टूटीं ज़ुल्म की क़ैदें टूटीं फूटीं अम्न की किरनें फूटीं लूटीं दिल ने ख़ुशियाँ लूटीं तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा सख़्त घड़ी जो थी बीत गई है हारी बाज़ी जीत गई है ख़ाक में ग़म की रीत गई है तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा आए ख़ुशी के दिन यूँँ वतन में फूलों की रुत जैसे चमन में सोती उमंगें जागीं मन में तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा गहरी नींद से जागी दुनिया जागी गंगा जागी जमुना धरती पर लहराया फरेरा तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा जागे गिरजा मस्जिद मंदिर खेत चमन मिल मकतब दफ़्तर रौशन हैं सब छोटे बड़े घर तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा बिछड़े साथी मिलने लगे हैं चाक जिगर के सिलने लगे हैं दिल के ग़ुंचे खिलने लगे हैं तारे सोए सूरज जागा भागा घोर अँधेरा भागा
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"इश्क़ की आग" चलो फिर से आशिक़ी की राह पर चला जाए अंजाम जो भी हो पर अंदाज़ क्यूँँ बदला जाए बर्फ़-सी दिल में जम गई है शब-ए-तन्हाई में तो फिर वस्ल-ए-यार की गर्मी में पिघला जाए ख़बर है फ़लक की बिजली से मर गया इंसाँ ख़ाक-ए-ज़ुल्मात-रंग से कब कौन चला जाए तब ये जान जाना कि मौत-बर-हक़ है अगर क्यूँ न इश्क़ की आग में जल कर देखा जाए
arjun chamoli
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"आशा का दीप" आशा का दीप जलाना तुम आशा का दीप जलाना तुम आँखों में सपने मर जाए होंठों से गाने छिन जाएँ मंजिल की चाहत में तुम सेे जब ऐसा हो रस्ते छिन जाएँ ऐसे में बस हाथ जोड़कर ईश्वर से आस लगाना तुम आशा का दीप जलाना तुम जब आँखों में सूनापन हो खाली-खाली सा मन हो आँखें आँसू का दरिया ओ मुश्किल में जब जीवन हो जब गीत सुनें हम नफ़रत के तब प्यार के गीत सुनाना तुम आशा का दीप जलाना तुम जब ठोकर साथ निभाती हो मंजिल रस्ता भटकाती हो जब सूरज की किरनें भी एक जुगनू से डर जाती हो जब दुनिया छोड़ के जाती हो बस मुझे छोड़ मत जाना तुम आशा का दीप जलाना तुम जब प्रेम पर लगे पहरे हो नफ़रत के घाव गहरे हो सुख की छाया से कोसों दूर दुख के बादल घनेरे हो जब थककर सोऊँ रातों में मेरे स्वप्न में बस आना तुम आशा का दीप जलाना तुम
PANKAJ SISODIYA
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'हार नहीं मैं मानूँगा' महफ़िल हो तन्हाई हो कैसी भी रुसवाई हो या दुनिया हरजाई हो कोई क़यामत आई हो अंगारों में पलना हो या काँटों पर चलना हो पैरों में ज़ंजीर हो या चाहे जुदा तक़दीर हो या पीछे मुड़ के न देखूँगा पथ पर अपने निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा चाहे ग़म के मेले हों या घनघोर अँधेरे हों तूफ़ाँ हो या बिजली हो चाहे रात घनेरी हो चाहे दुनिया बैरी हो कोई भी मजबूरी हो चाहे बिजली गरजती हो तूफ़ानों की बारिश हो चाहे सूना आँगन हो अच्छा बुरा अब जो भी हो काम न कल पर टालूँगा मंजिल पर ही दम लूँगा हार नहीं मैं मानूँगा चाहे भाला ले कर आ तन पर ख़ंजर भी दौड़ा या राहों में गिरा कर जा जो चाहे वो कर के जा दुश्मन मेरी जान बने या घर कब्रिस्तान बने मौत मिरी मेहमान बने रोटी मेरी छीन ले तू पानी मेरा छीन ले तू मेरी भूख भी छीन ले तू मेरी प्यास भी छीन ले तू मेरा चैन भी छीन ले तू मेरी जान भी छीन ले तू मेरी नींद भी छीन ले तू हँसी-ख़ुशी सब दे दूँगा भूखे प्यासे रह लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा दुश्मन या घर वाले हों या फिर बाहर वाले हों राह में खाई खुदवाओ या शोलों पर चलवाओ चाहे आग में तड़पाओ चाहे कारावास मिले या मुझ को बन-बास मिले रूखी सूखी चटनी हो या ज़ेल का काला पानी हो चाहे आग के शो'ले हों चाहे दर्द की ज़ेलें हों थोड़ी देर को हँस लूँगा थोड़ी देर को रो लूँगा राज़ी ख़ुशी सब ले लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा सूली पर चढ़वा देना या काँटों पर चलवा लेना कितना भी तड़पा लेना तन पर कपड़े हों या न हों चाहे दुनिया हँसती हो पाँव में चप्पल हो या न हो या फिर पाँव में छाले हों कैसी भी अब हालत हो चाहे कोई गाली दे चाहे ज़हर की प्याली दे मैं चुप-चाप ही ले लूँगा मैं हर हाल में जी लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा मेरे जैसे जितने हैं बूढ़े हैं या बच्चे हैं बैरी हैं या अच्छे हैं साथ सभी को ले लूँगा हाथ में हाथ पकड़ लूँगा दर्द सभी के झेलूँगा साथ उन्हीं के हँस लूँगा साथ उन्हीं के रो लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा तेरी आस अधूरी हो चाहे प्यास अधूरी हो चाहे साँस अधूरी हो या रिश्तो में दूरी हो दुश्मन अब भगवान बने या कोई इंसान बने या कोई शैतान बने कोई मरे या कोई जिए चाहे ग़म का ज़हर पिए मुझ को नहीं है मतलब अब कितने भी जाल अब लगवाओ कितने भी शो'ले बरसाओ मुझ को काँटों पर ले जाओ कितने भी अब ज़ुल्म कराओ जान पे अपनी खेलूँगा मंज़िल पर ही दम लूँगा दुनिया को मैं जीतूँगा हार नहीं मैं मानूँगा
Prashant Kumar
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“पहली मुलाक़ात” मैं पहली बार जब तुम सेे मिलूँगा कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ मिलूँगा मैं किसी अनजान जैसे या फिर जन्मों की हो पहचान जैसे मैं पहली बार जब देखूँगा तुम को यक़ीं कैसे दिलाऊँगा मैं ख़ुद को कि जिस के ख़्वाब अब तक देखता था हक़ीक़त में वो मेरे सामने है कहीं मैं सोचता ही रह न जाऊँ कि रब ने की ये रहमत किस लिए है वो पहली बार जब नज़रें मिलेंगी मेरी आँखें ख़ुशी से झूम उठेंगी वो पहला लफ़्ज़ क्या बोलूँगा तुम को वो पहला तोहफ़ा मैं क्या दूँगा तुम को वो पहली बार हाथों का पकड़ना तुम्हें बाहों में पहली बार भरना ये सब है वहम मेरा मानता हूँ मेरा हक़ मैं बख़ूबी जानता हूँ मैं फिर भी हक़ से बढ़कर सोचता हूँ कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ मैं पहली बार जब तुम सेे मिलूँगा तुम्हें मिलने की दिल में आस ले के ये मौसम सारे बीते जा रहे हैं यक़ीं होगा न लेकिन वक़्त मुझ सेे बड़ी मुश्किल से काटे जा रहे हैं मगर तब तक मैं अपनी मुट्ठियों में ये सारे मौसमों को भर रहा हूँ तुम्हें मिल कर जो पहली चीज़ दूँगा वो इक तैयार तोहफ़ा कर रहा हूँ ये लू गर्मी की ये जाड़े की ठंडक ये मंदिर के भजन ये जलते दीपक हवाएँ सुब्ह की, बारिश की बूँदें सुनहरी ओस ये सूरज की किरनें सुहानी शाम, गंगा के किनारे ये नीले आसमाँ के चाँद तारे ये सावन और ये पतझड़ की रंगत क्षितिज पर सात रंगों की ये संगत सभी को भर के मन की चिट्ठियों में मैं ले आऊँगा अपनी मुट्ठियों में कहोगी तुम कि नामुमकिन है ये सब ये लड़का इतना पागल हो गया कब मैं ख़ुद भी सोचता हूँ सच कहूँ तो कि इतना भी मैं क्यूँँकर सोचता हूँ कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ मैं पहली बार जब तुम सेे मिलूँगा
SHIV SAFAR
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"ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर" ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें हम भूले हुओं को याद न कर पहले ही बहुत नाशाद हैं हम तू और हमें नाशाद न कर क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ ये ताज़ा सितम ईजाद न कर यूँँ ज़ुल्म न कर बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया हाथों से ख़ुशी का जाम छुटा होंटों से हँसी का नाम गया ग़मगीं न बना नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर हम रातों को उठ कर रोते हैं रो रो के दुआएँ करते हैं आँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश सर धुनते हैं आहें भरते हैं ऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं ये ज़ुल्म तू ऐ जल्लाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर ये रोग लगा है जब से हमें रंजीदा हूँ मैं बीमार है वो हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश बे-ख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो जीने पे इधर बेज़ार हूँ मैं मरने पे उधर तयार है वो और ज़ब्त कहे फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जिस दिन से बँधा है ध्यान तिरा घबराए हुए से रहते हैं हर वक़्त तसव्वुर कर कर के शरमाए हुए से रहते हैं कुम्हलाए हुए फूलों की तरह कुम्हलाए हुए से रहते हैं पामाल न कर बर्बाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर बे-दर्द! ज़रा इंसाफ़ तो कर इस उम्र में और मग़्मूम है वो फूलों की तरह नाज़ुक है अभी तारों की तरह मासूम है वो ये हुस्न सितम! ये रंज ग़ज़ब! मजबूर हूँ मैं मज़लूम है वो मज़लूम पे यूँँ बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं वो शोख़-ए-हज़ीं बद-नाम न हो वो माह-लक़ा बद-नाम न हो वो ज़ोहरा-जबीं बद-नाम न हो नामूस का उस के पास रहे वो पर्दा-नशीं बद-नाम न हो उस पर्दा-नशीं को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर उम्मीद की झूटी जन्नत के रह रह के न दिखला ख़्वाब हमें आइंदा की फ़र्ज़ी इशरत के वादों से न कर बेताब हमें कहता है ज़माना जिस को ख़ुशी आती है नज़र कमयाब हमें छोड़ ऐसी ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर क्या समझे थे और तू क्या निकला ये सोच के ही हैरान हैं हम है पहले-पहल का तजरबा और कम-उम्र हैं हम अंजान हैं हम ऐ इश्क़! ख़ुदारा! रहम-ओ-करम मासूम हैं हम नादान हैं हम नादान हैं हम नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर वो राज़ है ये ग़म आह जिसे पा जाए कोई तो ख़ैर नहीं आँखों से जब आँसू बहते हैं आ जाए कोई तो ख़ैर नहीं ज़ालिम है ये दुनिया दिल को यहाँ भा जाए कोई तो ख़ैर नहीं है ज़ुल्म मगर फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर दो दिन ही में अहद-ए-तिफ़्ली के मासूम ज़माने भूल गए आँखों से वो ख़ुशियाँ मिट सी गईं लब को वो तराने भूल गए उन पाक बहिश्ती ख़्वाबों के दिलचस्प फ़साने भूल गए इन ख़्वाबों सी यूँँ आज़ाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर उस जान-ए-हया का बस नहीं कुछ बे-बस है पराए बस में है बे-दर्द दिलों को क्या है ख़बर जो प्यार यहाँ आपस में है है बेबसी ज़हर और प्यार है रस ये ज़हर छुपा इस रस में है कहती है हया फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर आँखों को ये क्या आज़ार हुआ हर जज़्ब-ए-निहाँ पर रो देना आहंग-ए-तरब पर झुक जाना आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ पर रो देना बरबत की सदा पर रो देना मुतरिब के बयाँ पर रो देना एहसास को ग़म बुनियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर हर दम अबदी राहत का समाँ दिखला के हमें दिल-गीर न कर लिल्लाह हबाब-ए-आब-ए-रवाँ पर नक़्श-ए-बक़ा तहरीर न कर मायूसी के रमते बादल पर उम्मीद के घर तामीर न कर तामीर न कर आबाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जी चाहता है इक दूसरे को यूँँ आठ पहर हम याद करें आँखों में बसाएँ ख़्वाबों को और दिल में ख़याल आबाद करें ख़ल्वत में भी हो जल्वत का समाँ वहदत को दुई से शाद करें ये आरज़ुएँ ईजाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर दुनिया का तमाशा देख लिया ग़मगीन सी है बेताब सी है उम्मीद यहाँ इक वहम सी है तस्कीन यहाँ इक ख़्वाब सी है दुनिया में ख़ुशी का नाम नहीं दुनिया में ख़ुशी नायाब सी है दुनिया में ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
Akhtar Shirani
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उट्ठो क़दम क़दम से मिलाते चले चलो सब मिल के एक राह बनाते चले चलो मंज़िल की धुन में झूमते गाते चले चलो हर मरहले को सहल बनाते चले चलो बन कर घटा फ़ज़ाओं पे छाते चले चलो हर हर क़दम पे धूम मचाते चले चलो तफ़रीक़-ए-रंग-ओ-नस्ल मिटाते चले चलो इंसानियत की शान दिखाते चले चलो आगे बढ़ो रुको न किसी रहगुज़ार पर हर दम सफ़र का लुत्फ़ उठाते चले चलो मायूसियों में छेड़ दो नग़्में उमीद के तारीकियों में जोत जगाते चले चलो टूटे हुए दिलों को मोहब्बत से जोड़ दो जौहर अमल के अपने दिखाते चले चलो धरती भी जगमगा उठे आकास की तरह रातों में वो चराग़ जलाते चले चलो चमको गगन के तारों की सूरत ज़मीन पर तुम आसमाँ ज़मीं को बनाते चले चलो पतझड़ की रुत में फूल खिलाना कमाल है पतझड़ की रुत में फूल खिलाते चले चलो बदले ख़िज़ाँ 'नज़ीर' चमन में बहार से वो गीत ज़िंदगी के सुनाते चले चलो
Saadat Nazeer
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हम से ही फूलों की फबन है हम से ही शादाब चमन है जोश-ओ-ख़रोश-ए-गंग-ओ-जमन है शान-ए-वतन है हुस्न-ए-वतन है हम क्या हैं तक़दीर-ए-वतन हैं मसरूफ़-ए-ता'मीर-ए-वतन हैं अज़मत-ए-माज़ी रिफ़अत-ए-फ़र्दा रौनक़-ए-महफ़िल ज़ीनत-ए-दुनिया शाम का मंज़र सुब्ह का जल्वा गुलशन गुलशन सहरा सहरा गुल ये खिले हैं फ़िक्र-ओ-नज़र के सींचा है हम ने ख़ून-ए-जिगर से मस्जिद मंदिर दैर कलीसा ताज महल एलोरा अजंता जंतर-मंतर क़ुत्ब मिनारा कभी अँधेरा कभी उजाला हम से ही तारीख़-ए-वतन है बाक़ी हर इक नक़्श-ए-कुहन है जोश-ए-अमल है दिल में हमारे सर्द फ़ज़ा में हम हैं शरारे तोड़ के लाएँ चर्ख़ से तारे रोकें तूफ़ाँ मोड़ दें धारे हो हो कर बलवान बढ़ेंगे जग में हम परवान चढ़ेंगे सख़्त मराहिल राह में आएँ लाख हवादिस आँख दिखाएँ हाइल अगर हों तुंद हवाएँ वो भी हम से मुँह की खाएँ आँधी बन कर तेज़ चलेंगे और मंज़िल पर जा के रहेंगे
Saadat Nazeer
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लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तिरंगे तेरी लाली ख़ून-ए-शहीदाँ की है सुर्ख़ी आज़ादी की एक निशानी आज़ादी है जान वतन की लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तिरंगे तेरी सफ़ेदी एक अलामत अम्न-ओ-अमाँ की अम्न-ओ-अमाँ है बस्ती बस्ती क़स्बा क़स्बा नगरी नगरी लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तिरंगे तेरा हरा-पन सहरा सहरा गुलशन गुलशन दाना दाना ख़िरमन ख़िरमन खेत बना है तुझ से हर बन लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में प्यारे तराने तेरा चक्कर इंसाँ की मंज़िल का रहबर सच्चाई और धर्म का मज़हर चाँद सितारे सदक़े तुझ पर लहरा तिरंगे लहरा हवा में भर दे रंग-ओ-नूर फ़ज़ा में
Saadat Nazeer
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