हम से ही फूलों की फबन है हम से ही शादाब चमन है जोश-ओ-ख़रोश-ए-गंग-ओ-जमन है शान-ए-वतन है हुस्न-ए-वतन है हम क्या हैं तक़दीर-ए-वतन हैं मसरूफ़-ए-ता'मीर-ए-वतन हैं अज़मत-ए-माज़ी रिफ़अत-ए-फ़र्दा रौनक़-ए-महफ़िल ज़ीनत-ए-दुनिया शाम का मंज़र सुब्ह का जल्वा गुलशन गुलशन सहरा सहरा गुल ये खिले हैं फ़िक्र-ओ-नज़र के सींचा है हम ने ख़ून-ए-जिगर से मस्जिद मंदिर दैर कलीसा ताज महल एलोरा अजंता जंतर-मंतर क़ुत्ब मिनारा कभी अँधेरा कभी उजाला हम से ही तारीख़-ए-वतन है बाक़ी हर इक नक़्श-ए-कुहन है जोश-ए-अमल है दिल में हमारे सर्द फ़ज़ा में हम हैं शरारे तोड़ के लाएँ चर्ख़ से तारे रोकें तूफ़ाँ मोड़ दें धारे हो हो कर बलवान बढ़ेंगे जग में हम परवान चढ़ेंगे सख़्त मराहिल राह में आएँ लाख हवादिस आँख दिखाएँ हाइल अगर हों तुंद हवाएँ वो भी हम से मुँह की खाएँ आँधी बन कर तेज़ चलेंगे और मंज़िल पर जा के रहेंगे
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“अभी न जाओ छोड़ कर” अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं नज़र अभी लड़ी नहीं नशा अभी चढ़ा नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं अभी तो दिन ढ़ला है ये अभी तो रात आई है अज़ल के बा'द आज फिर फ़ज़ा ये मुस्कुराई है फ़ज़ा को मुस्कुराने दो ये दिल बहक भी जाने दो कि अब न रोको ख़ुद को तुम ये दूरियाँ मिटा दो तुम हवाओं में ये दिल उड़े कि प्यार के चमन खिलें ये रात भी दिवानी है फ़ज़ा भी ये सुहानी है कि बाहों में मुझे भरो यूँँ जाने की न ज़िद करो अभी तो देखो चाँद भी चकोर से मिला नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं ज़रा ठहर भी जाओ साथ बैठ लो कुछ और पल कि थाम लूँ ये वक़्त मैं कि लिख दूँ फिर कोई ग़ज़ल तुम्हें बताऊँ आज जो कभी न तुम सेे कह सका तुम्हें दिखाऊँ अश्क जो तुम्हारे बिन न बह सका हसीन हो गई हो तुम जवान हो गया हूँ मैं बहार बन गई हो तुम मसान बन गया हूँ मैं कि कर दो अब हरा मुझे ग़मों से अब रिहा मुझे तरस ज़रा तो खाओ तुम मैं इतना भी बुरा नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं
Rehaan
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"माँ" घर में माँ हो तो घर घर लगता है बिन माँ के जीना दूभर लगता है माँ का आँचल मीठी छाँव शजर की जो न हो तो जीवन बंजर लगता है तेरे होते फूलों का आंगन था और अब पाँव में पत्थर लगता है जब तू थी तो सारा जग अपना था पर अब इन अपनो से डर लगता है
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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एक साल ओ मेरे दिल के टुकड़े मेरी बहना मेरी बेटी मेरे बच्चे आज एक साल हो गया तुम्हें बाशिंदा ए अदम-आबाद हुए मेरी छोटी-सी दुनिया को बर्बाद हुए जैसे ये ख़ुशबू धूप अब्र-ओ-बाद हुए तुम्हें आज़ाद हुए मुझे शब-ज़ाद हुए तुम सेे कोई विवाद हुए मुझे ना-मुराद हुए इस दिल को ना शाद हुए तुम्हें महज़ एक याद हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुक़द्दर को बिगड़े हुए मुझे तुम सेे बिछड़े हुए इस घर को उजड़े हुए इस दिल के टुकड़े हुए बैठा रहता हूँ मैं तेरी तस्वीर को पकड़े हुए बैठी है तेरी याद दिल में दिल को जकड़े हुए तेरे मेरे झगड़े हुए और मुझे तुझ पे अकड़े हुए अभागे बाप के मुखड़े से एक आँख को लिकड़े हुए अभागे भाई के कांधे से एक बाज़ू को उखड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया ख़ुशियों को घर छोड़े हुए ख़ुदा को मुक़द्दर फोड़े हुए घर की तरफ़ सैलाब को मोड़े हुए मेरी नींद को छीने ख़्वाब को तोड़े हुए डाॅक्टर के पैरो में लौटे हुए हाथों को जोड़े हुए तुझ को ये दुनिया छोड़े हुए मुझे दुनिया से सब नाते तोड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया घर में उदासी को छाए हुए इन होंटों पर हॅंसी को आए हुए पिताजी को क़िस्से सुनाए हुए बगिया में फूलों को आए हुए ऑंगन में सन्नाटा छाए हुए पीठ पर तेरा चाटा खाए हुए मुझ को गाना गाए हुए जी से कोई खाना खाए हुए दिल को पत्थर करे हुए याद में तेरी आँसू बहाए हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुझे कुछ लिखे हुए तुझे कहीं दिखे हुए मुझे चैन से सोए हुए तेरी याद में खोए हुए तेरी आवाज़ सुने हुए तेरे साथ तारों को गिने हुए तुझे मुझ सेे छीने हुए आज बारह महीने हुए ख़ुश रंग ख़्वाबों को किसी नज़र की आग में जले हुए हमारे आशियाँ के सूरज को ढले हुए जिन में मिस्मार हो गई झोपड़ी अपनी उन ऑंधियों को चले हुए इन आँखों और रुख़सारों को गिले हुए मुझे तुझ से मिले हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया भरने थे जो ज़ख़्म जिगर के वक़्त के साथ सिर्फ़ गहरे हुए हैं हम समुंदर में डूबी उस कश्ती की राह में आज भी किनारे पर ठहरे हुए हैं हर किसी ने शुरू में कहा था “ह में भी दर्द बस शुरू में रहा था” अभी यक़ीन नहीं होगा दिल भी ग़मगीन नहीं होगा एक वक़्त पर जा चुका है दिल मान जाता है एक वक़्त के बा'द हर दर्द दवा बन जाता है मगर न जाने क्यूँ ये दर्द तो बढ़ता जाता है मुझे सुकून नहीं मिल पाता है कैसी ज़ुल्मत बढ़ती जाती है मेरी हिम्मत टूटती जाती है जब लौट के तुम नहीं आती हो ये दीवाली क्यूँ आ जाती है मुझ को ये मालूम भी है लौट के नहीं कभी आते हैं अब तुम जिस जहाँ में रहती हो पर तुम कब जहाँ में रहती हो तुम तो आब ओ हवा में बहती हो ये तेरा भैया तेरे पापा तेरी मैया ये चंदा तारे जुगनू दीपक फूल ओ कलियाँ ये सूनी गलियाँ और हम सब तुझ को खोजते रहते हैं हम सब तुझ को सोचते रहते हैं सब सेे कहते रहते हैं यहीं है वो कहीं नहीं गई है वो मेरे दिल में रहती है वो मुझ सेे मिलती रहती है ख़्वाबों में वीरान दिल के उजड़े गुलशन में मेरे तन में मेरे मन में इस चमन में होली के रंगों में पिचकारी में गुब्बारों में दिवाली की फुलझड़ियो में चकरी में अनारों में रंगोली के रंगों में दिए में लड़ियों में खिड़की पर बैठी गिलहरी में चिड़ियों में नौ रातों की नौ देवियों में जिमती है पहले आरती करती थी अब कराती है मुझ को बेहद रुलाती है मुझे भैया कह के बुलाती है छत की कड़ी में दीवार की घड़ी में हर पल टक-टक करती है मेरे भीतर मेरे दिल के ऑंगन में खेल खेलती वो हर पल बक-बक करती है ठंडी रात के घोर सन्नाटे में वो मेरी ग़ज़लें गाती है आज खुल्द में क्या-क्या हुआ रात को आके बताती है मैं गले लगाने को उठता हूँ आँख खुलती है गुम हो जाती है ऐसा होते हुए मुझ को रोते हुए एक साल हो गया
Chhayank Tyagi
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"मैं मिलूँगा तुम्हें" दुनिया की परेशानियों से दूर मैं मिलूँगा तुम्हें किसी जंगल में तुम्हारे लिए नज़्में लिखता हुआ अपनी क़लम में तुम्हारे प्यार का रस भरता हुआ पेड़ों से फूलों से तितलियों से तुम्हारी बातें करता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ख़्वाब में मैं मिलूँगा तुम्हें बादलों में मैं मिलूँगा तुम्हें हवाओं में मैं मिलूँगा तुम्हें खिलती धूप में हर रंग में हर रूप में हर गली में हर गाँव में हर शहर में मैं मिलूँगा तुम्हें हर जगह पर? अगर कभी ऐसा हो कि मैं तुम्हें कहीं भी दिखाई ना दूँ तो सब सेे आसान तरीक़ा है मुझ सेे मिलने का तुम अपने अंदर झाँक लेना मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर तुम्हें प्यार करता हुआ तुम्हारा ख़याल रखता हुआ तुम्हारे लिए जीता हुआ तुम्हारे लिए मरता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर
Prince Sodhi
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पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है, वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है, वो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है, उस को छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है, उस को इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पढ़ सकती हैं, हम ने जिन को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी-कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती है सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है, सिर्फ़ उसी के हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है, हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में ज़िंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है, हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है, उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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टूटीं ज़ुल्म की क़ैदें टूटीं फूटीं अम्न की किरनें फूटीं लूटीं दिल ने ख़ुशियाँ लूटीं तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा सख़्त घड़ी जो थी बीत गई है हारी बाज़ी जीत गई है ख़ाक में ग़म की रीत गई है तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा आए ख़ुशी के दिन यूँँ वतन में फूलों की रुत जैसे चमन में सोती उमंगें जागीं मन में तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा गहरी नींद से जागी दुनिया जागी गंगा जागी जमुना धरती पर लहराया फरेरा तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा जागे गिरजा मस्जिद मंदिर खेत चमन मिल मकतब दफ़्तर रौशन हैं सब छोटे बड़े घर तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा बिछड़े साथी मिलने लगे हैं चाक जिगर के सिलने लगे हैं दिल के ग़ुंचे खिलने लगे हैं तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा
Saadat Nazeer
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उट्ठो क़दम क़दम से मिलाते चले चलो सब मिल के एक राह बनाते चले चलो मंज़िल की धुन में झूमते गाते चले चलो हर मरहले को सहल बनाते चले चलो बन कर घटा फ़ज़ाओं पे छाते चले चलो हर हर क़दम पे धूम मचाते चले चलो तफ़रीक़-ए-रंग-ओ-नस्ल मिटाते चले चलो इंसानियत की शान दिखाते चले चलो आगे बढ़ो रुको न किसी रहगुज़ार पर हर दम सफ़र का लुत्फ़ उठाते चले चलो मायूसियों में छेड़ दो नग़्में उमीद के तारीकियों में जोत जगाते चले चलो टूटे हुए दिलों को मोहब्बत से जोड़ दो जौहर अमल के अपने दिखाते चले चलो धरती भी जगमगा उठे आकास की तरह रातों में वो चराग़ जलाते चले चलो चमको गगन के तारों की सूरत ज़मीन पर तुम आसमाँ ज़मीं को बनाते चले चलो पतझड़ की रुत में फूल खिलाना कमाल है पतझड़ की रुत में फूल खिलाते चले चलो बदले ख़िज़ाँ 'नज़ीर' चमन में बहार से वो गीत ज़िंदगी के सुनाते चले चलो
Saadat Nazeer
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लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तिरंगे तेरी लाली ख़ून-ए-शहीदाँ की है सुर्ख़ी आज़ादी की एक निशानी आज़ादी है जान वतन की लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तिरंगे तेरी सफ़ेदी एक अलामत अम्न-ओ-अमाँ की अम्न-ओ-अमाँ है बस्ती बस्ती क़स्बा क़स्बा नगरी नगरी लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तिरंगे तेरा हरा-पन सहरा सहरा गुलशन गुलशन दाना दाना ख़िरमन ख़िरमन खेत बना है तुझ से हर बन लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तराने तेरा चक्कर इंसाँ की मंज़िल का रहबर सच्चाई और धर्म का मज़हर चाँद सितारे सदक़े तुझ पर लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में
Saadat Nazeer
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