फटते इरादे यक़ीन मुसीबत पाँव धुलाए चश्मा कि होंट शबीह-ए-लुआब मुयस्सर रात अनोखा सानेहा हो जाएगा मैले कँवल के फूल डुबोता लिपट लिपट कर चूमता पानी, पानी पानी नदामत से मग़्लूब ख़राबी: मद्द-ओ-जज़्र मौजूद तबीअत का तख़रीब तमाशा मुराजअत आँखों से ओझल छूती बहाती बे-तरतीब अज़ाब है हरी-भरी बेचारगी कैसे? अक्स-ए-शबाहत पंखुड़ियों का वो जो इरादे की तरकीब नहीं पा सकता लरज़ रहा है फूल तशद्दुद ख़ौफ़ में ग़र्क़-ए-हरारत डूबती उभरती पतियाँ केंचुली उतरे तो बात बने मैं कह दूँ? कर गुज़रूँ? आसाब तशन्नुज फैलती बे-रुख़ बातों की तरदीद-ए-क़यामत कर भी चुको ये हादसा दायरा सा ये सिमटता फैलता सरपट भागते क़दमों की लू पर जल-भुन राख हो शो'ला थिरकता रीढ़ की हड्डी से मग़्ज़ के हुक्म-ए-सलासिल चाटता दिन पाने की लग़्ज़िश कर ले कर ही ले मजबूरी आ लेती है चौ-गर्द की गर्दिश राख क़रीने की यकजाई तमसील-ए-ब-ज़ाहिर की ताईद में रखती है उँगलियाँ उँगलियाँ, बातें बातें, पसीना पसीना, बाक़ी बाक़ी और बेचारगी ताहम तो ये तयक़्क़ुन तर्क-ए-तग़ाफ़ुल ठहरे क़ौल क़यामत आने के जतन करे तक़रीब-ए-तमाशा ढूँडे छुपी रहे, तड़पाए, तड़पे
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"इंतिज़ार" एक उम्र गुज़ार चुके तो महसूस किया है जिसे उम्र भर चाहा वो मग़रूर हुआ है एक शख़्स का इंतिज़ार हर वक़्त किया है वो जा चुका है हमें अब यक़ीन हुआ है तिरे इंतिज़ार ने बालों को सफेद किया है हम समझते रहे ये धूल का किया है
ALI ZUHRI
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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'प्रेम लिखने लगा हूँ' सुनो मालूम है क्या तुम्हें? मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ लिखता हूँ पेशानी पर सुशोभित छोटी सी बिंदी काली गुलाबी लब औ' सुकुमार रुख़सारों की लाली तुम्हारे खुले हुए गेसू और उस में उलझी बाली। तो कभी लिखता हूँ नाज़ुक पाँव में बँधे नूपुरों की झंकार सुरमई अँखियों से बहते यादों में अश्क ज़ार-ज़ार मेरी ज़रा सी ग़लती पर आँखें तरेरना छोटी-छोटी बातों पर अबोध बालक के मानिंद रूठ कर मुँह फुलाना लिखता हूँ मनाने के लिए जबीं पर एक बोसा चाहना महफ़िल में नज़रों से नज़रें मिलाना शरमा के पलभर में पलकें गिराना शीतलता से ओतप्रोत निशा में गोद में सर रख के फ़लक को अपलक निहारना टूटते तारों से दु'आओं में हमें माँगना कभी शूल सी चुभती तुम्हारी ख़ामोशी तो कभी गर्मजोशी लिखता हूँ अदाएँ हैं तुम्हारी सब निराली मैं पतझड़ में हरियाली लिखता हूँ कभी तुम्हारी नादानी तो कभी समझदारी लिखता हूँ कभी आँखों का पानी कभी मुस्कान प्यारी लिखता हूँ कभी मिलन की शीतल छाँव तो कभी वियोग की धूप लिखता हूँ आज-कल मैं प्रेम का ज़रा ज़रा सा हर एक रूप लिखता हूँ कभी तुम्हें दूर तो कभी अपने पास लिखता हूँ तुम्हारे साथ बिताए हर एक लम्हें को मैं ख़ास लिखता हूँ तुम सेे और तुम्हारी सादगी से मैं बहुत कुछ सीखने लगा हूँ मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ, है ये ख़ूब-सूरत एहसास और आज-कल इसे जीने लगा हूँ
Sandeep dabral 'sendy'
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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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रौशन रौशन रौशन आँखें यूँँ मरकूज़ हुई हैं जैसे मैं ही मैं हूँ मुझ में ला-तादाद फ़साने और मआ'नी हैं मैं सद-हा असरार छुपाए फिरता हूँ मैं ख़ुश-क़िस्मत हूँ मेरे साथ जहान-ए-रंग-ओ-रानाई है और दरीचा-बंद निहाँ-ख़ानों से रूह-ए-यज़्दाँ की ख़ुश्बू उठती है मेरा सर ओ मशाम मोअत्तर करती है और मिरी तक़दीर जहाँ पर ख़ल्क़ हुई है जो अरमान किसी के दिल में है मैं उस की ख़ुश्बू हूँ वा-हसरत का अर्ज़ ओ समा में फैला नग़्मा जब महबूब तलक जा पहुँचे तो फिर मैं आवाज़ नहीं रहता हूँ और न शिरयानों का बहता ख़ून-ख़राबा बल्कि लफ़्ज़-ए-मुतलक़ बन जाता हूँ आँखें यूँँ मरकूज़ हुई हैं जैसे मैं ही मैं हूँ और नहीं है कोई सच्ची बात मगर है इतनी मैं मुरदार समुंदर हूँ एहसास ज़ियाँ का झोंका है आँखें बोल नहीं सकती हैं और बदन बीनाई से महरूम हुआ है लेकिन मैं तो अब तक ख़्वाब-ज़दा तस्वीरें देख रहा हूँ और समुंदर के पर्बत पर ठहरा जंगल बीते गीतों से पुर जंगल अज़ली ख़ामोशी के हाले में थर-थर काँप रहा है सदियाँ साए शोख़ फ़सीलें आमन्ना सद्दक़ना ऐ-लो! सूरज चाँद सितारे धरती के सीने पर उतरे मेरी राह-गुज़र पर बिखरे हल्की मद्धम और मुसलसल हरकत मंज़िल फूल कँवल का फूल अदम के बहर-ए-बे-पायाँ में तन्हा झूले बाहर पर मरकूज़ निगाहों से मख़्फ़ी लफ़्ज़-ए-मुतलक़ तन्हा और उदास कँवल पर झिलमिल झिलमिल फूट बहा मौहूम रिदा-ए-कोह-ओ-दश्त-ओ-दमन दुनिया-ए-मन-ओ-तू पर छाई फीकी फीकी हो कर फैल गई धूल बनी अपना गाँव, गोरी के पाँव तक धुँदलाए फैली रौशन और निराली धुँद, और धुँद और धुँद
Iftikhar Jalib
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मैं ख़िज़ाँ में गिरफ़्तार हूँ देखो ख़्वाबीदा मौजों ख़रीदार रूहों उमडते सिमटते ज़मानों से अर्ज़-ओ-समा की सियाही का दामन निचोड़ा है लेकिन हवाओं के वहम-ओ-गुमाँ में नहीं कौन सी ख़ाक से क़तरा-ए-आब ताबिंदा-मोती की आग़ोश लेता है ख़्वाहिश से बाहर न आऊँ मिरी इब्तिदा इंतिहा आज समुंदर की सिलवट में ताबिंदगी है समुंदर को पिघला बता मेरे सीने में किस किस की आवाज़ है खेत में बाग़बाँ मर चुका है ज़मीं ख़ूँ-चकाँ है सितारे नहीं हैं फ़क़त साएबाँ है
Iftikhar Jalib
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