"तेरे ज़ेहन में" तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है जो दिल कभी धड़कता था मुझे देख कर वो अब थम सा चुका है ये पता चल रहा है वो मोहब्बत जो मेरी थी कभी आज किसी और की है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है ये अश्क न बहाओ मेरे सामने तुम ये अश्क झूठे है ये पता चल रहा है जो जुदाई पर मर जाने की बात किया करती थी आज वो किसी ओर पर मरती है ये पता चल रहा है तेरे ज़ेहन में क्या चल रहा है जान मुझे सब पता चल रहा है मुझ से नज़रें चुरा रही हो तुम तेरी नज़रों से पता चल रहा है
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"ज़िन्दगी उधार लगती है" जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है बिना तेरे मुझे हर रात बे-ईमान लगती है आ जाए अगर वापिस तो बाहों में समेटूँगा तुझे साँस तो लेता हूँ फिर क्यूँ ज़िन्दगी बेजान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है यूँँ तुझे तो याद कर के दिन बीता लेता हूँ मैं आने की तेरी ताख़ में नैन बिछाए रखता हूँ मैं न जाने अब क्यूँ बिन तेरे अधूरी पहचान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है नहीं मानता ये दिल मेरा पर कैसे सब भूल जाऊँ मैं चल ये बता इस दिल का क्या इलाज करवाऊँ मैं न जाने अब क्यूँ ज़िन्दगी उफ़ान लगती है जब से गए हो ज़िन्दगी उधार लगती है
Kushal "PARINDA"
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"ऐसा कहाँ होता है" सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अगर इश्क़ में लैला नहीं थी वो, तो मजनू नहीं हूँ मैं अगर इश्क़ में हीर नहीं थी वो, तो रांझा भी नहीं हूँ मैं उसे सच्चा इश्क़ होता तो आ कर बताती मुझे वरना इश्क़ में वफ़ा करने पर, ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है मैं इश्क़ ज़ाहिर करता रहा वो बे-वफ़ाई से कभी बाज़ ना आई मैं इश्क़ में उस के क़रीब आता रहा पर वो कभी मेरे पास ना आई मैं बड़ी शिद्दत-मुद्दत से पाना चाहता था उसे फिर सोचता हूँ कि ये सब करने पर भी इश्क़ में ऐसा कहाँ होता है सही सुना था के जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है अक्सर उस की बे-वफ़ाई के क़िस्से सुना करता था मैं कभी दोस्तों से तो कभी ग़ैरों से सुना करता था मैं इश्क़ था "कुशल" को इस लिए यक़ीं न हुआ वरना दोस्तों की बातों पर शक हो जाए ऐसा कहाँ होता है सही सुना था जहाँ आग जलती है धुआँ वहीं होता है हर बार मोहब्बत में यार मिल जाए, ऐसा कहाँ होता है वैसे तो इश्क़ मेरा इक तरफ़ा ही था उस के दरमियाँ वरना दो तरफ़ा मोहब्बत में बे-वफ़ाई हो जाए ऐसा कहाँ होता है
Kushal "PARINDA"
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"माँ-बाप बिना" वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा। मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा। माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। माँ कोख में ले कर चलती है, पिता सोच में ले कर चलते है। बच्चों को कोई तकलीफ़ न हो, फर्ज़ों का बोझ उठा कर चलते है। अपनी क़लम से लिख इनका, गुणगान भी कर के जाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। माँ-बाप के लाड़ प्यार में, डाँट तो बेशक होती है। बच्चे कितने भी हो लेकिन, उन्हे फ़िक्र सभी की होती है। उन की इस शिक्षा से मैं, हर मैदान फतेह कर जाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। कैसे भूलूँ आधीरात में, माँ का गीले से सूखे पर सुलाना। कैसे भूलूँ उस बाप को, अपना पेट काट मुझ को खिलाना। मैं तुम दोनो के बलिदान का, कभी कर्ज चुका न पाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। उन बच्चों के भी क्या कहने, जो माँ-बाप से अलग हो जाते है। उन सेे कोई तकलीफ़ न हो, वृद्ध आश्रम छोड़कर जाते है। रब्ब बोले ऐसी औलाद को, कभी माफ़ न मैं कर पाऊँगा। वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा। वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा। मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा। माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।
Kushal "PARINDA"
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"मेरे दिल में है इक वो निशाँ" मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है छोड़ रहने दे, दर्द सहने दे जो ना कहना था, वो भी कहने दे इश्क़ दरिया में मुझ को बहने दे मेरा दिल तो है इक आइना जिसे तोड़ता हर एक है तुझ को पाया था, दिल में बसाया था इश्क़ कर दिल को यूँँ सताया था इश्क़ कर ख़ुद को भी रुलाया था मेरे दिल की कुछ ऐसी ज़मीं जिसे छोड़ता हर एक है मेरे दिल में है इक वो निशाँ जिसे छेड़ता हर एक है तुझे ना दिखे क्यूँ वो निशाँ जिसे देखता हर एक है
Kushal "PARINDA"
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"तेरे जाने पे" तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप-चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरे वादे-क़समों की याद में रोया भी और हँसा भी तेरी झूठी ख़्वाहिशों के नीचे दबा भी और पिसा भी तुझे लगा चुप रहता हूँ मैं कोई मासूम बच्चा नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं तेरी यादों में दिन और रात दोनों गुज़ार लिया करता हूँ मैं पहले तेरे नैनों से तो अब मैख़ानों से पी लिया करता हूँ मैं तुझे लगा नशे में रहता हूँ, कोई शराबी नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं सोचता हूँ तू तो प्यार-प्यार किया करती थी 'कुशल' से जुदाई की बात पर मर जाने की बात किया करती थी तुझे लगा तेरे खेल को न समझ पाऊँगा मैं न समझ पाऊँ कोई गँवार नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं मैं आशिक़ सच्चा था तेरी तरह झूठा नहीं था मैं तुझे जाना ही था तो चुप चाप चली जाती तोड़ने को कोई खिलौना नहीं था मैं तेरे जाने पे रोया ज़रूर था मगर टूटा नहीं था मैं
Kushal "PARINDA"
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