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वो मिरी दोस्त वो हमदर्द वो ग़म-ख़्वार आँखें एक मासूम मोहब्बत की गुनहगार आँखें शोख़-ओ-शादाब-ओ-हसीं सादा-ओ-पुरकार आँखें मस्त-ओ-सरशार-ओ-जवाँ बे-ख़ुद-ओ-होशियार आँखें तिरछी नज़रों में वो उलझी हुई सूरज की किरन अपने दुज़्दीदा इशारों में गिरफ़्तार आँखें जुम्बिश-ए-अबरू-ओ-मिज़्गाँ कै ख़ुनुक साए में आतिश-अफ़रोज़ जुनूँ-ख़ेज़ शरर-बार आँखें कैफ़ियत दिल की सुनाती हुई एक एक निगाह बे-ज़बाँ हो के भी वो माइल-ए-गुफ़्तार आँखें मौसम-ए-गुल में वो उड़ते हुए भौँरों की तरह ग़ुंचा-ए-दिल पे वो करती हुई यलग़ार आँखें कभी छलकी हुई शर्बत के कटोरों की तरह और कभी ज़हर में डूबी हुई तलवार आँखें कभी ठहरी हुई यख़-बस्ता ग़मों की झीलें कभी सहमा हुआ सिमटा हुआ इक प्यार आँखें कभी झुकते हुए बादल कभी गिरती बिजली कभी उठती हुई आमादा-ए-पैकार आँखें नोक-ए-अबरू में कभी तलख़ी-ए-इंकार लिए कभी घोले हुए शीरीनी-ए-इक़रार आँखें आँच में अपनी जवानी की सुलगती चितवन शबनम-ए-अश्क में धोई हुई गुलनार आँखें हुस्न के चाँद से मुखड़े पे चमकते तारे हाए आँखें वो हरीफ़-ए-लब-ओ-रुख़सार आँखें इशवा-ओ-ग़मज़ा-ओ-अंदाज़-ओ-अदा पर नाज़ाँ अपने पिंदार-ए-जवानी की परस्तार आँखें रूह को रोग मोहब्बत का लगा देती हैं सहत-ए-दिल जो अता करती हैं बीमार आँखें सहन-ए-ज़िंदाँ में है फिर रात के तारों का हुजूम शम्अ''' की तरह फ़रोज़ाँ सर-ए-दीवार आँखें

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं

Varun Anand

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

Bashir Badr

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वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब कहा मैं ने कि वो मिल जाए मुझ को मैं उसे ग़ैर न हो जाए वो बस इतनी हसरत है तो है जल गया परवाना गर तो क्या ख़ता है शम्अ'' की रात भर जलना जलाना उस की क़िस्मत है तो है दोस्त बन कर दुश्मनों सा वो सताता है मुझे फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है दूर थे और दूर हैं हर दम ज़मीन-ओ-आसमाँ दूरियों के बा'द भी दोनों में क़ुर्बत है तो है

Deepti Mishra

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हाँ ये सच है कि मोहब्बत नहीं की दोस्त बस मेरी तबीयत नहीं की इस लिए गांव मैं सैलाब आया हम ने दरियाओ की इज़्ज़त नहीं की जिस्म तक उस ने मुझे सौंप दिया दिल ने इस पर भी कनायत नहीं की मेरे ए'जाज़ में रखी गई थी मैं ने जिस बज़्म में शिरकत नहीं की याद भी याद से रखा उस को भूल जाने में भी गफलत नहीं की उस को देखा था अजब हालत में फिर कभी उस की हिफाज़त नहीं की हम अगर फतह हुए है तो क्या इश्क़ ने किस पे हकूमत नहीं की

Tehzeeb Hafi

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इक सुब्ह है जो हुई नहीं है इक रात है जो कटी नहीं है मक़्तूलों का क़हत पड़ न जाए क़ातिल की कहीं कमी नहीं है वीरानों से आ रही है आवाज़ तख़्लीक़-ए-जुनूँ रुकी नहीं है है और ही कारोबार-ए-मस्ती जी लेना तो ज़िंदगी नहीं है साक़ी से जो जाम ले न बढ़ कर वो तिश्नगी तिश्नगी नहीं है आशिक़-कुशी ओ फ़रेब-कारी ये शेवा-ए-दिलबरी नहीं है भूखों की निगाह में है बिजली ये बर्क़ अभी गिरी नहीं है दिल में जो जलाई थी किसी ने वो शम-ए-तरब बुझी नहीं है इक धूप सी है जो ज़ेर-ए-मिज़्गाँ वो आँख अभी उठी नहीं है हैं काम बहुत अभी कि दुनिया शाइस्ता-ए-आदमी नहीं है हर रंग के आ चुके हैं फ़िरऔन लेकिन ये जबीं झुकी नहीं है

Ali Sardar Jafri

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अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ गुल होती जाती है मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शो'ला-सामानी नहीं जाती ख़ुदा मालूम किस किस के लहू की लाला-कारी है ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आज पहचानी नहीं जाती अगर यूँँ है तो क्यूँँ है यूँँ नहीं तो क्यूँँ नहीं आख़िर यक़ीं मोहकम है लेकिन दिल की हैरानी नहीं जाती लहू जितना था सारा सर्फ़-ए-मक़्तल हो गया लेकिन शहीदान-ए-वफ़ा के रुख़ की ताबानी नहीं जाती परेशाँ-रोज़गार आशुफ़्ता-हालाँ का मुक़द्दर है कि उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की परेशानी नहीं जाती हर इक शय और महँगी और महँगी होती जाती है बस इक ख़ून-ए-बशर है जिस की अर्ज़ानी नहीं जाती नए ख़्वाबों के दिल में शो'ला-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर है ज़मीर-ए-हज़रत-ए-इंसाँ की सुलतानी नहीं जाती लगाते हैं लबों पर मोहर-ए-अर्बाब-ए-ज़बाँ-बंदी अली-'सरदार' की शान-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती

Ali Sardar Jafri

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अब आ गया है जहाँ में तो मुस्कुराता जा चमन के फूल दिलों के कँवल खिलाता जा अदम हयात से पहले अदम हयात के बा'द ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा गुज़र चमन से मिसाल-ए-नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार गुलों को छेड़ के काँटों को गुदगुदाता जा रह-ए-दराज़ है और दूर शौक़ की मंज़िल गराँ है मरहला-ए-उम्र गीत गाता जा बला से बज़्म में गर ज़ौक़-ए-नग़्मगी कम है नवा-ए-तल्ख़ को कुछ तल्ख़-तर बनाता जा जो हो सके तो बदल ज़िंदगी को ख़ुद वर्ना नज़ाद-ए-नौ को तरीक़-ए-जुनूँ सिखाता जा दिखा के जलवा-ए-फ़र्दा बना दे दीवाना नए ज़माने के रुख़ से नक़ाब उठाता जा बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा

Ali Sardar Jafri

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लग़्ज़िश-ए-गाम लिए लग़्ज़िश-ए-मस्ताना लिए आए हम बज़्म में फिर जुरअत-ए-रिंदाना लिए इश्क़ पहलू में है फिर जल्वा-ए-जानाना लिए ज़ुल्फ़ इक हाथ में इक हाथ में पैमाना लिए याद करता था हमें साक़ी-ओ-मीना का हुजूम उठ गए थे जो कभी रौनक़-ए-मय-ख़ाना लिए वस्ल की सुब्ह शब-ए-हिज्र के बा'द आई है आफ़्ताब-ए-रुख़-ए-महबूब का नज़राना लिए अस्र-ए-हाज़िर को मुबारक हो नया दौर-ए-अवाम अपनी ठोकर में सर-ए-शौकत-ए-शाहाना लिए

Ali Sardar Jafri

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इश्क़ का नग़्मा जुनूँ के साज़ पर गाते हैं हम अपने ग़म की आँच से पत्थर को पिघलाते हैं हम जाग उठते हैं तो सूली पर भी नींद आती नहीं वक़्त पड़ जाए तो अंगारों पे सो जाते हैं हम ज़िंदगी को हम से बढ़ कर कौन कर सकता है प्यार और अगर मरने पे आ जाएँ तो मर जाते हैं हम दफ़्न हो कर ख़ाक में भी दफ़्न रह सकते नहीं लाला-ओ-गुल बन के वीरानों पे छा जाते हैं हम हम कि करते हैं चमन में एहतिमाम-ए-रंग-ओ-बू रू-ए-गेती से नक़ाब-ए-हुस्न सरकाते हैं हम अक्स पड़ते ही सँवर जाते हैं चेहरे के नुक़ूश शाहिद-ए-हस्ती को यूँँ आईना दिखलाते हैं हम मय-कशों को मुज़्दा सदियों के प्यासों को नवेद अपनी महफ़िल अपना साक़ी ले के अब आते हैं हम

Ali Sardar Jafri

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