nazmKuch Alfaaz

जान मुझे अफ़्सोस है तुम से मिलने शायद इस हफ़्ते भी न आ सकूँगा बड़ी अहम मजबूरी है जान तुम्हारी मजबूरी को अब तो मैं भी समझने लगी हूँ शायद इस हफ़्ते भी तुम्हारे चीफ़ की बीवी तन्हा होगी

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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अंदेशों के दरवाज़ों पर कोई निशान लगाता है और रातों रात तमाम घरों पर वही सियाही फिर जाती है दुख का शब ख़ूँ रोज़ अधूरा रह जाता है और शनाख़्त का लम्हा बीतता जाता है मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत तारीकी की चादर ओढ़े रौशनी की आहट पर कान लगाए कब से बैठे हैं घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं हद-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाज़ों के रेशम से अपनी रू-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं अँगुश्ता ने इक इक कर के छलनी होने को आए अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है सुब्ह से पहले वो कटने से बच जाए तो!

Parveen Shakir

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सो अब ये शर्त-ए-हयात ठहरी कि शहर के सब नजीब अफ़राद अपने अपने लहू की हुरमत से मुन्हरिफ़ हो के जीना सीखें वो सब अक़ीदे कि इन घरानों में उन की आँखों के रंगतों की तरह तसलसुल से चल रहे थे सुना है बातिल क़रार पाए वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी बदन की वाबस्तगी का क्या ज़िक्र रूह के अहद-ना में तक फ़स्ख़ माने जाएँ ख़मोशी-ओ-मस्लहत-पसंदी में ख़ैरियत है मगर मिरे शहर-ए-मुन्हरिफ़ में अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है सो हाकिम-ए-शहर जब भी अपने ग़ुलाम-ज़ादे उन्हें गिरफ़्तार करने भेजे तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना कि आज से जब हज़ार-हा साल बा'द हम भी किसी ज़माने के टेक्सलाया हड़प्पा बन कर तलाशे जाएँ तो उस ज़माने के लोग हम को कहीं बहुत कम-नसब न जानें

Parveen Shakir

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पैरों की मेहँदी मैं ने किस मुश्किल से छुड़ाई थी और फिर बैरन ख़ुश्बू की कैसी-कैसी विनती की थी प्यारी धीरे-धीरे बोल सावन, भरा घर जाग उठेगा लेकिन जब उस के आने की घड़ी हुई सुब्ह से ऐसी झड़ी लगी उम्र में पहली बार मुझे बारिश अच्छी नहीं लगी बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की उसे बुला जिस की चाहत में तेरा तन-मन भीगा है प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी और जब उस बारिश के बा'द हिज्र की पहली धूप खुलेगी तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे

Parveen Shakir

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वही नर्म लहजा जो इतना मुलाएम है जैसे धनक गीत बन के समाअ'त को छूने लगी हो शफ़क़ नर्म कोमल सुरों में कोई प्यार की बात कहने चली हो किस क़दर रंग-ओ-आहंग का किस क़दर ख़ूब-सूरत सफ़र वही नर्म लहजा कभी अपने मख़्सूस अंदाज़ में मुझ से बातें करेगा तो ऐसा लगे जैसे रेशम के झूले पे कोई मधुर गीत हलकोरे लेने लगा हो वही नर्म लहजा किसी शोख़ लम्हे में उस की हँसी बन के बिखरे तो ऐसा लगे जैसे क़ौस-ए-क़ुज़ह ने कहीं पास ही अपनी पाज़ेब छनकाई है हँसी को वो रिम-झिम कि जैसे फ़ज़ा में बनफ़्शी चमकदार बूंदों के घुँघरू छनकने लगे हों कि फिर उस की आवाज़ का लम्स पा के हवाओं के हाथों में अन-देखे कंगन खनकने लगे हों वही नर्म लहजा मुझे छेड़ने पर जब आए तो ऐसा लगेगा जैसे सावन की चंचल हवा सब्ज़ पत्तों के झाँझन पहन सुर्ख़ फूलों की पायल बजाती हुई मेरे रुख़्सार को गाहे गाहे शरारे से छूने लगे मैं जो देखूँ पलट के तो वो भाग जाए मगर दूर पेड़ों में छुप कर हँसे और फिर नन्हे बच्चों की मानिंद ख़ुश हो के ताली बजाने लगे वही नर्म लहजा कि जिस ने मिरे ज़ख़्म-ए-जाँ पे हमेशा शगुफ़्ता गुलाबों की शबनम रखी है बहारों के पहले परिंदे की मानिंद है जो सदा आने वाले नए सुख के मौसम का क़ासिद बना है उसी नर्म लहजे ने फिर मुझ को आवाज़ दी है

Parveen Shakir

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अभी मैं ने दहलीज़ पर पाँव रक्खा ही था कि किसी ने मिरे सर पे फूलों भरा थाल उल्टा दिया मेरे बालों पे आँखों पे पलकों पे, होंटों पे माथे पे, रुख़्सार पर फूल ही फूल थे दो बहुत मुस्कुराते हुए होंट मेरे बदन पर मोहब्बत की गुलनार मोहरों को यूँँ सब्त करते चले जा रहे थे कि जैसे अबद तक मिरी एक इक पोर का इंतिसाब अपनी ज़ेबाई के नाम ले कर रहेंगे मुझे अपने अंदर समो कर रहेंगे!

Parveen Shakir

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