nazmKuch Alfaaz

छोटी सी बिल्लू छोटा सा बस्ता ठूँसा है जिस में काग़ज़ का दस्ता लकड़ी का घोड़ा रुई का भालू चूरन की शीशी आलू कचालू बिल्लू का बस्ता जिन की पिटारी जब इस को देखो पहले से भारी लट्टू भी इस में रस्सी भी इस में डंडा भी इस में गिल्ली भी इस में ऐ प्यारी बिल्लू ये तो बताओ क्या काम करने स्कूल जाओ उर्दू न जानो इंग्लिश न जानो कहती हो ख़ुद को बिल्क़ीस बानो उम्र की इतनी कच्ची नहीं हो छे साल की हो बच्ची नहीं हो बाहर निकालो लकड़ी का घोड़ा ये लट्टू रस्सी ये गिल्ली डंडा गुड़िया के जूते जंपर जुराबें बस्ते में रक्खो अपनी किताबें मुँह न बनाओ स्कूल जाओ ऐ प्यारी बिल्लू ऐ प्यारी बिल्लू

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता

Ibn E Insha

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शहर-ए-दिल की गलियों में शाम से भटकते हैं चाँद के तमन्नाई बे-क़रार सौदाई दिल-गुदाज़ तारीकी रूह-ओ-जाँ को डसती है रूह-ओ-जाँ में बस्ती है शहर-ए-दिल की गलियों में ताक शब की बेलों पर शबनमीं सरिश्कों की बे-क़रार लोगों ने बे-शुमार लोगों ने यादगार छोड़ी है इतनी बात थोड़ी है सद हज़ार बातें थीं हीला-ए-शकेबाई सूरतों की ज़ेबाई कामतों की रा'नाई इन सियाह रातों में एक भी न याद आई जा-ब-जा भटकते हैं किस की राह तकते हैं चाँद के तमन्नाई ये नगर कभी पहले इस क़दर न वीराँ था कहने वाले कहते हैं क़र्या-ए-निगाराँ था ख़ैर अपने जीने का ये भी एक सामाँ था आज दिल में वीरानी अब्र बन के घिर आई आज दिल को क्या कहिए बा-वफ़ा न हरजाई फिर भी लोग दीवाने आ गए हैं समझाने अपनी वहशत-ए-दिल के बुन लिए हैं अफ़्साने ख़ुश-ख़याल दुनिया ने गर्मियाँ तो जाती हैं वो रुतें भी आतीं हैं जब मलूल रातों में दोस्तों की बातों में जी न चैन पाएगा और ऊब जाएगा आहटों से गूँजेगी शहर-ए-दिल की पहनाई और चाँद रातों में चाँदनी के शैदाई हर बहाने निकलेंगे आज़माने निकलेंगे आरज़ू की गहराई ढूँडने को रुस्वाई सर्द सर्द रातों को ज़र्द चाँद बख़्शेगा बे-हिसाब तन्हाई बे-हिजाब तन्हाई शहर-ए-दिल की गलियों में

Ibn E Insha

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फैलता फैलता शाम-ए-ग़म का धुआँ इक उदासी का तनता हुआ साएबाँ ऊँचे ऊँचे मिनारों के सर पे रवाँ देख पहुँचा है आख़िर कहाँ से कहाँ झाँकता सूरत-ए-ख़ैल-ए-आवारगाँ ग़ुर्फ़ा ग़ुर्फ़ा बहर काख़-ओ-कू शहर में दफ़अ'तन सैल-ए-ज़ुल्मात को चीरता जल उठा दूर बस्ती का पहला दिया पंछियों ने भी पच्छिम का रस्ता लिया ख़ैर जाओ अज़ीज़ो मगर देखना एक जुगनू भी मिशअल सी ले के चला है उसे भी कोई जुस्तुजू शहर में? आसमाँ पर रवाँ सुरमई बादलो हाँ तुम्हीं क्या उड़ो और ऊँचे उड़ो बाग़-ए-आलम के ताज़ा शगुफ़्ता गुलू बे-नियाज़ाना महका करो ख़ुश रहो लेकिन इतना भी सोचा, कभी ज़ालिमो! हम भी हैं आशिक़-ए-रंग-ओ-बू शहर में कोई देखे ये मजबूरियाँ दूरियाँ एक ही शहर में हम कहाँ तुम कहाँ दोस्तों ने भी छोड़ी हैं दिल-दारियाँ आज वक़्फ़-ए-ग़म-ए-उल्फ़त-ए-राएगाँ हम जो फिरते हैं वहशत-ज़दा सरगिराँ थे कभी साहिब-ए-आबरू शहर में लोग तानों से क्या क्या जताते नहीं ऐसे राही तो मंज़िल को पाते नहीं जी से इक दूसरे को भुलाते नहीं सामने भी मगर आते जाते नहीं और जाएँ तो आँखें मिलाते नहीं हाए क्या क्या नहीं गुफ़्तुगू शहर में चाँद निकला है दाग़ों की मिशअल लिए दूर गिरजा के मीनारों की ओट से आ मिरी जान आ एक से दो भले आज फेरे करें कूचा-ए-यार के और है कौन दर्द-आश्ना बावरे! एक मैं शहर में, एक तू शहर में

Ibn E Insha

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कल हम ने सपना देखा है जो अपना हो नहीं सकता है उस शख़्स को अपना देखा है वो शख़्स कि जिस की ख़ातिर हम इस देस फिरें उस देस फिरें जोगी का बना कर भेस फिरें चाहत के निराले गीत लिखें जी मोहने वाले गीत लिखें धरती के महकते बाग़ों से कलियों की झोली भर लाएँ अंबर के सजीले मंडल से तारों की डोली भर लाएँ हाँ किस के लिए सब उस के लिए वो जिस के लब पर टेसू हैं वो जिस के नैनाँ आहू हैं जो ख़ार भी है और ख़ुश्बू भी जो दर्द भी है और दारू भी वो अल्हड़ सी वो चंचल सी वो शाइ'र सी वो पागल सी लोग आप-ही-आप समझ जाएँ हम नाम न उस का बतलाएँ ऐ देखने वालो तुम ने भी उस नार की पीत की आँचों में इस दिल का तीना देखा है? कल हम ने सपना देखा है

Ibn E Insha

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तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए वक़्त की बे-उनवान कहानी कब तक बे-उनवान रहे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी ऐ मिरे ख़ुल्द-ए-ख़याल की हूर इतने दिनों जो मैं घुलता रहा हूँ तेरे बिना यूँँही दूर ही दूर सोच तो क्या फल मुझ को मिला मैं मन से गया फिर तन से गया शहर-ए-वतन में अजनबी ठहरा आख़िर शहर-ए-वतन से गया रूह की प्यास बुझानी थी पर यहाँ होंटों की प्यास भी बुझ न सकी बचते सँभलते भी एक सुलगता रोग बनी मिरे जी की लगी दूर की बात न सोच अभी मिरे हात में तू ज़रा हात तो दे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए बाग़ में है इक बेले का तख़्ता भीनी है इस बेले की सुगंध ऐ कलियो क्यूँँ इतने दिनों तुम रक्खे रहीं इसे गोद में बंद कितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिए तुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सके सहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगे फिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी वक़्त की बातें रंग और बू हर कोई साथ किसी का ढूँडे गुल हों कि बेले मैं हूँ कि तू जो कुछ कहना है अभी कह ले जो कुछ सुनना है सुन ले तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन जूड़े के इन्हीं फूलों को देखो कल की सी इन में बास कहाँ एक इक तारा कर के डूबी माथे की तन्नाज़ अफ़्शाँ सहने का दुख सह न सके हम कहने की बातें कह न सके पास तिरे कभी आ न सके हम दूर भी तुझ से रह न सके किस से कहे अब रूह की बिपता किस को सुनाए मन की बात दूर की राह भटकता राही जीवन-रात घनेरी रात होंटों की प्यास बुझानी है अब तिरे जी को ये बात लगे न लगे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे? लिए नहीं अपने लिए

Ibn E Insha

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