दिल बहुत दुखता है हर बात पे दिल दुखता है सुब्ह-ए-नौ-ख़ेज़ पे सूरज की जहाँबानी पे शाम-ए-दिल-दोज़ पे अंजाम-ए-गुल-अंदामी पे अक्स-ए-मौजूद पे अनवार-ए-रुख़-ए-ज़ेबा पे नक़्श-ए-मौहूम पे अखफ़-ए-दिल-ए-फ़र्दा पे बस्त-ए-अफ़्लाक पे अफ़साना-ए-रानाई पे शरह۔ए-नैरंगी-ए-हस्ती-ओ-ज़ुलेख़ाई पे रात के सोज़ पे शामों के महक जाने पे हिद्दत-ए-शौक़ में कलियों के चटख़ जाने पे मुज़्महिल तारों पे सह में हुए ऐवानों पे क़हवा-ख़ानों में जम्अ' शहर के दीवानों पे रिंद-ए-मख़मूर-ओ-बला-नोश पे परवानों में शम-ए-कुश्ता पे उजड़े हुए इंसानों पे आरज़ूओं की सुबुक-सारी पे अर्ज़ानी पे दिल शफ़क़ रंग पे जज़्बों की फ़रावानी पे हुस्न-ए-ख़ुद-आरा-ओ-ख़ुद-बीं की दिल-आराई पे इश्क़-ए-मख़मूर की जाँ-सोज़ी-ओ-तन्हाई पे पहलू-ए-दिल से कहीं लग के कोई रोता है दस्त-ए-क़ातिल पे कहीं अश्क कहीं धब्बे हैं दिल मसलता है कोई हाथ में ले कर हर दम दिल बहुत दुखता है हर बात पे दिल दुखता है
Related Nazm
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
160 likes
मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
107 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
54 likes
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
More from Ekram Khawar
मेरी शोरिश जुदा आँखों ने मुझ से यूँँ कहा कल शब ये धीमी आँच का जलना तुझे दीवाना कर देगा मैं क्या करता कहाँ जाता कि हाइल था मिरे सीने में इक महबूस सन्नाटा तअ'य्युन कौन करता हम कहाँ पर ख़ेमा-ज़न हैं मुसल्लत है सरों पर कौन सा मनहूस साया और ऐसे में तलातुम रोज़-ओ-शब तेरी लगन का जान लेवा है बड़े ही जाँ-गुसिल हैं तेरी चाहत के सनम-ख़ाने मोहब्बत ख़ून-ए-दिल क्यूँ है तमन्ना सोज़-ए-जाँ क्यूँ है रफ़ीक़ान-ए-सफ़र इतना बताना आरज़ू एक अलमिया क्यूँ है
Ekram Khawar
0 likes
शर्क़ से ग़र्ब तक अर्श से फ़र्श तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ मेरी बेकल जबीं के तिलिस्मात से तेरी बेचैन बाँहों के इल्हाम तक तिश्ना होंटों से हलचल भरे जाम तक उन की आँखों के रौशन दियों से मिरी अर्ग़वानी घनी शाम तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ कहकशाँ बुझ गई रास्ते में कहीं रंग-ए-नूर-ए-सहर लुट गया आसमानों में उलझा हुआ मै-कदा नूर का दिलबरान-ए-हरम थक के गुमनाम रस्तों में गुम हो गए रंग-ए-महताब कुम्हला गया मह-रुख़ाँ चश्म-ए-आहू सिफ़त मस्त मदमाती शामों में हसरत की दहलीज़ पर आह भरते रहे और सबा रात भर ज़र्द महताब की आँच में ख़ाक बर-सर भटकती रही या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ हल्का-ए-आशिक़ाँ से लब-ए-बाम तक दस्त-ए-साक़ी से दुर्द-ए-तह-ए-जाम तक दीद-ए-बीना से बिस्मिल के अंजाम तक मा'बदों की ख़मोशी से हंगामा-ए-मजमा'-ए-आम तक शहर-ए-अफ़्सोस की तीरा-ओ-तार गलियों से रौशन दमकती हुई शारा-ए-आम तक याँ कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ रब्ब-ए-मा'बूद गुम आसमानों में है गुंग-ओ-ख़ामोश है बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा नाएब-अल्लाह-फ़िल-अर्ज़ कौन-ओ-मकाँ इश्क़ का माजरा हुस्न का माजरा दर्द का माजरा या ख़ुदा या ख़ुदा कुछ सबील-ए-जज़ा दिल धड़कने को कोई बहाना ख़ुदा
Ekram Khawar
0 likes
बीसवीं सदी के आख़िरी बरसों में एक गहराती हुई शाम को जब परिंदों और पत्तों का रंग सियाह हो चुका था और दुख का रंग हर रंग पर ग़ालिब था माँ टूट चुकी थी महबूबा रूठ चुकी थी हफ़्ता-वार तातील की फ़राग़त से मुतमइन सरशारी के एक लम्हे को बे-क़रार शाइ'र लिखने बैठा गिर्द-ओ-पेश की दुनिया निहायत आहिस्तगी से ख़फ़ीफ़ पर्दों से छनती हुई ग़ाएब हो गई और पूरी काएनात महदूद हो कर मेज़ के रक़्बे में सिमट आई शाइ'र ना-मालूम कितने ज़मानों तक महबूत बैठा फ़ज़ा की सरगोशियाँ सुनता रहा साएँ साएँ करती ख़ामोशी में मो'तबर अल्फ़ाज़ की तलाश-ओ-जुस्तुजू में ग़लताँ-व-पेचाँ कि यक लख़्त रात की शह-रग से कई ख़ून के फ़व्वारे छूटे और सिसकती सीढ़ियों चीख़ते दरवाज़ों के आहंग पे मेज़ पर पड़ी काँच से झाँकती मार्क्स की तस्वीरों पर इक-तारा बजाते हुए नेपाली बच्चे की तस्वीर और पाश की नज़्मों पर मूसला-धार आँसुओं की बारिश होने लगी और बाहर रात की तारीकी में कुत्ते भौंकने लगे नसीबों जली बाँकी तिलँगन रात जारी थी
Ekram Khawar
0 likes
चाहे जिस तौर बयाँ कीजिए अफ़साना-ए-दर्द जिस्म को ख़ौफ़ बहुत जान को अंदेशे थे चाहे जिस तौर रक़म कीजे गिराँ-जानी-ए-दिल ख़ूँ में हंगामा बहुत राह में वीराने थे लाख चाहा दिल-ए-मुज़्तर की कशाकश से सिवा रक़्स-ए-बे-परवा-ओ-बेबाक का आग़ाज़ करूँँ ख़ून-ए-दिल अश्क करूँँ अश्क गुहर-ताब करूँँ पस-ए-दीवार-ए-क़फ़स सीना-ए-दिल चाक करूँँ लाख चाहा दिल-ए-शोरीदा पे मश्कें थी बहुत लब-ए-मुश्ताक़ पे बूटों की ज़बाँ रक्खी थी जान घबराती थी अंदोह से तन में क्या क्या जान घबराती है अंदोह से तन में क्या क्या
Ekram Khawar
0 likes
दिल-ए-वहशी जुनूँ की कौन सी मंज़िल थी कल शब जहाँ बाहम हुए क़ज़्ज़ाक़-दिलबर चले ख़ंजर गले पर आस्तीं पर दिल-ओ-दामन पे दस्तार-ओ-जबीं पर अजब एक शोर था महशर बपा था बहुत आह-ओ-फ़ुग़ाँ अंदोह जानी हज़ारों ज़ख़्म और एक सख़्त जानी न जाने शिद्दत-ए-यलग़ार क्या थी नहीं मा'लूम क्या मुद्दत रही किश्त-ए-निगाराँ की खुली जब आँख तो एक टूटते नशे का आलम था शफ़क़-गूँ था उफ़ुक़ दिल का चमन का रास्ता धब्बों से पुर था और सबा दामन में अपने ख़ून की बू बास रखती थी नज़ारा दीदनी था और दिल-ए-बेताब ने देखा लहू से लाल है सेहन-ए-चमन और हर तरफ़ बद-रंग ख़ूँ की लाला-कारी है नगीना दिल का सौ टुकड़े पड़ा है और हर टुकड़े में कोई अक्स-ए-वहशी है दिल-ओ-दिलबर की आशुफ़्ता-सरी है दिल-ओ-दिलबर की राहों में फ़क़त शीशे की किर्चें हैं
Ekram Khawar
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ekram Khawar.
Similar Moods
More moods that pair well with Ekram Khawar's nazm.







