"हाँ वापिस जा रहा हूँ मैं" हाँ वापिस जा रहा हूँ मैं तुम से पाकर धोखा इश्क़ में दिल को समझा रहा हूँ मैं मैं ने तो इश्क़ किया था तुम्हें पाने के लिए पर अब लगता है जैसे इश्क़ के दरिया में बहता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं तुम्हें तो सब मालूम था मैं कैसा इश्क़ करता था तुम से और किस कदर मैं इश्क़ में मरता था तुम पे सब जान कर भी क्यूँ मुझे धोखा दिया तुम ने और इक मैं हूँ जो अब भी तुम पे ऐतिबार करता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं मैं देखता हूँ तुम ने कोई कसर न छोड़ी मेरे इश्क़ का मज़ाक़ बनाने में पर मैं ने भी कोई कसर न छोड़ी वापिस तुम्हें अपना बनाने में अब घिन आती है ख़ुद पर जो अब भी तुम पे मरता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं कैसे भूलूं उस दिन को जब मैं ने रक़ीब को तेरी बाँहों में पाया था जब चंद ऐशों आराम के लिए तुम ने मेरे इश्क़ को ठुकराया था इस दर्द का एहसास तुम्हें भी हो इस लिए ख़ुदा से अब ये दुआ करता जा रहा हूँ मैं हाँ जाना अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं अब तो वापिस जा रहा हूँ मैं
Related Nazm
तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
117 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
37 likes
मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
161 likes
More from Kushal "PARINDA"
"ज़िन्दगी उधार लगती है" जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है बिना तेरे मुझे हर रात बे-ईमान लगती है आ जाए अगर वापिस तो बाहों में समेटूँगा तुझे साँस तो लेता हूँ फिर क्यूँ ज़िन्दगी बेजान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है यूँँ तुझे तो याद कर के दिन बीता लेता हूँ मैं आने की तेरी ताख़ में नैन बिछाए रखता हूँ मैं न जाने अब क्यूँ बिन तेरे अधूरी पहचान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है नहीं मानता ये दिल मेरा पर कैसे सब भूल जाऊँ मैं चल ये बता इस दिल का क्या इलाज करवाऊँ मैं न जाने अब क्यूँ ज़िन्दगी उफ़ान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है
Kushal "PARINDA"
1 likes
"तेरे ज़ेहन में" तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है जो दिल कभी धड़कता था मुझे देख कर वो अब थम सा चुका है ये पता चल रहा है वो मोहब्बत जो मेरी थी कभी आज किसी और की है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है ये अश्क न बहाओ मेरे सामने तुम ये अश्क झूठे है ये पता चल रहा है जो जुदाई पर मर जाने की बात किया करती थी आज वो किसी ओर पर मरती है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है
Kushal "PARINDA"
1 likes
"तेरे जाने पे" तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप-चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरे वादे-क़समों की याद में रोया भी और हँसा भी तेरी झूठी ख़्वाहिशों के नीचे दबा भी और पिसा भी तुझे लगा चुप रहता हूँ मैं कोई मासूम बच्चा नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरी यादों में दिन और रात दोनों गुज़ार लिया करता हूँ मैं पहले तेरे नैनों से तो अब मैख़ानों से पी लिया करता हूँ मैं तुझे लगा नशे में रहता हूँ, कोई शराबी नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं सोचता हूँ तू तो प्यार-प्यार किया करती थी 'कुशल' से जुदाई की बात पर मर जाने की बात किया करती थी तुझे लगा तेरे खेल को न समझ पाऊँगा मैं न समझ पाऊँ कोई गँवार नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं
Kushal "PARINDA"
2 likes
"मेरे दिल में है इक वो निशाँ" मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है छोड़ रहने दे, दर्द सहने दे जो ना कहना था, वो भी कहने दे इश्क़ दरिया में मुझ को बहने दे मेरा दिल तो है इक आइना जिसे तोड़ता हर एक है तुझ को पाया था, दिल में बसाया था इश्क़ कर दिल को यूँँ सताया था इश्क़ कर ख़ुद को भी रुलाया था मेरे दिल की कुछ ऐसी ज़मीं जिसे छोड़ता हर एक है मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है
Kushal "PARINDA"
1 likes
"ऐसा कहाँ होता है" सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अगर इश्क़ में लैला नहीं थी वो, तो मजनू नहीं हूँ मैं अगर इश्क़ में हीर नहीं थी वो, तो रांझा भी नहीं हूँ मैं उसे सच्चा इश्क़ होता तो आ कर बताती मुझे वरना इश्क़ में वफ़ा करने पर, ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है मैं इश्क़ ज़ाहिर करता रहा वो बे-वफ़ाई से कभी बाज़ ना आई मैं इश्क़ में उस के क़रीब आता रहा पर वो कभी मेरे पास ना आई मैं बड़ी शिद्दत-मुद्दत से पाना चाहता था उसे फिर सोचता हूँ कि ये सब करने पर भी इश्क़ में ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अक्सर उस की बे-वफ़ाई के क़िस्से सुना करता था मैं कभी दोस्तों से तो कभी ग़ैरों से सुना करता था मैं इश्क़ था "कुशल" को इस लिए यक़ीं न हुआ वरना दोस्तों की बातों पर शक हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है
Kushal "PARINDA"
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Kushal "PARINDA".
Similar Moods
More moods that pair well with Kushal "PARINDA"'s nazm.







