नज़र झुकाए उरूस-ए-फ़ितरत जबीं से ज़ुल्फ़ें हटा रही है सहर का तारा है ज़लज़ले में उफ़ुक़ की लौ थरथरा रही है रविश रविश नग़्मा-ए-तरब है चमन चमन जश्न-ए-रंग-ओ-बू है तुयूर शाख़ों पे हैं ग़ज़ल-ख़्वाँ कली कली गुनगुना रही है सितारा-ए-सुब्ह की रसीली झपकती आँखों में हैं फ़साने निगार-ए-महताब की नशीली निगाह जादू जगा रही है तुयूर बज़्म-ए-सहर के मुतरिब लचकती शाख़ों पे गा रहे हैं नसीम फ़िरदौस की सहेली गुलों को झूला झुला रही है कली पे बेले की किस अदास पड़ा है शबनम का एक मोती नहीं ये हीरे की कील पहने कोई परी मुस्कुरा रही है सहर को मद्द-ए-नज़र हैं कितनी रिआयतें चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ की हवा बयाबाँ से आने वाली लहू में सुर्ख़ी बढ़ा रही है शलूका पहने हुए गुलाबी हर इक सुबुक पंखुड़ी चमन में रंगी हुई सुर्ख़ ओढ़नी का हवा में पल्लू सुखा रही है फ़लक पे इस तरह छुप रहे हैं हिलाल के गिर्द-ओ-पेश तारे कि जैसे कोई नई नवेली जबीं से अफ़्शाँ छुड़ा रही है खटक ये क्यूँँ दिल में हो चली फिर चटकती कलियो? ज़रा ठहरना हवा-ए-गुलशन की नर्म रो में ये किसी की आवाज़ आ रही है?
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'हम लड़के हैं' आज आप को सब सच-सच बताते हैं हम किस लिए इतना मुस्कुराते हैं हम को रोना भी आए तो कहाँ रो पाते हैं कोई देख न ले रोता हुआ ये सोच कर डर जाते हैं दर्द सहते हैं और अपने आसुओं को पी जाते हैं हम वो हैं जिन्हें अपने अश्क बहाने से रोका जाता है जिन्हें अपना दर्द सुनाने से रोका जाता है हम वो हैं जो ख़ुद ही ख़ुद का मज़ाक़ बनाते हैं और फिर एक दूजे से सच छिपाते हैं हम सब कुछ कर सकते हैं मगर कभी खुल कर रो नहीं सकते हमारा दर्द हमारे सिवा इस दुनिया में कहाँ कोई समझ पाता है सुख में खुल के हँसते हैं और दुख में झूठ-मूठ का मुस्कुराना आता है हम लड़के हैं साहब हमें बचपन से बस यही सिखाया गया है लड़के रोते नहीं हैं ये बोल-बोल कर पत्थर दिल बनाया गया है अपने मन की करने वाला इस समाज की नज़र में हर लड़का बुरा है अपने आसुओं को पी जाओ दोस्तों हम लड़के हैं हमें रोना मना है
ABhishek Parashar
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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'हमारी बे-वफ़ा हम सफ़र' बे-सबब प्यार करते हैं तुझ से हम ने ये भी जताया नहीं है कब से तू ने निकाला है दिल से तू ने अब तक बताया नहीं है अपने चेहरे से चिलमन हटा ले हम ने जी भर के देखा नहीं है प्यार होगा मुकम्मल ये कैसे साथ तू ने निभाया नहीं है हम तेरे हैं तेरे ही रहेंगे तू ने अपना ही समझा नहीं है हम तो मजनूँ हुए तेरी ख़ातिर तुझ को हम ने सताया नहीं है प्यार के तोहफ़े हम ने जो दी हैं तू ने उस को भी रक्खा नहीं है रंजिशों में ही छोड़ा है तू ने हम ने मातम मनाया नहीं है बे-वफ़ा तू है 'दानिश' के दिल में तेरे दिल में क्यूँ 'दानिश' नहीं है तेरी ख़ातिर ये जाँ भी है हाज़िर तुझ को जुमला सुनाया नहीं है
Danish Balliavi
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रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए देर तक आँखों में चुभती रही तारों की चमक देर तक ज़ेहन सुलगता रहा तन्हाई में अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुर्सिश के लिए तो न आई मगर उस रात की पहनाई में यूँँ अचानक तिरी आवाज़ कहीं से आई जैसे पर्बत का जिगर चीर के झरना फूटे या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे शहद सा घुल गया तल्ख़ाबा-ए-तन्हाई में रंग सा फैल गया दिल के सियह-ख़ाने में देर तक यूँँ तिरी मस्ताना सदाएँ गूँजीं जिस तरह फूल चटकने लगें वीराने में तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी फिर भी महसूस किया मैं ने कि तू आई है और नग़्मों में छुपा कर मिरे खोए हुए ख़्वाब मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूश वही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़र वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर तू मिरे पास न थी फिर भी सहर होने तक तेरा हर साँस मिरे जिस्म को छू कर गुज़रा क़तरा क़तरा तिरे दीदार की शबनम टपकी लम्हा लम्हा तिरी ख़ुश्बू से मोअत्तर गुज़रा अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-क़रार मैं तिरी राह न देखूँगा सियह रातों में ढूँढ़ लेंगी मिरी तरसी हुई नज़रें तुझ को नग़्मा ओ शे'र की उमडी हुई बरसातों में अब तिरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती तिरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जाएगी और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है गीत बन कर तिरे होंटों पे मचल जाएगी तेरे नग़्मात तिरे हुस्न की ठंडक ले कर मेरे तपते हुए माहौल में आ जाएँगे चंद घड़ियों के लिए हूँ कि हमेशा के लिए मिरी जागी हुई रातों को सुला जाएँगे
Sahir Ludhianvi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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फ़िरदौस बनाए हुए सावन के महीने इक गुल-रुख़ ओ नस्रीं-बदन ओ सर्व-ए-सही ने माथे पे इधर काकुल-ए-ज़ोलीदा की लहरें गर्दूं पे उधर अब्र-ए-ख़िरामाँ के सफ़ीने मेंह जितना बरसता था सर-ए-दामन-ए-कोहसार इतने ही ज़मीं अपनी उगलती थी दफ़ीने अल्लाह-रे ये फ़रमान कि इस मस्त हवा में हम मुँह से न बोलेंगे अगर पी न किसी ने वो मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार था जिस के लिए बरसों माँगी थीं दुआएँ मिरे आग़ोश-ए-तही ने गुल-रेज़ थे साहिल के लचकते हुए पौदे गुल-रंग थे तालाब के तर्शे हुए ज़ीने बारिश थी लगातार तो यूँँ गर्द थी मफ़क़ूद जिस तरह मय-ए-नाब से धुल जाते हैं सीने दम भर को भी थमती थीं अगर सर्द हवाएँ आते थे जवानी को पसीने पे पसीने भर दी थी चटानों में भी ग़ुंचों की सी नर्मी इक फ़ित्ना-ए-कौनैन की नाज़ुक-बदनी ने गेती से उबलते थे तमन्ना के सलीक़े गर्दूं से बरसते थे मोहब्बत के क़रीने क्या दिल की तमन्नाओं को मरबूत किया था सब्ज़े पे चमकती हुई सावन की झड़ी ने बदली थी फ़लक पर कि जुनूँ-ख़ेज़ जवानी बूँदें थीं ज़मीं पर कि अँगूठी के नगीने शाख़ों पे परिंदे थे झटकते हुए शहपर नहरों में बतें अपने उभारे हुए सीने इस फ़स्ल में इस दर्जा रहा बे-ख़ुद ओ सरशार मयख़ाने से बाहर मुझे देखा न किसी ने क्या लम्हा-ए-फ़ानी था कि मुड़ कर भी न देखा दी कितनी ही आवाज़ हयात-ए-अबदी ने
Josh Malihabadi
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छट गए जब आप ही ऊदी घटा छाई तो क्या तुर्बत-ए-पामाल के सब्ज़े पे लहर आई तो क्या जब ज़रूरत ही रही बाक़ी न लहन-ओ-रंग की कोयलें कूकीं तो क्या सावन की रुत आई तो क्या हिज्र के आलाम से जब छुट चुकी नब्ज़-ए-नशात अब हवा ने ख़ार-ओ-ख़स में रूह दौड़ाई तो क्या हो चुकी ज़ौक़-ए-तबस्सुम ही से जब बेगानगी अब चमन-अफ़रोज़ फूलों को हँसी आई तो क्या मुड़ चुकी जब मौत के जादे की जानिब ज़िंदगी अब किसी ने आफ़ियत की राह दिखलाई तो क्या हर नफ़स के साथ दिल से जब धुआँ उठने लगा बादलों से छन के अब ठंडी हवा आई तो क्या सामने जब आप के गेसू की लहरें ही नहीं बदलियों ने चर्ख़ पर अब ज़ुल्फ़ बिखराई तो क्या हो चुका पायाब जब बहर-ए-सर-ओ-बर्ग-ए-शबाब अब समुंदर की जवानी बाढ़ पर आई तो क्या ग़ुंचा-ए-अहद-ए-तरब ही मिल चुका अब ख़ाक में ख़ाक-ए-गुलशन अब गुल-ए-तर बन के इतराई तो क्या मिट चुके जब वालिहाना बाँकपन के वलवले आई अब दोशीज़ा-ए-मौसम को अँगड़ाई तो क्या खुल चुका जब परचम-ए-ग़म ज़िंदगी के क़स्र पर अब हवाओं ने कमर पौदों की लचकाई तो क्या आँसुओं में बह गईं जब ख़ून की जौलानियाँ जंगलों की छाँव में बरसात इठलाई तो क्या 'जोश' के पहलू में जब तुम ही मचल सकते नहीं फिर घटा के दामनों में बर्क़ लहराई तो क्या
Josh Malihabadi
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अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''
Josh Malihabadi
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अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं
Josh Malihabadi
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तू घर से निकल आए तो धरती को जगा दे तू बाग़ में जिस वक़्त लचकती हुई आए सावन की तरह झूम के पौदों को झुमाए जूड़े की गिरह खोल के बेला जो उठाए पर्बत पे बरसती हुई बरखा को नचा दे तू घर से निकल आए तो धरती को जगा दे आँखों को झुकाए हुए पल्लू को उठाए मुखड़े पे लिए सुब्ह के मचले हुए साए लेती हुई अँगड़ाई अगर घाट पे आए गंगा की हर इक लहर में इक धूम मचा दे तू घर से निकल आए तो धरती को जगा दे किरनों से गिरे ओस जो हो तेरा इशारा मिट्टी को निचोड़े तो बहे रंग का धारा ज़र्रे को जो रौंदे तो बने सुब्ह का तारा काँटे पे जो तू पाँव धरे फूल बना दे तू घर से निकल आए तो धरती को जगा दे
Josh Malihabadi
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