हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'द फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'द कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'द थे बहुत बे-दर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के थीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'द दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'द उन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किए अन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द
Related Nazm
"शाइराना मिज़ाज" अबकि पास आए हो ख़ुश्बूओं के साए हो कल तलक तो मेरे थे आज तुम पराए हो उम्र भर की चाहत की रुख़्सती नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते सादगी से आओगे बे-रुखी से जाओगे मेरे पास आए हो किस का दिल दुखाओगे दिलजलों से जान-ए-जानाँ दिल-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार मुस्कुराए थे फूल मुँह बनाए थे मैं ने ख़्वाब बेंचा था मैं ने दिल उगाए थे मैं कि जैसे करता था आदमी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते बे-वफ़ाई आदत है बे-हयाई फ़ितरत है मेरे जैसे आशिक़ हैं आशिक़ी पे लानत है जानाँ मेरे जैसों से मुँह-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते हुस्न पे लिबादा है दर्द भी कुशादा है ज़ेहन का तो फिर भी ठीक दिल नहीं अमादा है यूँँ पराई रौशनी से रौशनी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार बोए जाएँगे ख़ाक अब उड़ाएँगे मैं ने तुम को चाहा था और अब भुलाएँगे तुम सेे बैर नहीं करते प्यार भी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते दिल से आगे जाना है पेट चुन के आना है हाथ जिस का थामा है उम्र भर निभाना है उम्र भर के साथी को यूँँ दुखी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते
Rakesh Mahadiuree
15 likes
"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
27 likes
मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
19 likes
''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
295 likes
"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
16 likes
More from Faiz Ahmad Faiz
हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे मंज़ूर ये तल्ख़ी ये सितम हम को गवारा दम है तो मुदावा-ए-अलम करते रहेंगे मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे
Faiz Ahmad Faiz
0 likes
"याद" दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हाथ यूँँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
Faiz Ahmad Faiz
3 likes
गुज़र रहे हैं शब ओ रोज़ तुम नहीं आतीं रियाज़-ए-ज़ीस्त है आज़ुरदा-ए-बहार अभी मिरे ख़याल की दुनिया है सोगवार अभी जो हसरतें तिरे ग़म की कफ़ील हैं प्यारी अभी तलक मिरी तन्हाइयों में बस्ती हैं तवील रातें अभी तक तवील हैं प्यारी उदास आँखें तिरी दीद को तरसती हैं बहार-ए-हुस्न पे पाबंदी-ए-जफ़ा कब तक ये आज़माइश-ए-सब्र-ए-गुरेज़-पा कब तक क़सम तुम्हारी बहुत ग़म उठा चुका हूँ मैं ग़लत था दावा-ए-सब्र-ओ-शकेब आ जाओ क़रार-ए-ख़ातिर-ए-बेताब थक गया हूँ मैं
Faiz Ahmad Faiz
0 likes
चलो फिर से मुस्कुराएँ चलो फिर से दिल जलाएँ जो गुज़र गई हैं रातें उन्हें फिर जगा के लाएँ जो बिसर गई हैं बातें उन्हें याद में बुलाएँ चलो फिर से दिल लगाएँ चलो फिर से मुस्कुराएँ किसी शह-नशीं पे झलकी वो धनक किसी क़बा की किसी रग में कसमसाई वो कसक किसी अदा की कोई हर्फ़-ए-बे-मुरव्वत किसी कुंज-ए-लब से फूटा वो छनक के शीशा-ए-दिल तह-ए-बाम फिर से टूटा ये मिलन की ना मिलन की ये लगन की और जलन की जो सही हैं वारदातें जो गुज़र गई हैं रातें जो बिसर गई हैं बातें कोई उन की धुन बनाएँ कोई उन का गीत गाएँ चलो फिर से मुस्कुराएँ चलो फिर से दिल जलाएँ
Faiz Ahmad Faiz
0 likes
आज के नाम और आज के ग़म के नाम आज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा ज़र्द पत्तों का बन ज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस है दर्द की अंजुमन जो मिरा देस है क्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नाम किर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम पोस्ट-मैनों के नाम ताँगे वालों का नाम रेल-बानों के नाम कार-ख़ानों के भूके जियालों के नाम बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़ दहक़ाँ के नाम जिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए जिस की बेटी को डाकू उठा ले गए हाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है दूसरी मालिए के बहाने से सरकार ने काट ली है जिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तले धज्जियाँ हो गई है उन दुखी माँओं के नाम रात में जिन के बच्चे बिलकते हैं और नींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहीं दुख बताते नहीं मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं उन हसीनाओं के नाम जिन की आँखों के गुल चिलमनों और दरीचों की बेलों पे बे-कार खिल खिल के मुरझा गए हैं उन बियाहताओं के नाम जिन के बदन बे मोहब्बत रिया-कार सेजों पे सज सज के उक्ता गए हैं बेवाओं के नाम कटड़ियों और गलियों मोहल्लों के नाम जिन की नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों को आ आ के करता है अक्सर वज़ू जिन के सायों में करती है आह-ओ-बुका आँचलों की हिना चूड़ियों की खनक काकुलों की महक आरज़ू-मंद सीनों की अपने पसीने में जुल्ने की बू पढ़ने वालों के नाम वो जो असहाब-ए-तब्ल-ओ-अलम के दरों पर किताब और क़लम का तक़ाज़ा लिए हाथ फैलाए वो मासूम जो भोले-पन में वहाँ अपने नन्हे चराग़ों में लौ की लगन ले के पहुँचे जहाँ बट रहे थे घटा-टोप बे-अंत रातों के साए उन असीरों के नाम जिन के सीनों में फ़र्दा के शब-ताब गौहर जेल-ख़ानों की शोरीदा रातों की सरसर में जल जल के अंजुम-नुमा होगए हैं आने वाले दिनों के सफ़ीरों के नाम वो जो ख़ुश्बू-ए-गुल की तरह अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा होगए हैं
Faiz Ahmad Faiz
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Faiz Ahmad Faiz.
Similar Moods
More moods that pair well with Faiz Ahmad Faiz's nazm.







