nazmKuch Alfaaz

"तेरे जाने पे" तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप-चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरे वादे-क़समों की याद में रोया भी और हँसा भी तेरी झूठी ख़्वाहिशों के नीचे दबा भी और पिसा भी तुझे लगा चुप रहता हूँ मैं कोई मासूम बच्चा नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरी यादों में दिन और रात दोनों गुज़ार लिया करता हूँ मैं पहले तेरे नैनों से तो अब मैख़ानों से पी लिया करता हूँ मैं तुझे लगा नशे में रहता हूँ, कोई शराबी नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं सोचता हूँ तू तो प्यार-प्यार किया करती थी 'कुशल' से जुदाई की बात पर मर जाने की बात किया करती थी तुझे लगा तेरे खेल को न समझ पाऊँगा मैं न समझ पाऊँ कोई गँवार नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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"तेरे ज़ेहन में" तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है जो दिल कभी धड़कता था मुझे देख कर वो अब थम सा चुका है ये पता चल रहा है वो मोहब्बत जो मेरी थी कभी आज किसी और की है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है ये अश्क न बहाओ मेरे सामने तुम ये अश्क झूठे है ये पता चल रहा है जो जुदाई पर मर जाने की बात किया करती थी आज वो किसी ओर पर मरती है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है

Kushal "PARINDA"

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"ऐसा कहाँ होता है" सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अगर इश्क़ में लैला नहीं थी वो, तो मजनू नहीं हूँ मैं अगर इश्क़ में हीर नहीं थी वो, तो रांझा भी नहीं हूँ मैं उसे सच्चा इश्क़ होता तो आ कर बताती मुझे वरना इश्क़ में वफ़ा करने पर, ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है मैं इश्क़ ज़ाहिर करता रहा वो बे-वफ़ाई से कभी बाज़ ना आई मैं इश्क़ में उस के क़रीब आता रहा पर वो कभी मेरे पास ना आई मैं बड़ी शिद्दत-मुद्दत से पाना चाहता था उसे फिर सोचता हूँ कि ये सब करने पर भी इश्क़ में ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अक्सर उस की बे-वफ़ाई के क़िस्से सुना करता था मैं कभी दोस्तों से तो कभी ग़ैरों से सुना करता था मैं इश्क़ था "कुशल" को इस लिए यक़ीं न हुआ वरना दोस्तों की बातों पर शक हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है

Kushal "PARINDA"

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"ज़िन्दगी उधार लगती है" जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है बिना तेरे मुझे हर रात बे-ईमान लगती है आ जाए अगर वापिस तो बाहों में समेटूँगा तुझे साँस तो लेता हूँ फिर क्यूँ ज़िन्दगी बेजान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है यूँँ तुझे तो याद कर के दिन बीता लेता हूँ मैं आने की तेरी ताख़ में नैन बिछाए रखता हूँ मैं न जाने अब क्यूँ बिन तेरे अधूरी पहचान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है नहीं मानता ये दिल मेरा पर कैसे सब भूल जाऊँ मैं चल ये बता इस दिल का क्या इलाज करवाऊँ मैं न जाने अब क्यूँ ज़िन्दगी उफ़ान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है

Kushal "PARINDA"

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"मेरे दिल में है इक वो निशाँ" मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है छोड़ रहने दे, दर्द सहने दे जो ना कहना था, वो भी कहने दे इश्क़ दरिया में मुझ को बहने दे मेरा दिल तो है इक आइना जिसे तोड़ता हर एक है तुझ को पाया था, दिल में बसाया था इश्क़ कर दिल को यूँँ सताया था इश्क़ कर ख़ुद को भी रुलाया था मेरे दिल की कुछ ऐसी ज़मीं जिसे छोड़ता हर एक है मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है

Kushal "PARINDA"

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"माँ-बाप बिना" वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा। मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा। माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। माँ कोख में ले कर चलती है, पिता सोच में ले कर चलते है। बच्चों को कोई तकलीफ़ न हो, फर्ज़ों का बोझ उठा कर चलते है। अपनी क़लम से लिख इनका, गुणगान भी कर के जाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। माँ-बाप के लाड़ प्यार में, डाँट तो बेशक होती है। बच्चे कितने भी हो लेकिन, उन्हे फ़िक्र सभी की होती है। उन की इस शिक्षा से मैं, हर मैदान फतेह कर जाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। कैसे भूलूँ आधीरात में, माँ का गीले से सूखे पर सुलाना। कैसे भूलूँ उस बाप को, अपना पेट काट मुझ को खिलाना। मैं तुम दोनो के बलिदान का, कभी कर्ज चुका न पाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। उन बच्चों के भी क्या कहने, जो माँ-बाप से अलग हो जाते है। उन सेे कोई तकलीफ़ न हो, वृद्ध आश्रम छोड़कर जाते है। रब्ब बोले ऐसी औलाद को, कभी माफ़ न मैं कर पाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा। मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा। माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।

Kushal "PARINDA"

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