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"फ़न पारा" ये किताबों की सफ़-ब-सफ़ जिल्दें काग़ज़ों का फ़ुज़ूल इस्ती'माल रौशनाई का शानदार इसराफ़ सीधे सीधे से कुछ सियह धब्बे जिन की तौजीह आज तक न हुई चंद ख़ुश-ज़ौक़ कम-नसीबों ने बसर औक़ात के लिए शायद ये लकीरें बिखेर डाली हैं कितनी ही बे-क़ुसूर नस्लों ने इन को पढ़ने के जुर्म में ता-उम्र ले के कश्कूल-ए-इल्म-ओ-हिक्मत-ओ-फ़न कू-ब-कू जाँ की भीक माँगी है आह ये वक़्त का अज़ाब-ए-अलीम वक़्त ख़ल्लाक़ बे-शुऊर क़दीम सारी ता'रीफ़ें उन अँधेरों की जिन में परतव न कोई परछाईं आह ये ज़िंदगी की तन्हाई सोचना और सोचते रहना चंद मासूम पागलों की सज़ा आज मैं ने भी सोच रक्खा है वक़्त से इंतिक़ाम लेने को यूँँही ता-शाम सादे काग़ज़ पर टेढ़े टेढ़े ख़ुतूत खींचे जाएँ

Jaun Elia3 Likes

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"कहाँ हूँ मैं" ख़ुद को जो देखा आईनों में तो जाना ना जाने कहा खो गया हूँ मैं ख़ुद में मैं ने तुझ को को तो देखा पर ख़ुद ही कहीं गुम हो गया हूँ मैं सुन ना चल मिल कर ढूँढ़ते हैं मुझ को तेरी उन्हीं गलियों में जिन से अब तक आशना हूँ मैं तेरी ही आँखों से तो देखता था मैं ख़ुद को तेरे बिना तो जैसे नाबिना हूँ मैं क़तरा क़तरा जुटा कर तू ने बनाया था मुझ को अब तू नहीं तो जैसे फ़ना हूँ मैं एक गुज़ारिश है ज़रा मान भी लेना बस इतना सा बता दे कहाँ हूँ मैं कहाँ हूँ मैं कहाँ हूँ मैं

Mohammad Talib Ansari

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अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है मैं कोशिशें हज़ार करता हूँ मगर रूह है कि सिहर जाती है नज़र है कि ठहर जाती है ; सिग्नल पे खड़े उस नंगे बच्चे पे जो कार के शीशे पार से बेच रहा है आज़ादी । तेरे ख़यालों में डूबकर एक ग़ज़ल बुननी थी मुहब्बत में पड़ कर आशिक़ की राह चुननी थी मगर ज़ेहन की छत है कि टपक रही है टीस की धूरी लपक रही है और बन रहीं हैं तस्वीरें बेहिसाब। हैं तस्वीरें, बेवा औरत के ज़र्द चेहरे की यतीम बूढ़ी आँख में कोहरे की रोज़मर्रा के फंदे में, फँसते जीवन के मोहरे की । एक नौवीं की लड़की जो भटक रही है एक औरत जो कोठे पे तड़प रही है चूल्हे और बिस्तर के बीच में बीवी धीरे धीरे सदियों से सरक रही है । और भी कोफ़्त टटोलती तस्वीरें हैं यहाँ मैं हुस्न-ओ-इश्क़ लिखूँ तो कैसे, कि हस्पताल में घाव लिए मरीज़ों की कमी नहीं है यहाँ शहीदों की मौत पे आँखों में नमी नहीं है बस किसानों तक जो कभी पहुँची नहीं, वो तरक्की काग़ज़ों में थमी नहीं है । कूड़ेदान में कपड़े-जूते और पुराने सेलफ़ोन के नीचे हथेली भर की बच्ची की ठंडी लाश छुपी है । एक परियों की रानी सच्चे प्यार की ख़ातिर अपनी इज़्ज़त और यक़ीं, धोखे में गँवा चुकी है । दिल सुलग जाता है, मन बिखर जाता है देख कर, कि 'वीमन एम्पावर मेंट' वाले शहर के भीतर बड़े फ्लाईओवर और भीड़ की नज़रों से होकर लक्ष्मी तेज़ाब से अब भी झुलस रही है । सरकारी फ़ाइलों में खोई वो चप्पल सालों से अब तक घिसट रही है । और भी शय हैं दुनिया में मौजूद ; मेरा दोस्त जो कैंसर से घुट घुट के लड़ता है एक बाप घर खर्च की ख़ातिर ख़ुद से झगड़ता है घर के पड़ोस में कल ही 'लिनचिंग' हुई है ख़बरें कहती हैं सब क़ाबू है, कैसी 'चीटिंग' हुई है। हीर-रांझा के हिज्र का दर्द यक़ीनन है भारी जिस में तिनके भर का भी मुझ को भरम नहीं है मगर, फुटपाथ पे सिकुड़ते पेट की भूख के आगे जिस का जवान बेटा मरा हो, उस माँ की हूक के आगे, उस महबूब की जुदाई की कचोट कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं है । और इन सब के बीच में मुहब्बत की बातें ग़ुलाब ओढ़े सवेरे, लिली फ्लावर की रातें हाँ, मगर बात ये भी सही है, कि तेरी हुस्न-ओ-अदास कभी दिल नहीं भरता तेरी याद के दरिया में डूबा, मन नहीं उबरता मगर ज़माने में और भी दर्द बचे हैं हर चुप्पी के पीछे अफ़साने दबे हैं क़लम झुक जाती है मेरी उन बेज़ुबानों की जानिब जिन के गूंगे फ़साने किसी से सुने नहीं हैं मगर, ऐ हुस्न-ए-जानां धुएं में आग न उकेरना तुम मेरी बेरया मुहब्बत से कभी मुँह न फेरना ऐसा नहीं है कि मुझे प्यार हासिल नहीं है ऐसा भी नहीं कि दिल दोस्ती मुमकिन नहीं है मगर, अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है मगर, अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है।

Prashant Beybaar

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"क़ातिल" सुना है तुम ने अपने आख़िरी लम्हों में समझा था कि तुम मेरी हिफ़ाज़त में हो मेरे बाज़ुओं में हो सुना है बुझते बुझते भी तुम्हारे सर्द ओ मुर्दा लब से एक शो'ला शोला-ए-याक़ूत-फ़ाम ओ रंग ओ उम्मीद-ए-फ़रोग़-ए-ज़िंदगी-आहंग लपका था हमें ख़ुद में छुपा लीजे ये मेरा वो अज़ाब-ए-जाँ है जो मुझ को मिरे अपने ख़ुद अपने ही जहन्नम में जलाता है तुम्हारा सीना-ए-सीमीं तुम्हारे बाज़ूवान-ए-मर-मरीं मेरे लिए मुझ इक हवसनाक-ए-फ़रोमाया की ख़ातिर साज़ ओ सामान-ए-नशात ओ नश्शा-ए-इशरत-फ़ुज़ूनी थे मिरे अय्याश लम्हों की फ़ुसूँ-गर पुर-जुनूनी के लिए सद-लज़्ज़त आगीं सद-करिश्मा पुर-ज़बानी थे तुम्हें मेरी हवस-पेशा मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बे-वफ़ाई का गुमाँ तक इस गुमाँ का एक वहम-ए-ख़ुद गुरेज़ाँ तक नहीं था क्यूँँ नहीं था क्यूँँ नहीं था क्यूँँ कोई होता कोई तो होता जो मुझ से मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बे-वफ़ाई की सज़ा में ख़ून थुकवाता मुझे हर लम्हे की सूली पे लटकाता मगर फ़रियाद कोई भी नहीं कोई दरेग़ उफ़्ताद कोई भी मुझे मफ़रूर होना चाहिए था और मैं सफ़्फ़ाक-क़ातिल बे-वफ़ा ख़ूँ-रेज़-तर मैं शहर में ख़ुद-वारदाती शहर में ख़ुद-मस्त आज़ादाना फिरता हूँ निगार-ए-ख़ाक-आसूदा बहार-ए-ख़ाक-आसूदा

Jaun Elia

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"बस एक अंदाज़ा" बरस गुज़रे तुम्हें सोए हुए उठ जाओ सुनती हो अब उठ जाओ मैं आया हूँ मैं अंदाज़े से समझा हूँ यहाँ सोई हुई हो तुम यहाँ रू-ए-ज़मीं के इस मक़ाम-ए-आसमानी-तर की हद में बाद-हा-ए-तुंद ने मेरे लिए बस एक अंदाज़ा ही छोड़ा है!

Jaun Elia

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"हमेशा क़त्ल हो जाता हूँ मैं" बिसात-ए-ज़िंदगी तो हर घड़ी बिछती है उठती है यहाँ पर जितने ख़ाने जितने घर हैं सारे ख़ुशियाँ और ग़म इनआ'म करते हैं यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं कभी महसूर होते हैं कभी आगे निकलते हैं यहाँ पर शह भी पड़ती है यहाँ पर मात होती है कभी इक चाल टलती है कभी बाज़ी पलटती है यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं मगर मैं वो पियादा हूँ जो हर घर में कभी इस शह से पहले और कभी उस मात से पहले कभी इक बुर्द से पहले कभी आफ़ात से पहले हमेशा क़त्ल हो जाता है

Jaun Elia

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"नाकारा" कौन आया है कोई नहीं आया है पागल तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है अच्छा यूँँ है बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने तेज़-रवी की राह-गुज़र से मेहनत-कोश और काम के दिन की धूल आई है धूप आई है जाने ये किस ध्यान में था मैं आता तो अच्छा कौन आता किस को आना था कौन आता

Jaun Elia

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"रातें सच्ची हैं दिन झूटे हैं" चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा उन की लज़्ज़त और अज़िय्यत से मैं अपना कोई अहद नहीं तोडूँगा तेज़ नज़र ना-बीनाओं की आबादी में क्या मैं अपने ध्यान की ये पूँजी भी गिनवा दूँ हाँ मेरे ख़्वाबों को तुम्हारी सुब्हों की सर्द और साया-गूँ ताबीरों से नफ़रत है इन सुब्हों ने शाम के हाथों अब तक जितने सूरज बेचे वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें ऐसी यख़-बस्ता ताबीरों के हर दिन से अच्छी हैं और सच्ची भी हैं जिस में धुँदला चक्कर खाता चमकीला-पन छे अतराफ़ का रोग बना है मेरे अंधेरे भी सच्चे हैं और तुम्हारे ''रोग उजाले'' भी झूटे हैं रातें सच्ची हैं दिन झूटे जब तक दिन झूटे हैं जब तक रातें सहना और अपने ख़्वाबों में रहना ख़्वाबों को बहकाने वाले दिन के उजालों से अच्छा है हाँ मैं बहकावों की धुँद नहीं ओढूँगा चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो मैं फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा अपना अहद नहीं तोडूँगा यही तो बस मेरा सब कुछ है माह ओ साल के ग़ारत-गर से मेरी ठनी है मेरी जान पर आन बनी है चाहे कुछ हो मेरे आख़िरी साँस तलक अब चाहे कुछ हो

Jaun Elia

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