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आवारगी मुख़्तसर लम्हों से याद आ गई आवारगी तुझे पाने की आरज़ू में क़ाएम थे हम सँवरे सँवरे तेरी तिश्नगी में खो जाते थे हम तय जो किया था वो भूल जाते थे हम ऐ आवारगी तेरे इश्क़ में खो जाते थे हम ऐ आवारगी शहर-ए-निगाराँ में तुझे ढूंँढ़ते थे हम इस क़दर गोते लगाकर गुम हो जाते थे हम एक बार जो कहना था वो कह न पाए ऐ आवारगी ज़ुल्मते शब में तुझे खोजते रहे ऐ आवारगी ख़्वाबों में भी नज़रों से नज़र हटती नहीं मौसम-ए-ख़िज़ाँ की तरह चाहत कम न हो जाए अब तन्हा कहाँ तुझे सोच के हम ऐ आवारगी

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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र

ZafarAli Memon

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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है

Aasi Rizvi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"तुम्हारी याद" तुम्हारी याद आते ही दिल को थाम लेता हूँ तुम्हें ही याद करता हूँ तुम्हारा नाम लेता हूँ तुम्हारी याद लाती है तबस्सुम मेरे चेहरे पर ख़यालों में संवरता हूँ निकल आते सुनहरे पर तुम्हारा याद आना ज़िन्दगी दुश्वार होना है तुम्हारी याद खो जाना मेरा बीमार होना है तुम्हारी याद आती है तो सब कुछ भूल जाता हूँ मैं जब कुछ भूल जाता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आती है तो आँखें बंद करता हूँ मैं आँखें बंद करता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आने से तुम्हारी याद जाने तक जो वक़्फा भी गुजऱता है तुम्हारी याद आती है

S M Afzal Imam

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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"यार-दोस्त" यार-दोस्त सफ़र में साथ चलते चले गए जिन्हें जल्दी थी वो बहुत आगे चले गए वक़्त के साथ कोई जहाँ थे वहाँ बस गए वाक़ि'आ और कुछ चेहरे दिल में रह गए कारवाँ दोस्तों का फिर थोड़ा घटता गया तन्हाइयों का रह के आलम शुरू हो गया कोई कसक बचपन की थी बाक़ी रह गई बिछड़ के न मिलने की छोटी सी भूल हो गई रुक रुक के चले तो मकाँ सारे याद आ गए दोस्तों खेलकूद के हसीं वो ज़माने याद आ गए

Manohar Shimpi

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"चिंगारी" आज़ादी के ख़्वाब उन के कैसे रँगते रहे ख़्वाबों में सैलाब जैसे फिर उमड़ते रहे भगत सिंह संग राजगुरु और सुखदेव मुल्क के लिए मिल के ख़ूब लड़ते रहे धागे से धागे ही इस क़दर जुड़ते गए काफ़िले में लोग बहुत सारे बढ़ते रहे एसेंबली में एक छोटी चिंगारी से जैसे माहौल और मौसम के रंग बदलते रहे नारा इंक़िलाब जिंदाबाद देते देते ही फाँसी का फिर तख़्ता वो ही चढ़ते रहे ख़्वाब ये तो देखे नहीं थे उन्होंने भी आज़ादी में छींटे ख़ून के कहीं उड़ते रहे मिल के सभी याद करों क़ुर्बानी उन की मुल्क के वास्ते हो सके अच्छा करते रहे

Manohar Shimpi

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"संग तराश" संग तराश अब तक कई देखे ना तुझ सा फनकार देखा कोई जो सनम इस तरह तराशे जैसे जीती जागती लगे मूरत भी ख़ुद-साख़्ता तसव्वर को भी जो कर दे अपने फन से ज़िन्दा कौनसे नगर से है अजब ये बाशिंदा देखके सभी कहें ख़ुदा का है ये बंदा देखते हाल ए दिल बयाँ यूँँ होता जैसे मूरत भी लगे आज़ुर्दा-जमाल ख़ुदा के मानिंद है तेरा ये कमाल जैसे हो संग तराशी की इक मिसाल

Manohar Shimpi

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"तहरीरी" मूरत की तरह अगर मैं खड़ा रहूँ तो न कहना मुझे ये कि मेरी पहचान ही कोई नहीं है बेक़दर मत बन और देख मुझ को ऐ हमनशीं तेरा मुंतज़िर ही हूँ मैं इम्कान है कि दिल पे पहली चोट जो हुई है, वो ज़र्ब आज भी है वो ही ज़र्ब तो मेरी अर्सा-ए-हयात भी है इत्तिफ़ाक़न तू मिली तो ख़ुश-फ़हम सा खड़ा हूँ मैं

Manohar Shimpi

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ख़लिश वो ख़्वाब भी टूटे जिन को अब तक रखा था ज़िंदा अगर अहद-ए-वफ़ा भी न हो तो क्यूँँ फिर हों हम शर्मिंदा इश्क़ मुहब्बत के हम भी रहे हैं बाशिंदे जब कभी हम मिलते थे ख़ूब माज़ी रहा क्या है आइंदा अब सिर्फ़ इक ख़लिश ही तो है सच होंगे क्या पैमान जो थे पाइंदा

Manohar Shimpi

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