कि उन से रात का वा'दा है ऐ 'क़मर' कैसे वो आ सकेंगे अगर चाँदनी हुई
Qamar Jalalvi
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हुस्न कब इश्क़ का ममनून-ए-वफ़ा होता है लाख परवाना मरे शम्अ' पे क्या होता है शग़्ल-ए-सय्याद यही सुब्ह ओ मसा होता है क़ैद होता है कोई कोई रिहा होता है जब पता चलता है ख़ुशबू की वफ़ादारी का फूल जिस वक़्त गुलिस्ताँ से जुदा होता है ज़ब्त करता हूँ तो घुटता है क़फ़स में मिरा दम आह करता हूँ तो सय्याद ख़फ़ा होता है ख़ून होता है सहर तक मिरे अरमानों का शाम-ए-वादा जो वो पाबंद-ए-हिना होता है चाँदनी देख के याद आते हैं क्या क्या वो मुझे चाँद जब शब को 'क़मर' जल्वा-नुमा होता है
Qamar Jalalvi
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