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वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ वो शब-ओ-रोज़ ओ माह-ओ-साल कहाँ फ़ुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक़ किसे ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल कहाँ दिल तो दिल वो दिमाग़ भी न रहा शोर-ए-सौदा-ए-ख़त्त-ओ-ख़ाल कहाँ थी वो इक शख़्स के तसव्वुर से अब वो रानाई-ए-ख़याल कहाँ ऐसा आसाँ नहीं लहू रोना दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ हम से छूटा क़िमार-ख़ाना-ए-इश्क़ वाँ जो जावें गिरह में माल कहाँ फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ मुज़्महिल हो गए क़वा ग़ालिब वो अनासिर में ए'तिदाल कहाँ बोसे में वो मुज़ाइक़ा न करे पर मुझे ताक़त-ए-सवाल कहाँ फ़लक-ए-सिफ़्ला बे-मुहाबा है इस सितम-गर को इंफ़िआल कहाँ

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ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिले सफे आवारगी नहीं लगता कभी-कभी वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी-कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहाँ से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बौसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता तेरे ख़याल से आगे भी एक दुनिया है तेरा ख़याल मुझे सरसरी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता

Tehzeeb Hafi

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तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शे'र ताज़ा कोई हुआ ही नहीं रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं याद है जो उसी को याद करो हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं

Fahmi Badayuni

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जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने क्यूँँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँँ है तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो

Javed Akhtar

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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भुला दिया था जिस को एक शाम याद आ गया ग़ज़ाल देख कर वो ख़ुश-ख़िराम याद आ गया ख़ुदा का शुक्र है कि साँस टूटने से पेशतर वो शक्ल याद आ गई वो नाम याद आ गया वो जिस की ज़ुल्फ़ आँचलों की छाँव को तरस गई शब-ए-विसाल उस को एहतिराम याद आ गया मैं आज तापसी की एक फ़िल्म देख कर हटा तो मुझ को इक पुराना इंतिक़ाम याद आ गया

Tehzeeb Hafi

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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

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दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया आतिश-ए-ख़ामोश की मानिंद गोया जल गया दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया मैं अदम से भी परे हूँ वर्ना ग़ाफ़िल बार-हा मेरी आह-ए-आतिशीं से बाल-ए-अन्क़ा जल गया अर्ज़ कीजे जौहर-ए-अंदेशा की गर्मी कहाँ कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सहरा जल गया दिल नहीं तुझ को दिखाता वर्ना दाग़ों की बहार इस चराग़ाँ का करूँँ क्या कार-फ़रमा जल गया मैं हूँ और अफ़्सुर्दगी की आरज़ू 'ग़ालिब' कि दिल देख कर तर्ज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया ख़ानमान-ए-आशिक़ाँ दुकान-ए-आतिश-बाज़ है शो'ला-रू जब हो गए गर्म-ए-तमाशा जल गया ता कुजा अफ़सोस-ए-गरमी-हा-ए-सोहबत ऐ ख़याल दिल बा-सोज़-ए-आतिश-ए-दाग़-ए-तमन्ना जल गया है 'असद' बेगाना-ए-अफ़्सुर्दगी ऐ बेकसी दिल ज़-अंदाज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया दूद मेरा सुंबुलिस्ताँ से करे है हम-सरी बस-कि शौक़-ए-आतिश-गुल से सरापा जल गया शम्अ-रूयाँ की सर-अंगुश्त-ए-हिनाई देख कर ग़ुंचा-ए-गुल पर-फ़िशाँ परवाना-आसा जल गया

Mirza Ghalib

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कब वो सुनता है कहानी मेरी और फिर वो भी ज़बानी मेरी ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी क्या बयाँ कर के मिरा रोएँगे यार मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी हूँ ज़-ख़ुद रफ़्ता-ए-बैदा-ए-ख़याल भूल जाना है निशानी मेरी मुतक़ाबिल है मुक़ाबिल मेरा रुक गया देख रवानी मेरी क़द्र-ए-संग-ए-सर-ए-रह रखता हूँ सख़्त अर्ज़ां है गिरानी मेरी गर्द-बाद-ए-रह-ए-बेताबी हूँ सरसर-ए-शौक़ है बानी मेरी दहन उस का जो न मालूम हुआ खुल गई हेच मदानी मेरी कर दिया ज़ोफ़ ने आजिज़ 'ग़ालिब' नंग-ए-पीरी है जवानी मेरी

Mirza Ghalib

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रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है इस साल के हिसाब को बर्क़ आफ़्ताब है मीना-ए-मय है सर्व नशात-ए-बहार से बाल-ए-तदर्रव जल्वा-ए-मौज-ए-शराब है ज़ख़्मी हुआ है पाश्ना पा-ए-सबात का ने भागने की गूँ न इक़ामत की ताब है जादाद-ए-बादा-नोशी-ए-रिन्दाँ है शश-जिहत ग़ाफ़िल गुमाँ करे है कि गेती ख़राब है नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का जोश-ए-बहार जल्वे को जिस के नक़ाब है मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँँ माना कि तेरे रुख़ से निगह कामयाब है गुज़रा 'असद' मसर्रत-ए-पैग़ाम-ए-यार से क़ासिद पे मुझ को रश्क-ए-सवाल-ओ-जवाब है ज़ाहिर है तर्ज़-ए-क़ैद से सय्याद की ग़रज़ जो दाना दाम में है सो अश्क-ए-कबाब है बे-चश्म-ए-दिल न कर हवस-ए-सैर-ए-लाला-ज़ार या'नी ये हर वरक़ वरक़-ए-इंतिख़ाब है

Mirza Ghalib

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बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है ग़ुलाम-ए-साक़ी-ए-कौसर हूँ मुझ को ग़म क्या है तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश जानते हैं हम क्या है रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है सुख़न में ख़ामा-ए-ग़ालिब की आतिश-अफ़्शानी यक़ीं है हम को भी लेकिन अब उस में दम क्या है कटे तो शब कहें काटे तो साँप कहलावे कोई बताओ कि वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म क्या है लिखा करे कोई अहकाम-ए-ताला-ए-मौलूद किसे ख़बर है कि वाँ जुम्बिश-ए-क़लम क्या है न हश्र-ओ-नश्र का क़ाएल न केश ओ मिल्लत का ख़ुदा के वास्ते ऐसे की फिर क़सम क्या है वो दाद-ओ-दीद गराँ-माया शर्त है हमदम वगर्ना मेहर-ए-सुलेमान-ओ-जाम-ए-जम क्या है

Mirza Ghalib

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