"जेब कटने के ब'अद" मिरे कुर्ते की बूढ़ी जेब से कल तुम्हारी याद!! चुपके से निकल कर सड़क के शोर-ओ-गुल में खो गई है बड़ी बस्ती है किस को फ़िक्र इतनी! कि किस खोली में कब से तीरगी है यहाँ हर एक को अपनी पड़ी है
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"जब पापा पापा कहते थे" जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे जब पापा हम ने कहवाई जाँ फट के गले में है आई तब हँसते गाते फिरते थे अब मारे मारे फिरते हैं न ही कुछ खोने का डर था तब न ही कुछ पाने की इच्छा थी तब मन में जहाँ भी आता था वहीं पे रोया करते थे हम रोने के लिए भी अब हम को जा बुक करवानी पड़ती है जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे स्कूल को हम तुम जाते थे तब ज़ेब में पैसे रहते थे अब हाथ सभी के ख़ाली हैं कैसी यार अब की पढ़ाई है वो पीठ पे बोझ किताबों का और जेब में कंचे रहते थे जब स्कूल से घर आते थे तो चाॅक चुरा कर लाते थे गिल्ली डंडा ले ले कर रोज़ हम गलियों गलियों फिरते थे जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे याद आता है वो दौर हमें दादी के आँचल में छुपते थे मम्मी को झूट बताते थे पापा को झूट बताते थे फिर होती ख़ूब पिटाई थी हम अक्कड़ बक्कड़ करते थे खुट्टल बुट्टल भी करते थे जिस सेे भी लड़ाई होती थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे नाना नानी मौसा मौसी मेहमान जो घर में आते थे उन की ज़ेब से पैसे चुराते थे उन के बैग से चीज़ चुराते थे वो बचपन याद आता है जब बारिश में भीगा करते थे काग़ज़ की नाव बना कर ख़ूब आँगन में हम ने चलाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे मम्मी की आँखों में रहते ओझल न कहीं फिर होते थे मम्मी पापा के हिस्से की हर चीज़ हमीं ने खाई थी पापा की गोदी में रहते हम रोज़ दुकानों पर जाते फिर चीज़ वही मिलती हम को उँगली जिस पर भी उठाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे वो दिन याद आते हैं हम को जब सबके दिलों में रहते थे बचपन का फ़साना याद आया अब आँख मिरी भर आई है
Prashant Kumar
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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"दिलबर" तुम पास अब आ जाओ, दिल में मिरे आ जाओ छोड़ो न बात ये सब, तुम बस मुझे सताओ कुछ बात मैं बताऊँ, कुछ बात तुम बताओ अब तो कहो न कुछ तुम, यूँँ दूर अब न जाओ आँखों में तुम आ जाओ, साँसों में तुम आ जाओ दिलबर मिरे आ जाओ, दिलबर मिरे आ जाओ
Raunak Karn
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"वो" वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं
Jaun Elia
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"सिगरेट" तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या मुझे जब इश्क़ था तुझ सेे तो सिगरेट से अदावत थी मैं सिगरेट से हमेशा हाथ अपने दूर रखता था कभी सिगरेट न छूता था मुझे सिगरेट से सिगरेट पीने वालों से अदावत थी जो सिगरेट पीते थे मुझ को वो लड़के ज़हर लगते थे मैं उन लड़कों की यारी दोस्ती से दूर रहता था तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या हमेशा मेरी सिगरेट के धुएँ में साँस घुटती थी मिरी आँखें उबलती थीं लहू आँखों में आता था मिरी जब साँस घुटती थी तो तू बेचैन होती थी मिरी हालत पे रोती थी तिरे चेहरे के ऊपर इक उदासी तारी होती थी तिरे सीने में दिल तेरा बिना पानी की मछली की तरह पल पल तड़पता था भुलाकर दर्द को अपने मिरे आराम की ख़ातिर मिरे हक़ में ख़ुदा से तू दुआएँ करने लगती थी दुआएँ रंग लाती थीं धुआँ सिगरेट का छटता था मिरी हालत सुधरती थी मुझे सब याद है अब तक मैं माज़ी को नहीं भूला मिरी हालत सुधरती थी तो तुझ को चैन आता था तुझे जब चैन आता था तो तू सज्दे में सर रख कर ख़ुदा का शुक्र करती थी ख़ुदा का शुक्र कर के तू गले से मेरे लगती थी गले लग कर मिरे तू धी में धी में मुस्कुराती थी तिरे सीने में दिल तेरा सुकूँ की साँस लेता था मुझे सब याद है अब तक मैं माज़ी को नहीं भूला मगर अब कुछ बताना है मैं जब से तुझ सेे बिछड़ा हूँ ये मेरी ज़िंदगी तब से मुसीबत में गिरिफ़्ता है परेशाँ हूँ बहुत ज़्यादा बहुत ज़्यादा परेशाँ हूँ परेशानी सिवा होती है तो दिल में ये आता है कि सिगरेट हाथ में ले लूँ मैं सिगरेट हाथ में लेने को जब ये हाथ आगे को बढ़ाता हूँ तो तू आ कर तसव्वुर में मिरा ये हाथ अपने हाथ से ख़ुद थाम लेती है पकड़ कर हाथ मेरा तैश में मुझ सेे ये कहती है अरे छोड़ो ये सब क्या है शजर सिगरेट नहीं पीते तिरी गल मान लेता हूँ मैं सिगरेट तोड़ देता हूँ तिरे दीदार से दिल को ज़रा सा चैन आता है मैं कुछ पल के लिए अपने सभी ग़म भूल जाता हूँ मगर फिर से तिरी फ़ुर्क़त ये मन पर ग़ालिब आती है मिरी हालत बिगड़ती है परेशानी सिवा होती है तो दिल में ये आता है कि सिगरेट हाथ में ले लूँ मगर फिर ध्यान आता है तुझे सिगरेट से सिगरेट पीने वाले से मिरे जैसे अदावत है तो अब सिगरट भला क्यूँ अपने इन हाथों से छू लूँ मैं तुझे नाराज़ क्यूँ कर दूँ तुझे मुझ सेे मुहब्बत अब नहीं बाक़ी तो क्या शिकवा करूँँ तुझ सेे मुझे तुझ सेे मुहब्बत है मैं सिगरेट तोड़ देता हूँ ले सिगरेट फेंक देता हूँ मुहब्बत को निभाता हूँ मैं हर लम्हा तिरी यादों में गुम-सुम बैठा रहता हूँ तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या
Shajar Abbas
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"कच्ची दीवारें" मेरी माँ हर दिन अपने बूढे हाथों से इधर उधर से मिट्टी ला कर घर की कच्ची दीवारों के ज़ख़्मों को भरती रहती है तेज़ हवाओं के झोंकों से बेचारी कितना डरती है मेरी माँ कितनी भोली है बरसों की सीली दीवारें छोटे-मोटे पैवंदों से आख़िर कब तक रुक पाएँगी जब कोई बादल गरजेगा हर हर करती ढह जाएँगी
Nida Fazli
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"क़ौमी यक-जेहती" वो तवाइफ़ कई मर्दों को पहचानती है शायद इसी लिए दुनिया को ज़ियादा जानती है उस के कमरे में हर मज़हब के भगवान की एक एक तस्वीर लटकी है ये तस्वीरें लीडरों की तक़रीरों की तरह नुमाइशी नहीं उस का दरवाज़ा रात गए तक हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हर मज़हब के आदमी के लिए खुला रहता है ख़ुदा जाने उस के कमरे की सी कुशादगी मस्जिद और मंदिर के आँगनों में कब पैदा होगी
Nida Fazli
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"बुझ गए नील-गगन" अब कहीं कोई नहीं जल गए सारे फ़रिश्तों के बदन बुझ गए नील-गगन टूटता चाँद बिखरता सूरज कोई नेकी न बदी अब कहीं कोई नहीं आग के शो'ले बढ़े आसमानों का ख़ुदा डर के ज़मीं पर उतरा चार छे गाम चला टूट गया आदमी अपनी ही दीवारों से पत्थर ले कर फिर गुफाओं की तरफ़ लौट गया अब कहीं कोई नहीं
Nida Fazli
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"फ़ासला" ये फ़ासला जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है हर इक ज़माने की दास्ताँ है न इब्तिदा है न इंतिहा है मसाफ़तों का अज़ाब साँसों का दाएरा है न तुम कहीं हो न मैं कहीं हूँ तलाश रंगीन वाहिमा है सफ़र में लम्हों का कारवाँ है ये फ़ासला! जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है यही तलब है यही जज़ा है यही ख़ुदा है
Nida Fazli
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"नया दिन" सूरज! इक नट-खट बालक-सा दिन भर शोर मचाए इधर उधर चिड़ियों को बिखेरे किरनों को छितराए क़लम दरांती ब्रश हथौड़ा जगह जगह फैलाए शाम! थकी हारी माँ जैसी इक दिया मलकाए धी में धी में सारी बिखरी चीज़ें चुनती जाए
Nida Fazli
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