nazmKuch Alfaaz

"ऐसा कहाँ होता है" सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अगर इश्क़ में लैला नहीं थी वो, तो मजनू नहीं हूँ मैं अगर इश्क़ में हीर नहीं थी वो, तो रांझा भी नहीं हूँ मैं उसे सच्चा इश्क़ होता तो आ कर बताती मुझे वरना इश्क़ में वफ़ा करने पर, ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है मैं इश्क़ ज़ाहिर करता रहा वो बे-वफ़ाई से कभी बाज़ ना आई मैं इश्क़ में उस के क़रीब आता रहा पर वो कभी मेरे पास ना आई मैं बड़ी शिद्दत-मुद्दत से पाना चाहता था उसे फिर सोचता हूँ कि ये सब करने पर भी इश्क़ में ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अक्सर उस की बे-वफ़ाई के क़िस्से सुना करता था मैं कभी दोस्तों से तो कभी ग़ैरों से सुना करता था मैं इश्क़ था "कुशल" को इस लिए यक़ीं न हुआ वरना दोस्तों की बातों पर शक हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"लव ट्राईऐंगल" जब ख़यालों में मैं उस के पीछे पीछे जाता भाव खाती देखो फिर मैं उस सेे रुठ जाता ऐसे वैसे कैसे कैसे मुझ को वो मनाती जान थी मेरी वो कैसे मैं ना मान पाता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता तू सवाल और तेरा मैं जवाब होता काश जो तू मेरी आँखों में वो झाँक जाती तेरे पास में जो महका मैं गुलाब होता अगर ये ख़्वाब सच हुआ तो सुनले ऐ हसीं मैं पूरी उम्र तेरे दिल में ही गुज़ार दूँ तू जो चले तो दिन हो जब रूके तो रात हो ये काएनात तेरे क़दमों में उतार दूँ अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता काश जो तू बोले तेरी मैं आवाज़ होता तू शबाब तेरी धुन में मैं शराब होता सबके चेहरों को तो तू यूँँ निहार जाती तेरे नैनों का कभी तो मैं शिकार होता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता

Rohit tewatia 'Ishq'

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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

Shadab Javed

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"ज़िन्दगी उधार लगती है" जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है बिना तेरे मुझे हर रात बे-ईमान लगती है आ जाए अगर वापिस तो बाहों में समेटूँगा तुझे साँस तो लेता हूँ फिर क्यूँ ज़िन्दगी बेजान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है यूँँ तुझे तो याद कर के दिन बीता लेता हूँ मैं आने की तेरी ताख़ में नैन बिछाए रखता हूँ मैं न जाने अब क्यूँ बिन तेरे अधूरी पहचान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है नहीं मानता ये दिल मेरा पर कैसे सब भूल जाऊँ मैं चल ये बता इस दिल का क्या इलाज करवाऊँ मैं न जाने अब क्यूँ ज़िन्दगी उफ़ान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है

Kushal "PARINDA"

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"तेरे ज़ेहन में" तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है जो दिल कभी धड़कता था मुझे देख कर वो अब थम सा चुका है ये पता चल रहा है वो मोहब्बत जो मेरी थी कभी आज किसी और की है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है ये अश्क न बहाओ मेरे सामने तुम ये अश्क झूठे है ये पता चल रहा है जो जुदाई पर मर जाने की बात किया करती थी आज वो किसी ओर पर मरती है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है

Kushal "PARINDA"

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"तेरे जाने पे" तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप-चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरे वादे-क़समों की याद में रोया भी और हँसा भी तेरी झूठी ख़्वाहिशों के नीचे दबा भी और पिसा भी तुझे लगा चुप रहता हूँ मैं कोई मासूम बच्चा नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरी यादों में दिन और रात दोनों गुज़ार लिया करता हूँ मैं पहले तेरे नैनों से तो अब मैख़ानों से पी लिया करता हूँ मैं तुझे लगा नशे में रहता हूँ, कोई शराबी नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं सोचता हूँ तू तो प्यार-प्यार किया करती थी 'कुशल' से जुदाई की बात पर मर जाने की बात किया करती थी तुझे लगा तेरे खेल को न समझ पाऊँगा मैं न समझ पाऊँ कोई गँवार नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं

Kushal "PARINDA"

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"मेरे दिल में है इक वो निशाँ" मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है छोड़ रहने दे, दर्द सहने दे जो ना कहना था, वो भी कहने दे इश्क़ दरिया में मुझ को बहने दे मेरा दिल तो है इक आइना जिसे तोड़ता हर एक है तुझ को पाया था, दिल में बसाया था इश्क़ कर दिल को यूँँ सताया था इश्क़ कर ख़ुद को भी रुलाया था मेरे दिल की कुछ ऐसी ज़मीं जिसे छोड़ता हर एक है मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है

Kushal "PARINDA"

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"हाँ वापिस जा रहा हूँ मैं" हाँ वापिस जा रहा हूँ मैं तुम से पाकर धोखा इश्क़ में दिल को समझा रहा हूँ मैं मैं ने तो इश्क़ किया था तुम्हें पाने के लिए पर अब लगता है जैसे इश्क़ के दरिया में बहता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं तुम्हें तो सब मालूम था मैं कैसा इश्क़ करता था तुम से और किस कदर मैं इश्क़ में मरता था तुम पे सब जान कर भी क्यूँ मुझे धोखा दिया तुम ने और इक मैं हूँ जो अब भी तुम पे ऐतिबार करता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं मैं देखता हूँ तुम ने कोई कसर न छोड़ी मेरे इश्क़ का मज़ाक़ बनाने में पर मैं ने भी कोई कसर न छोड़ी वापिस तुम्हें अपना बनाने में अब घिन आती है ख़ुद पर जो अब भी तुम पे मरता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं कैसे भूलूं उस दिन को जब मैं ने रक़ीब को तेरी बाँहों में पाया था जब चंद ऐशों आराम के लिए तुम ने मेरे इश्क़ को ठुकराया था इस दर्द का एहसास तुम्हें भी हो इस लिए ख़ुदा से अब ये दुआ करता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं

Kushal "PARINDA"

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