zara si der ko aae the khvab ankhon men phir us ke baad musalsal azaab ankhon men vo jis ke naam ki nisbat se raushni tha vajud khatak raha hai vahi aftab ankhon men jinhen mata-e-dil-o-jan samajh rahe the ham vo aaine bhi hue be-hijab ankhon men ajab tarah ka hai mausam ki khaak udti hai vo din bhi the ki khile the gulab ankhon men mire ghhazal tiri vahshaton ki khair ki hai bahut dinon se bahut iztirab ankhon men na jaane kaisi qayamat ka pesh-khema hai ye uljhanen tiri be-intisab ankhon men javaz kya hai mire kam-sukhan bata to sahi ba-nam-e-khush-nigahi har javab ankhon men zara si der ko aae the khwab aankhon mein phir us ke baad musalsal azab aankhon mein wo jis ke nam ki nisbat se raushni tha wajud khatak raha hai wahi aaftab aankhon mein jinhen mata-e-dil-o-jaan samajh rahe the hum wo aaine bhi hue be-hijab aankhon mein ajab tarah ka hai mausam ki khak udti hai wo din bhi the ki khile the gulab aankhon mein mere ghazal teri wahshaton ki khair ki hai bahut dinon se bahut iztirab aankhon mein na jaane kaisi qayamat ka pesh-khema hai ye uljhanen teri be-intisab aankhon mein jawaz kya hai mere kam-sukhan bata to sahi ba-nam-e-khush-nigahi har jawab aankhon mein
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना
Zubair Ali Tabish
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बे-वफ़ाई में भी मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी लहू की आग में जल-बुझ गए बदन तो खुला रसाई में भी ख़सारा है ना-रसाई में भी बदलते रहते हैं मौसम गुज़रता रहता है वक़्त मगर ये दिल कि वहीं का वहीं जुदाई में भी लिहाज़-ए-हुर्मत-ए-पैमाँ न पास-ए-हम-ख़्वाबी अजब तरह के तसादुम थे आशनाई में भी मैं दस बरस से किसी ख़्वाब के अज़ाब में हूँ वही अज़ाब दर आया है इस दहाई में भी तसादुम-ए-दिल-ओ-दुनिया में दिल की हार के बा'द हिजाब आने लगा है ग़ज़ल-सराई में भी मैं जा रहा हूँ अब उस की तरफ़ उसी की तरफ़ जो मेरे साथ था मेरी शिकस्ता-पाई में भी
Iftikhar Arif
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कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में ये वक़्त किस की र'ऊनत पे ख़ाक डाल गया ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में यही है मस्लहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में
Iftikhar Arif
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ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है यहाँ वा'दों की अर्ज़ानी बहुत है शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं मगर लहजों में वीरानी बहुत है सुबुक-ज़र्फ़ों के क़ाबू में नहीं लफ़्ज़ मगर शौक़-ए-गुल-अफ़्शानी बहुत है है बाज़ारों में पानी सर से ऊँचा मिरे घर में भी तुग़्यानी बहुत है न जाने कब मिरे सहरा में आए वो इक दरिया कि तूफ़ानी बहुत है न जाने कब मिरे आँगन में बरसे वो इक बादल कि नुक़सानी बहुत है
Iftikhar Arif
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कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर सग-ए-ज़माना हैं हम क्या हमारी हिजरत क्या दिमश्क़-ए-मस्लहत ओ कूफ़ा-ए-निफ़ाक़ के बीच फ़ुग़ान-ए-क़ाफ़िला-ए-बे-नवा की क़ीमत क्या मआल-ए-इज़्ज़त-ए-सादात-ए-इश्क़ देख के हम बदल गए तो बदलने पे इतनी हैरत क्या क़िमार-ख़ाना-ए-हस्ती में एक बाज़ी पर तमाम उम्र लगा दी तो फिर शिकायत क्या फ़रोग़-ए-सनअत-ए-क़द-आवरी का मौसम है सुबुक हुए पे भी निकला है क़द्द-ओ-क़ामत क्या
Iftikhar Arif
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थकन तो अगले सफ़र के लिए बहाना था उसे तो यूँँ भी किसी और सम्त जाना था वही चराग़ बुझा जिस की लौ क़यामत थी उसी पे ज़र्ब पड़ी जो शजर पुराना था मता-ए-जाँ का बदल एक पल की सरशारी सुलूक ख़्वाब का आँखों से ताजिराना था हवा की काट शगूफ़ों ने जज़्ब कर ली थी तभी तो लहजा-ए-ख़ुशबू भी जारेहाना था वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल नई किताब का एक इक वरक़ पुराना था क़बा-ए-ज़र्द निगार-ए-ख़िज़ाँ पे सजती थी तभी तो चाल का अंदाज़ ख़ुसरवाना था
Iftikhar Arif
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